Sunday, July 2, 2017

जिनके पास कुण्डली नहीं उनका भविष्य कथन कैसे करें?

प्रश्न कुंडलीः ज्योतिष की इस प्रचीन विधा से मिलता है सटीक जवाब
 
जिन लोगों को अपने जन्म समय और जन्म तिथि का ध्यान नहीं है, वे एक खास कुंडली के जरिए अपना भविष्य जान सकते हैं। भविष्य से जुड़े प्रश्नों का जवाब प्राप्त कर सकते हैं।

कई बार लोगों की उलझन होती है कि उन्हें अपना जन्म समय या जन्मतिथि सही पता नहीं होती। ऐसे में ज्योतिष संबंधी फलादेश कैसे किए जाएं? किस तरह उनका भविष्य बांचा जाए? ज्योतिष में इसका सटीक जवाब प्रश्न कुंडली है। प्रश्न कुंडली में कार्य भाव और कार्येश की भूमिका अहम होती है। कार्य से यहां अर्थ उस विचार या इच्छा से है जिसके लिए प्रश्न कुंडली बनाई जाती है। जैसे अगर कोई व्यक्ति यह जानना चाहता है कि क्या वह यात्रा करेगा? इस स्थिति में कार्यभाव तृतीय भाव हो गया। कार्येश से मतलब कुंडली के उस भाव से है, जिससे संबंधित प्रश्न किया गया है। इस प्रश्न में यात्रा के विषय में कहा गया है तो तृतीय भाव का स्वामी कार्येश हो गया। इस प्रकार प्रश्न कुंडली में कार्य भाव और कार्येश का संबंध प्रश्न की सफलता दर्शाता है।

प्रश्न कुंडली वास्तव में समय विशेष की एक कुंडली है जो उस समय बनाई जाती है, जिस समय जातक प्रश्न पूछता है। इस कुंडली से जातक के प्रश्न का ही भविष्य देखने का प्रयास किया जाता है। इस विधि में सवाल कुछ भी हो सकता है। आमतौर पर तात्कालिक समस्या ही सवाल होती है। ऐसे में समस्या समाधान का जवाब देने के लिए प्रश्न कुंडली सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है। ध्यान रखने की बात यह है कि प्रश्न के सामने आते ही उसकी कुंडली बना ली जाए। इससे समय के फेर की समस्या नहीं रहती। इसके साथ ही जातक की मूल कुंडली भी मिल जाए और वह प्रश्न कुंडली को इको करती हो तो समस्या का हल ढूंढना और भी आसान हो जाता है। कई बार जातक जो मूल कुंडली लेकर आता है, वह भी संदेह के घेरे में होती है। ओमेन (संकेतों का विज्ञान) बताता है कि जातक का ज्योतिषी के पास आने का समय और जातक की कुंडली दोनों आमतौर पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। ऐसे में प्रश्न कुंडली बना लेना फलादेश के सही होने की गारंटी को बढ़ा देता है। पहले जब हाथ से कुंडली बनाई जाती थी, तब हाथों हाथ प्रश्न कुंडली बनाना संभव नहीं था लेकिन वर्तमान दौर में कंप्यूटर और सक्षम सॉफ्टवेयर की मदद से हाथों हाथ कुंडलियां बनाई जा रही है। अब ज्योतिषी जातक की मूल कुंडली के साथ ही प्रश्न कुंडली बना लेते हैं। यह फलादेश के काम को आसान बना देता है।

जन्म समय समस्या का समाधान
हालांकि पिछले कुछ सालों में अस्पतालों में शिशु के जन्म लेते ही अस्पताल स्टाफ नवजात के टैग लगाकर सही जन्म समय उस पर लिख देता है। बावजूद इसके जन्म समय को लेकर कई तरह की उलझनें बनी हुई है। आमतौर पर शिशु के गर्भ से बाहर आने को ही जन्म समय माना जाता है। इसके अलावा माता से नाल के कटने या पहली सांस लेने को भी जन्म समय लेने का मत ज्योतिष में देखने को मिलता है। सही जन्म समय को लेकर हमेशा उहापोह की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में प्रश्न कुंडली ऐसा जवाब है, जिससे जन्म तिथि और जन्म समय के बिना फलादेश किया जा सकता है। भविष्य से जुड़े सवालों का उत्तर पाया जा सकता है। सामान्यतया प्रश्न कुंडली की आयु वार्षिक मानी गई है। प्रश्न कुंडली में लग्न समय निश्चित होता है। प्रश्न कर्ता की चिंताओं की जानकारी चंद्रमा से देखी जा सकती है। प्रश्न कुंडली के लग्न भाव में बली चंद्र की स्थिति निवास, चिंताएं दूसरे भाव में धन, तीसरे भाव में घर से दूर रहने की चिंताएं, चौथे भाव में मकान-पानी से संबंधित परेशानी, पांचवे भाव में संतान, छठे भाव में ऋण, सातवें भाव में विवाह या साझेदारी, आठवें भाव में पैतृक सम्पति या अप्रत्याशित लाभ, नवम भाव में चंद्र लंबी दूरी की यात्राएं दशम भाव में आजीविका, एकादश भाव में आयु-वृद्धि, पदोन्नति, द्वादश भाव में बली चंद्र विदेश यात्रा से जुड़ी चिंताएं होने का संकेत देता है।

कमोबेश एक जैसे सवाल
ज्योतिष कार्यालय चलाने वाले लोग जानते हैं कि एक दिन में एक ही प्रकार की समस्याओं वाले लोग अधिक आते हैं। इसका कारण यह है कि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति होती है उससे पीडि़त होने वाले लोगों का स्वभाव भी एक जैसा ही होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि समान राशि या कुंडली वाले लोगों को एक जैसी समस्याएं होंगी। बल्कि ग्रह योगों की समान स्थिति से समान स्वभाव की समस्याएं सामने आएंगी। मेरा अनुभव बताता है कि जिस दिन गोचर में चंद्रमा और शनि की युति होगी तो उस दिन मानसिक समस्याओं से घिरे लोग अधिक आएंगे। हां, मानसिक समस्याओं का प्रकार, लग्न और अन्य ग्रहों का कारण बदल जाता है। कोई सिजोफ्रीनिया से पीड़ित हो सकता है तो कोई क्रोनिक डिप्रेशन का मरीज हो सकता है। किसी को दिमागी सुस्ती की समस्या हो सकती है तो कोई साइको-सोमेटिक डिजीज से ग्रस्त हो सकता है। इस तरह प्रश्न कुंडली से एक ओर जातक का विश्लेषण आसान हो जाता है तो दूसरी ओर भूतकाल स्पष्ट करने के बजाय भविष्य कथन में अधिक ध्यान लगाया जा सकता है।

छद्म प्रश्नों की समस्या

प्रश्न कुंडली के साथ बड़ी समस्या है जातक के सवाल का सही नहीं होना। ज्योतिष की जिन पुस्तकों में प्रश्नों के सवाल देने की विधियां दी गई हैं, उन्हीं में छद्म प्रश्नों से बचने के तरीके भी बताए गए हैं। इसका पहला नियम यह है कि ज्योतिषी को टेस्ट करने के लिए पूछे गए सवालों का जवाब कभी मत दो। ऐसा इसलिए कि ओमेन के सिद्धांत के अनुसार छद्म सवाल का कोई जवाब नहीं होता। जातक का सवाल सही नहीं होने पर प्रश्न और कुंडली एक-दूसरे के पूरक नहीं बन पाते हैं। ऐसे में प्रश्न कुंडली बनाने के साथ ही ज्योतिषी को प्रश्न के स्वभाव का प्रारंभिक अनुमान भी कर लेना चाहिए। इससे प्रश्न में बदलाव की संभावना कम होती है।

गुरू एवं अन्य ग्रहों के सम्बन्ध से आजीविका का विचार

आजीविका में गुरू का प्रभाव

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गुरू को पूर्ण रुप से सत्वगुणी ग्रह माना जाता है. यह ज्ञान व भाग्य का प्राकृति स्वामी ग्रह माना जाता है. ज्योतिषशास्त्र में इसे धन का कारक भी कहा गया है. आजीविका का सम्बन्ध धन व आय से होता है. इस लिहाज से गुरू का सम्बन्ध आजीविका स्थान यानी दसवें घर से होने पर शुभ फलदायी माना जाता है.

गुरू से सम्बन्धित आजीविका के क्षेत्र

गुरू ग्रह से सम्बन्धित आजीविका के क्षेत्रों में शिक्षण और शिक्षण संस्थानों से सम्बन्धित कार्यों को रखा गया है. इसका कारण यह है कि गुरू ज्ञान और विद्वता का स्वामी होता है. इनके अलावा फाईनेंस से जुड़े क्षेत्र जैसे बैंक, शेयर का काम, धन लेन-देन का काम भी गुरू के प्रभाव में आता है. आजीविका के विषय में गुरू की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दसवें घर में अगर यह पूर्ण रुप से शुभ होकर बैठा है तो उच्चाधिकारी बना सकता है. अगर आपकी कुण्डली में गुरू उच्च राशि में, मित्र राशि में अथवा स्वराशि में बैठा है तो आप जहां भी कार्य करेंगे अपने विभाग में उच्च पद तक जा सकते हैं. विदेशों मामलों के अधिकारी, राजदूत, वकील और जज का पेशा भी गुरू की स्थिति के अनुसार सफलता देने वाले होते हैं.

गुरू एवं अन्य ग्रहों के सम्बन्ध से आजीविका



आजीविका स्थान में गुरू के साथ अन्य ग्रह होने पर यह बाते ज्यादा खुलकर सामने आती है कि आपको आजीविका हेतु किस क्षेत्र में प्रयास करना चाहिए.

आपकी कुण्डली में गुरू किस ग्रह के साथ बैठा है अथवा उनका सम्बन्ध किन ग्रहों से बन रहा है इस बात को ध्यान में रखते हुए अगर अपनी आजीविका का चयन करेंगे तो संभव है कि आप जल्दी और आसानी से कामयाबी की तरफ आगे बढ़ेंगे. इस आधार पर आप देख सकते हैं कि आपकी कुण्डली में अगर-

गुरू व सूर्य का सम्बन्ध

गुरू व सूर्य का सम्बन्ध है तो आपको सरकारी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्ति हेतु प्रयास करना चाहिए. अगर आप कानून विषय में शिक्षा ग्रहण करेंगे तो जज अथवा सरकारी वकील बन सकते हैं. राजदूत, जिलाधिकारी एवं सरकार से सम्बन्धित सभी उच्च पद पर आप विराजमान हो सकते हैं. राजनीति में रूचि होने पर आप मेयर, मुखिया एवं मंत्री पद के लिए चुनाव लड़ सकते हैं.

गुरू व चन्द्र का सम्बन्ध

दसवें घर में स्थित गुरू का सम्बन्ध अगर आजीविका स्थान से है तो व्यावसियक क्षेत्रों में आपको आपको अच्छी सफलता मिल सकती है. मिठाईयों का कारोबार एवं दूध व दूध से बने पदार्थों का कारोबार आपके लिए फायदेमंद हो सकता है. आपके लिए खेती से सम्बन्धित कार्य भी लाभकारी रह सकता है. अगर आप व्यवसाय की बजाय नौकरी करना पसंद करते हैं तो सरकारी नौकरी पाने के लिए आपको प्रयास करना चाहिए. अगर लगन पूर्वक प्रयास करेंगे तो इसमें सफलता मिलने की संभावना प्रबल रहेगी. इन दोनों ग्रहों का सम्बन्ध गीत-संगीत में भी सफलता दिलाने वाला होता है अत: आप चाहें तो संगीतकार बन सकते हैं. अगर मैरिज ब्यूरो का काम करेंगे तो उसमें भी आप सफल होंगे

गुरू व मंगल का सम्बन्ध

दसम भाव में गुरू व मंगल का सम्बन्ध ज्ञान के साथ ही साथ उर्जा व शक्ति भी देता है जिससे आप सेनाधिकारी बन सकते हैं. पुलिस कप्तान, रेलवे अधिकारी एवं अग्नि शमन विभाग में कार्य कर सकते हैं. धातु की मूर्तियों का काम एवं ज्वेलरी का व्यवसाय आपके लिए फायदेमंद हो सकता है.

गुरू व बुध का सम्बन्ध

कुण्डली में अगर गुरू के साथ बुध का सम्बन्ध बन रहा है तो कला के किसी क्षेत्र में अपनी आजीविका की तलाश कर सकते हैं. लेखन के अलावे प्रिंटिग व प्रेस का काम को कामयाबी दिला सकता है. आप चाहें तो प्रोफेशनल फोटोग्राफर बनकर ख्याति और धन कमा सकते हैं. नौकरी के लिहाज से आपके लिए इंश्योरेंश, बैंक की नौकरी एवं अकाउंटेंट का काम उत्तम रह सकता है.

गुरू व शुक्र का सम्बन्ध

गुरू और शुक्र यूं तो शत्रु ग्रह हैं परंतु दोनों ही नैसर्गिक शुभ ग्रह हैं. अगर दसवें घर में दोनों ग्रहों के बीच युति सम्बन्ध बन रहा हो तो कला जगत यानी फिल्म, स्टेज एवं टेलीविजन की दुनियां में नाम कमा सकते हैं. इन से सम्बन्धित क्षेत्रों में आप नौकरी भी कर सकते हैं. रेडियो जॉकी बनने हेतु भी आप कोशिश कर सकते हैं. व्यवसाय की दृष्टि से रेशमी वस्त्रों का कारोबार, फूलों का कारोबार एवं पर्फ्युम का कारोबार फायदेमंद रहेगा.

गुरू व शनि का सम्बन्ध

आजीविका स्थान में गुरू व शनि के मध्य सम्बन्ध होने से आजीविका की दृष्टि से खेती से जुड़ा कार्य फायदेमंद होता है. पशुपालन भी लाभदायक रहता है. किराना दुकान एवं गेहूं के व्यापार में दिनानुदिन तरक्की होती है. शिक्षण के क्षेत्र में भी आप सफल हो सकते हैं.

गुरू व राहु का सम्बन्ध

नवीन तकनीकों से जुड़ा कार्य एवं आटो मोबाईल का काम इन दोनों ग्रहों का दसम भाव से सम्बन्ध होने पर लाभकारी होता है. आजीविका की दृष्टि से मुद्रा परिवर्तन एवं ज्योतिषी का काम भी फायदेमंद रहता है.

गुरू व केतु का सम्बन्ध

कुण्डली के दसवें घर में गुरू बैठा हो और साथ में केतु भी हो तो आजीविका के तौर पर कॉस्मैटिक्स का कारोबार करना लाभप्रद होता है. दवाईयों का कारोबार एवं रसायन से सम्बन्धित काम भी उन्नति देता है. धर्मिक संस्थानों के नेता के रूप में आजीविका अच्छी रहती है. अगर आपकी कुण्डली में इन दोनों ग्रहों की युति है तो आप गुप्तचर भी बन सकते हैं

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ?

*🚩रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ?🔱*

शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।

श्लोक

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना।

जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।

अर्थात

जल से रुद्राभिषेक करने पर —               वृष्टि होती है।
कुशा जल से अभिषेक करने पर —        रोग, दुःख से छुटकारा मिलती है।

दही से अभिषेक करने पर —                  पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।

गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर —     लक्ष्मी प्राप्ति
मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि के लिए।

तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर —     मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इत्र मिले जल से अभिषेक करने से —     बीमारी नष्ट होती है।

दूध् से अभिषेककरने से   —                   पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण होती हैं।

गंगाजल से अभिषेक करने से —             ज्वर ठीक हो जाता है।
दूध् शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि प्राप्ति हेतू।

घी से अभिषेक करने से —                       वंश विस्तार होती है।
सरसों के तेल से अभिषेक करने से —      रोग तथा शत्रु का नाश होता है।

शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से   —-         पाप क्षय हेतू।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाते हैं।
- डॉ. मुकेश ओझा

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Thursday, June 15, 2017

27 नक्षत्रों के वैदिक मंत्र


ज्योतिषाचार्य प्रायः कुण्डली देखने के पश्चात ग्रहों के शान्ति का परामर्श दिया करते है, परन्तु यदि आप ज्योतिष द्वारा जीवन आनन्दित करना चाहते है तो नक्षत्रों का वैदिक पुजन अवश्य करें।

27 नक्षत्रों के वैदिक मंत्र निम्नलिखित हैं :

अश्विनी नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ अश्विनौ तेजसाचक्षु: प्राणेन सरस्वती वीर्य्यम वाचेन्द्रो

बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम । ॐ अश्विनी कुमाराभ्यो नम: ।

भरणी नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ यमायत्वा मखायत्वा सूर्य्यस्यत्वा तपसे देवस्यत्वा सवितामध्वा

नक्तु पृथ्विया स गवं स्पृशस्पाहिअर्चिरसि शोचिरसि तपोसी।

कृतिका नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ अयमग्नि सहत्रिणो वाजस्य शांति गवं

वनस्पति: मूर्द्धा कबोरीणाम । ॐ अग्नये नम: ।

रोहिणी नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ ब्रहमजज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमत: सूरुचोवेन आव: सबुधन्या उपमा

अस्यविष्टा: स्तश्चयोनिम मतश्चविवाह ( सतश्चयोनिमस्तश्चविध: )

ॐ ब्रहमणे नम: ।

मृगशिर्ष नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ सोमधेनु गवं सोमाअवन्तुमाशु गवं सोमोवीर: कर्मणयन्ददाति

यदत्यविदध्य गवं सभेयम्पितृ श्रवणयोम । ॐ चन्द्रमसे नम: ।

आर्द्रा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ नमस्ते रूद्र मन्यवSउतोत इषवे नम: बाहुभ्यां मुतते नम: ।

ॐ रुद्राय नम: ।

पुनर्वसु नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ अदितिद्योरदितिरन्तरिक्षमदिति र्माता: स पिता स पुत्र:

विश्वेदेवा अदिति: पंचजना अदितिजातम अदितिर्रजनित्वम ।

ॐ आदित्याय नम: ।

पुष्य नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ बृहस्पते अतियदर्यौ अर्हाद दुमद्विभाति क्रतमज्जनेषु ।

यददीदयच्छवस ॠतप्रजात तदस्मासु द्रविण धेहि चित्रम ।

ॐ बृहस्पतये नम: ।

अश्लेषा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ नमोSस्तु सर्पेभ्योये के च पृथ्विमनु:।

ये अन्तरिक्षे यो देवितेभ्य: सर्पेभ्यो नम: ।

ॐ सर्पेभ्यो नम:।

मघा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्य स्वाधानम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: ।

प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम: अक्षन्न पितरोSमीमदन्त:

पितरोतितृपन्त पितर:शुन्धव्म । ॐ पितरेभ्ये नम: ।

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ भगप्रणेतर्भगसत्यराधो भगे मां धियमुदवाददन्न: ।

भगप्रजाननाय गोभिरश्वैर्भगप्रणेतृभिर्नुवन्त: स्याम: ।

ॐ भगाय नम: ।

उत्तराफालगुनी नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ दैव्या वद्धर्व्यू च आगत गवं रथेन सूर्य्यतव्चा ।

मध्वायज्ञ गवं समञ्जायतं प्रत्नया यं वेनश्चित्रं देवानाम ।

ॐ अर्यमणे नम: ।

हस्त नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ विभ्राडवृहन्पिवतु सोम्यं मध्वार्य्युदधज्ञ पत्त व विहुतम

वातजूतोयो अभि रक्षतित्मना प्रजा पुपोष: पुरुधाविराजति ।

ॐ सावित्रे नम: ।

चित्रा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ त्वष्टातुरीयो अद्धुत इन्द्रागी पुष्टिवर्द्धनम ।

द्विपदापदाया: च्छ्न्द इन्द्रियमुक्षा गौत्र वयोदधु: ।

त्वष्द्रेनम: । ॐ विश्वकर्मणे नम: ।

स्वाती नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ वायरन्नरदि बुध: सुमेध श्वेत सिशिक्तिनो

युतामभि श्री तं वायवे सुमनसा वितस्थुर्विश्वेनर:

स्वपत्थ्या निचक्रु: । ॐ वायव नम: ।

विशाखा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ इन्द्रान्गी आगत गवं सुतं गार्भिर्नमो वरेण्यम ।

अस्य पात घियोषिता । ॐ इन्द्रान्गीभ्यां नम: ।

अनुराधा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ नमो मित्रस्यवरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत

गवं सपर्यत दूरंदृशे देव जाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्योयश

गवं सत । ॐ मित्राय नम: ।

ज्येष्ठा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ त्राताभिंद्रमबितारमिंद्र गवं हवेसुहव गवं शूरमिंद्रम वहयामि शक्रं

पुरुहूतभिंद्र गवं स्वास्ति नो मधवा धात्विन्द्र: । ॐ इन्द्राय नम: ।

मूल नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ मातेवपुत्रम पृथिवी पुरीष्यमग्नि गवं स्वयोनावभारुषा तां

विश्वेदैवॠतुभि: संविदान: प्रजापति विश्वकर्मा विमुञ्च्त ।

ॐ निॠतये नम: ।

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ अपाघ मम कील्वषम पकृल्यामपोरप: अपामार्गत्वमस्मद

यदु: स्वपन्य-सुव: । ॐ अदुभ्यो नम: ।

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ विश्वे अद्य मरुत विश्वSउतो विश्वे भवत्यग्नय: समिद्धा:

विश्वेनोदेवा अवसागमन्तु विश्वेमस्तु द्रविणं बाजो अस्मै ।

श्रवण नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ विष्णोरराटमसि विष्णो श्नपत्रेस्थो विष्णो स्युरसिविष्णो

धुर्वोसि वैष्णवमसि विष्नवेत्वा । ॐ विष्णवे नम: ।

धनिष्ठा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ वसो:पवित्रमसि शतधारंवसो: पवित्रमसि सहत्रधारम ।

देवस्त्वासविता पुनातुवसो: पवित्रेणशतधारेण सुप्वाकामधुक्ष: ।

ॐ वसुभ्यो नम: ।

शतभिषा नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ वरुणस्योत्त्मभनमसिवरुणस्यस्कुं मसर्जनी स्थो वरुणस्य

ॠतसदन्य सि वरुण स्यॠतमदन ससि वरुणस्यॠतसदनमसि ।

ॐ वरुणाय नम: ।

पूर्वभाद्रपद नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ उतनाहिर्वुधन्य: श्रृणोत्वज एकपापृथिवी समुद्र: विश्वेदेवा

ॠता वृधो हुवाना स्तुतामंत्रा कविशस्ता अवन्तु ।

ॐ अजैकपदे नम:।

उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ शिवोनामासिस्वधितिस्तो पिता नमस्तेSस्तुमामाहि गवं सो

निर्वत्तयाम्यायुषेSत्राद्याय प्रजननायर रायपोषाय ( सुप्रजास्वाय ) ।

ॐ अहिर्बुधाय नम: ।

रेवती नक्षत्र का वेद मंत्र

ॐ पूषन तव व्रते वय नरिषेभ्य कदाचन ।

स्तोतारस्तेइहस्मसि । ॐ पूषणे नम: ।

Friday, March 3, 2017

वास्तु में वायव्य कोण? वायव्य कोण में क्या करें और क्या न करें?

वास्तु में वायव्य कोण?
वायव्य कोण में क्या करें और क्या न करें?

वायव्य कोण में क्या हो-

- घर में जल भण्डारण हेतु सभी टंकियां इस स्थान पर रखने का निर्देश प्राप्त होता है।

1.

- यह स्थान मेहमानों का कक्ष, आगंतुक कक्ष (ड्राइंग रूम) के लिए उत्तम है।
- यहां विवाह योग्य कन्या का कमरा बहुत अच्छा माना गया है।
- यहां किरायेदारों का कमरा होना बहुत लाभकारी होता है।
- अन्न भण्डार, स्टोर के लिए भी यह स्थान ठीक है।
- यहां वाहन व पशु का स्थान आदि बनाना शास्त्र सम्मत है।
- घर में काम करने वाले कर्मचारी का स्थान भी उपयुक्त होता है।
- वायव्य की चारदिवारी को मोटा और ऊंचा बनाये।
- इस स्थान पर निर्माण होना आवश्यक है अत: इसे निर्मित रखें।
- सीढ़ियां बनाने का सबसे उपयुक्त स्थान होता है।
- यहां संयुक्त परिवार में बड़े बेटे का स्थान उत्तम है।

वायव्य कोण में क्या न हो-

- वायव्य कोण को खुला न रखें।
- यहाँ पर बड़े बुजुर्गों का कमरा न बनवायें। मानसिक तनाव व मनोस्थिति ख़राब हो जाती है।
- इस स्थान को कभी खाली न रखें अन्यथा दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है।
- वायव्य को ईशान से नीचे कदापि न रखें। ऐसा करने पर शत्रुता और रोग से ग्रस्त रहेंगे।
- वायव्य दिशा में कुआं या गड्ढा न बनवाएं।
- यहां सेप्टिक टैंक ना बनवाएं।
- यहां बिजली का मीटर न लगाये।
-यहाँ अग्नि से सम्बन्धीत कोई भी कार्य न करें।
  डा.मुकेश ओझा