Monday, August 14, 2017

वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना

वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना:-

देश के सभी लोग सुखी और समृद्ध हों इसके लिए यजुर्वेद में यह राष्ट्रीय प्रार्थना वर्णित है -

"आ ब्रह्मण ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योतिव्याधि महारथो जायतां

दोग्ध्री धेनुर्वोढानडवानाशुः सप्ति पुरन्धिर्योषाः जिष्णु रथेष्ठा सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो

जायतां निकामे निकामे न पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यतां योगक्षेमो न कल्पताम "

- यजुर्वेद 22, 22

' हे ब्रह्म! इस राष्ट्र में ब्राह्मण ब्रह्मतेज से संपन्न हों, क्षत्रिय शूरवीर धनुर्धारी महारथी हों, गाय दूध

देनेवाली बैलभारवाही और घोड़े शीघ्रगामी हों, नगर को धारण करने वाली नारियां , सभेय(संसदसदस्य) विजयशील युवा रथारुढ वीर

और यज्ञ करनेवाले हों, पर्जन्यदेव इछानुसार वर्षा करें, औषधियां फलवती हों, हमें अप्राप्त की प्राप्ति हो और हमारे प्राप्त की रक्षा हो '

अर्थ:

हे ब्रह्मन्‌-विद्यादि गुणों करके सब से बडे परमेश्वर जैसे हमारे,
राष्ट्रे-राज्य में,
ब्रह्मवर्चसी-वेदविद्या से प्रकाश को प्राप्त,
ब्राह्मणः-वेद और ईश्वर को अच्छा जाननेवाला विद्वान्‌,
आ जायताम्‌-सब प्रकार से उत्पन्न हो।
इषव्यः-बाण चलाने में उत्तम गुणवान्‌,
अतिव्याधी-अतीव शत्रुओं को व्यधने अर्थात्‌ ताड़ना देने का स्वभाव रखने वाला,
महारथः-कि जिसके बडे बडे रथ और अत्यन्त बली वीर है ऐसा,
शूरः-निर्भय,
राजन्या-राजपुत्र,
आ जायताम्‌-सब प्रकार से उत्पन्न हो।
दोग्ध्री-कामना वा दूध से पूर्ण करनेवाली,
धेनुः-वाणी वा गौ,
वोढा-भार ले जाने में समर्थ,
अनङ्वान्‌-बडा बलवान्‌ बैल,
आशुः-शीघ्र चलने वाला,
सप्तिः-घोडा,
पुरन्धिः-जो बहुत व्यवहारों को धारण करती है वह,
योषा-स्त्री,
रथेष्ठाः-तथा रथ पर स्थित होने और,
जिष्णूः-शत्रुओं को जीतनेवाला,
सभेयः-सभा में उत्तम सभ्य,
युवा-जवान पुरुष,
आ जायताम्‌- उत्पन्न हो,
अस्य यजमानस्य- जो यह विद्वानों का सत्कार करता वा सुखों की संगति करता वा सुखों को देता है, इस राजा के राज्य में,
वीरः-विशेष ज्ञानवान्‌ शत्रुओं को हटाने वाला पुरुष उत्पन्न हो,
नः-हम लोगों के,
निकामे निकामे-निश्चययुक्त काम काम में अर्थात्‌ जिस जिस काम के लिए प्रयत्न करें उस उस काम में,
पर्जन्यः-मेघ,
वर्षतु-वर्षे।
ओषधयः-ओषधि,
फलवत्यः-बहुत उत्तम फलोवाली,
नः-हमारे लिए,
पच्यन्ताम्‌-पकें,
नः-हमारा,
योगक्षेमः-अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति लक्षणों वाले योग की रक्षा अर्थात्‌ हमारे निर्वाह के योग्य पदार्थों की प्राप्ति,
कल्पताम्‌-समर्थ हो वैसा विधान करो अर्थात्‌ वैसे व्यवहार को प्रगट कराइये।

‍(महर्षि दयानन्द द्वारा किया गया अर्थ)

Thursday, August 10, 2017

12 अगस्त रात मे दिन जैसा प्रकाश नही होगा परन्तु यह मौका आसमान में टूटते तारों की आतिशबाज़ी देखने का है

12 अगस्त रात मे दिन जैसा प्रकाश नही होगा परन्तु यह मौका आसमान में टूटते तारों की आतिशबाज़ी देखने का है
11एवं 12 तारीख के रात को हम इस मौसम के श्रेष्ठ और रंगीन उल्कापात - पेर्सेइड मेटेओर शावर का आनंद ले सकते हैं।
खगोल वैज्ञानिक गणनाओं के आधार पर 11-12 अगस्त 2017 और 12-13 अगस्त 2017 की मध्यरात्रि से भोर तक पेर्सेइड उल्कापात के विहंगम दृश्य का अवलोकन किया जा सकता है।
आसमानी आतिशबाज़ी की यह घटना 12-13 अगस्त की मध्यरात्रि से भोर तक अपने चरम पर होगी।
उल्कापात एक खगोलीय घटना है जिसमें रात्रि आकाश में कई उल्काएं एक बिंदु से निकलती नज़र आती हैं।
ये उल्काएं या मेटिअरॉइट (सामान्य भाषा में टूटते तारे) धूमकेतु या पुच्छल तारों के पीछे घिसटते धूल के कण, पत्थर आदि होते हैं जो पृथ्वी के वातावरण में बहुत तीव्र गति से प्रवेश करते हैं और हमें आसमानी आतिशबाज़ी का नज़ारा दिखाई देता है।
अधिकांश उल्काएँ आकार में धूल के कण से भी छोटी होती हैं जो विघटित हो जाती हैं और सामान्यतः पृथ्वी की सतह से नहीं टकरातीं।
यदि उल्कापात के दौरान उल्काओं का कुछ अंश वायुमंडल में जलने से बच जाता है और पृथ्वी तक पहुँचता है तो उसे उल्कापिंड या मेटिअरॉइट कहते हैं।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस वर्ष पेर्सेइड उल्कापात में 150 उल्का प्रति घंटे नज़र आयेंगी जो सामान्य से अधिक हैं परन्तु उल्काओं की यह बढ़ी संख्या चन्द्रमा की चमक में छुप जाएगी।
खगोलविद उम्मीद जता रहे हैं कि पेर्सेइड उल्कापात की चमक चन्द्रमा की रोशनी से अधिक नहीं दबेगी और फिर देखने वालों का उत्साह इसकी चमक को बरकरार रखेगा।
पेर्सेइड उल्कापात की समाप्ति पर प्रातः काल पूर्व की ओर चमकीला ग्रह शुक्र को भी देखा जा सकता है, जो कि सूर्य और चन्द्रमा के बाद तीसरा सबसे चमकदार ग्रह है।
तो आइये पेर्सेइड उल्कापात की दुर्लभ घटना का अवलोकन कर आनन्दित हो।

डॉ. मुकेश ओझा
(लेखक महर्षि वैदिक विश्व विद्यालय के ज्योतिष प्रवक्ता हैं।
एवं मोमेन्टम समूह वाराणसी के मार्गदर्शक हैं।)
स्रोत : बी बी सी हिंदी

नक्षत्रों के अनुसार पेड़ ,बगीचा ,बाटिका लगायें?

अपने -अपने नक्षत्रों के अनुसार "पेड़ " लगायें।

-ग्रहों की शांति हेतु- पूजा -पाठ ,यज्ञ हवन में विशेष प्रजाति के पल्लव {टहनी } पुष्प ,फूल ,फल ,काष्ट{समिधा }की आवश्यकता पड़ती है ,जो कि नवग्रह एवं नक्षत्रों से सम्बंधित पौधे ही होतें हैं । आज मै आपके.  साथ डॉ. मुकेश ओझा के विचारों से अवगत कराता  हूँ
पुराणों के अनुसार जिस नक्षत्र वा ग्रह से आप प्रभावित हो उस समय उस नक्षत्र से सम्बन्धी पौधे का यत्नपूर्वक संरक्षण तथा पूजन से ग्रह की शांति होती है तथा जातक को मनोवांछित फल मिलता है ।।.    
----क्यों न हमलोग --अपनी सुख समृधि के लिए - अपने -अपने नक्षत्रों के अनुसार पेड़ ,बगीचा ,बाटिका लगायें?--ध्यान दें अपने -अपने नक्षत्र  को अगर जानते हैं तो दी गई जानकारी से पेड़ अपने -अपने घर में या घर के सामने लगाएं वही लाभ मिलेगा जो पूजा -पाठ या रत्नों से मिलता है ! समस्त प्रकार के पेड़ -पौधें प्रत्येक शहर की नर्सरी में प्रायः उपलब्ध रहते हैं या आपके तनिक से प्रयास से उपलब्ध हो सकते हैं । ।
{1 }-अश्विनी ---का -पेड़ =--कुचिला
{2}-भरणी----का पेड़ -----आंवला
{3 }-कृतिका -का पेड़ ---गूलर
{4 }-रोहिणी --का पेड़ -जामुन
{5 }-मृगशिरा का पेड़ = बांस.
{7 }-पुनर्वसु ----का पेड़ -----खैर
{6}}-आर्द्रा-----का पेड़ ---शीशम.
{8 }-पुष्य -----का पेड़ ---पीपल
{9 }-आश्लेषा -का पेड़ --नागकेसर
{10 }-मघा---का पेड़ --बरगद
{11 }-पुर्वा फाल्गुनी---का पेड़ --ढ़ाक
{12 }-उत्तरी फाल्गुनी का पेड़ ---पाकड़ 
{13 }-हस्त ---रीठा
{14 }-चित्रा------वेळ
{15 }-स्वाती ------अर्जुन.
{16 }-विशाखा ---कटाई.
{17 }-अनुराधा ---मौलश्री. 
{18 }-ज्येष्ठा-----चीड़का पेड़ .
[19 }-मूल --का पेड़ --साल.
{20 }-पूर्वाषाढा--का पेड़ -जलवेतस.
{21 }-उत्तराषाढा ----का पेड़ =कटहल
{22 }-अभिजित{ xxx}
{23 }-श्रवण --का पेड़ =-मदार.
{24 }-शतभिषा --का पेड़ -कदम्ब.
{25 }-पूर्वा भाद्रपद ---का पेड़ -आम.
{26 }-उत्तरा भाद्रपद --का पेड़ --नीम.
{27 }--रेवती --का पेड़ ---महुआ.------

नोट --उक्त नक्षत्रों के पौधे हैं जो आप --ग्रह जनित दोषों के निवारणार्थ सरलता से पौधे {रोप }लगा सकते हैं । ग्रह ,नक्षत्रों के पौधों का उल्लेख ,पौराणिक ज्योतिष ,आयुर्वेदिक ,तांत्रिक व् अन्य  ग्रंथों में मिलता है --इनमें से प्रमुख ग्रन्थ हैं --
{१}-नारद पुराण{२}-ज्योतिष ग्रन्थ हैं --नारद संहिता {३}-आयुवेदिक ग्रन्थ --राज निघंट वृहत धू श्रुत नारायणी संहिता {४}-तांत्रिक ग्रन्थ -शारदा तिलक ,मन्त्रमहार्णव ,श्री विद्यार्नव तंत्र आदि {५} अन्य ग्रंथ---आनादाश्रम प्रकाशन ,वनस्पति ---अध्यात्म ,नक्षत्र वृक्ष आदि ।।.-
मै आप सभी सज्जनों से आशा करता हूँ कि यदि ज्योतिष की बात जनहित और देश हित में है तो बृक्षों को अवश्य लगाए।
आपका ज्योतिषी ।। डॉ. मुकेश ओझा।।
आप सदा आनन्दित रहें।

Saturday, August 5, 2017

आत्मज्ञान किसे और कैसे होता है?

आत्मा के सही स्वरूप का ज्ञान किसे और कैसे मिलता है इस बात का उल्लेख मुंडकोपनिषद के अधःप्रस्तुत  मंत्र में मिलता है:

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।।

अर्थ – यह आत्मा प्रवचनों से नहीं मिलती है और न ही बौद्धिक क्षमता से अथवा शास्त्रों के श्रवण-अध्ययन से । जो इसकी ही इच्छा करता है उसे यह प्राप्त होता है, उसी के समक्ष यह आत्मा अपना स्वरूप उद्घाटित करती है ।

धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनने से, शास्त्रों के विद्वत्तापूर्ण अध्ययन से, अथवा ढेर सारा शास्त्रीय वचनों को सुनने से यह ज्ञान नहीं मिल सकता है । इस ज्ञान का अधिकारी वह है जो मात्र उसे पाने की आकांक्षा रखता है ।  आत्मज्ञान के लिए केवल एक शर्त है उसे पाने की इच्छा क्योंकि आत्मा को कही खोजना नहीँ है वह हम ही हैं ।।

Friday, August 4, 2017

नारदभक्तिसूत्र

*_नारदभक्तिसूत्रम्_*

*अध्यायः १*
*पराभक्तिस्वरूपम्*

१. अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः ||
२. सा त्वस्मिन् पर(म)प्रेमरूपा ||
३. अमृतस्वरूपा च ||
४. यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति ||
५. यत्प्राप्य न किञ्चिद्वाञ्छति, न शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, न उत्साही भवति ||
६. यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति ||
७. सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात् ||
८. निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः ||
९. तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषु उदासीनता च ||
१०. अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ||
(भगवद्गीता- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||)
११. लोकवेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषु उदासीनता ||
१२. भवतु निश्चयदार्ढ्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम् ||
१३. अन्यथा पातित्याशङ्कया ||
१४. लोकोऽपि तावदेव, भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि ||
१५. तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ||
१६. पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः ||
१७. कथादिष्विति गर्गः ||
१८. आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः ||
१९. नारदस्तु तदर्पित अखिलाचारता, तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ||
२०. अस्त्येवमेवम् ||
२१. यथा व्रजगोपिकानाम् ||
(भागवतम् १०|४६)
२२. तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः ||(भागवतम् १०|२९|३२,३६)
२३. तद्विहीनं जाराणामिव ||
(भागवतम् १०|२९|४१, १०|३१|४)
२४. नास्त्येव तस्मिन् तत्सुखसुखित्वम् ||
—————
*अध्यायः २*
*पराभक्तिमहिमा*

२५. सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा ||
२६. फलरूपत्वात् ||
२७. ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वात्, दैन्यप्रियत्वात् च ||
२८. तस्याः ज्ञानमेव साधनमित्येके ||
२९. अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये ||
३०. स्वयंपलरूपतेति ब्रह्मकुमारः ||
३१. राजगृहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात् ||
३२. न तेन राजा परितोषः क्षु (धाशा) च्छान्तिर्वा ||
३३. तस्मात् सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः ||
——————
*अध्यायः ३*
*भक्तिसाधनम्*

३४. तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः ||
३५. तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च ||
३६. अव्यावृत्त (त) भजनात् ||
३७. लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात् ||
३८. मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा ||
३९. महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च ||
४०. लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव ||
४१. तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ||
४२. तदेव साध्यताम्, तदेव साध्यताम् ||
४३. दुस्सङ्गः सर्वथैव त्याज्यः ||
४४. कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात् ||
४५. तरङ्गायिता अपीमे सङ्गात्समुद्रायन्ति ||
४६. कस्तरति कस्तरति मायाम् ? यः सङ्गं त्यजति, यो महानुभावं सेवते, यो निर्ममो भवति ||
४७. यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति, निस्त्रैगुण्यो भवति, यो योगक्षेमं त्यजति ||
४८. यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति, ततो निर्द्वन्द्वो भवति ||
४९. वेदानपि संन्यस्यति; केवलं अविच्छिन्नानुरागं लभते ||
५०. स तरति स तरति, स लोकांस्तारयति ||
——————
*अध्यायः ४*
*भक्तिलक्षणम्*

५१. अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् ||
५२. मूकास्वादनवत् ||
५३. प्रकाशते क्वापि पात्रे ||
५४. गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानम् अविच्चिन्नं सूक्ष्मतरं अनुभवरूपम् ||
५५. तत्प्राप्य तदेव अवलोकयति, तदेव शृणोति,तदेव भाषयति, तदेव चिन्तयति ||
५६. गौणी त्रिधा, गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा ||
५७. उत्तरस्मादुत्तरस्मात् पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति ||
५८. अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ |य
५९. प्रमाणान्तरस्य अनपेक्षितत्वात्, स्वयं प्रमाणत्वात् ||
६०. शान्तिरूपात् परमानन्दरूपाच्च ||
६१. लोकहानौ चिन्ता न कार्या, निवेदितात्मलोकवेदत्वात् ||
६२. न तत्सिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः, किन्तु फलत्यागः तत्साधनं च कार्यमेव ||
६३. स्त्री-धन-नास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम् ||
६४. अभिमान-डम्भादिकं त्याज्यम् ||
६५. तदर्पित-अखिल-आचारः सन्, कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम् ||
६६. त्रिरूपभङ्गपूर्वकं नित्यदासनित्यकान्ताभजनात्मकं प्रेमकार्यं प्रेमैव कार्यम् ||
—————
*अध्यायः ५*
*भक्तमहिमा*

६७. भक्ता एकान्तिनो मुख्याः ||
६८. कण्ठावरोध-रोमाञ्चाश्रुभिः परस्परं लापमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च ||
६९. तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि, सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि, सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि ||
७०. तन्मयाः ||
७१. मोदन्ते पितरो, नृत्यन्ति देवताः, सनाथा चेयं भूर्भवति ||
७२. नास्ति तेषु जाति-विद्या-रूप-कुल-धन-क्रियादिभेदः ||
७३. यतः तदीयाः ||
७४. वादो न अवलम्ब्यः ||
७६. भक्तिशास्त्राणि मननीयानि, तदुद्बोधककर्माणि करणीयानि ||
७७. सुखदुःखेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्धमपि व्यर्थं न नेयम् ||
७८. अहिंसा-सत्य-शौच-दया-आस्तिक्यादि-चारित्र्याणि परिपालनीयानि ||
७९. सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तैः भगवानेव भजनीयः ||
८०. स कीर्त्यमानः शीघ्रमेवाविर्भवति अनुभावयति च भक्तान् ||
८१. त्रिसत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी, भक्तिरेव गरीयसी ||
८२. गुणमाहात्म्यासक्ति-रूपासक्ति-पूजासक्ति-स्मरणासक्ति-दास्यासक्ति-सख्यासक्ति-वात्सल्यासक्ति-कान्तासक्ति-आत्मनिवेदनासक्ति-तन्मयतासक्ति-परमविरहासक्ति-रूपा एकधा अपि एकादशधा भवति ||
८३. इत्येवं वदन्ति जनजल्पनिर्भयाः एकमताः कुमार-व्यास-शुक-शाण्डिल्य-गर्ग-विष्णु-कौण्डिन्य-शेष-उद्धव-आरुणि-बलि-हनुमद्-विभीषणादयो भक्ताचार्याः ||
८४. य इदं नारदप्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसति, श्रद्धते, स भक्तिमान् भवति, सः प्रेष्ठं लभते सः प्रेष्ठं लभते ||

*_इति नारदभक्तिसूत्रं समाप्तम् ||_*

सदन कसाई की कथा

सदन कसाई की कथा -

''जाति पाँति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।''

सदन भगवान श्री जगन्नाथ जी के परम भक्त थे। इनको बचपन से ही भगवन्नाम-जप और हरि कीर्तन प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। ये जाति से कसाई थे, फिर भी इनका हृदय दया से पूर्ण था। जीव-वध के नाम से ही इनका शरीर काँपने लगता था। आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, स्‍वयं अपने हाथ से पशु-वध नहीं करते थे।

जाति पाँति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।

परिचय

प्राचीन समय में सदन नामक कसाई जाति के एक भक्त हुए थे। बचपन से भगवन्नाम-जप और हरि कीर्तन इन्‍हें प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। यद्यपि ये जाति से कसाई थे, फिर भी इनका हृदय दया से पूर्ण था। जीव-वध के नाम से ही इनका शरीर काँपने लगता था। आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, स्‍वयं अपने हाथ से पशु-वध नहीं करते थे। इस काम में भी इनका मन लगता नहीं था, पर मन मारकर जाति-व्‍यवसाय होने से करते थे। सदा नाम-जप, भगवान के गुण-गान और लीलामय पुरुषोत्तम के चिन्‍तन में लगे रहते थे। सदन का मन श्री हरि के चरणों में रम गया था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे।

भगवान अपने भक्त से दूर नहीं रहा करते। भक्त को जैसे उनके बिना चैन नहीं, वैसे ही उन्‍हें भी भक्त के बिना चैन नहीं। सदन के घर में भगवान शालग्राम रूप में विराजमान थे। सदन को इसका पता नहीं था। वे तो शालग्राम को पत्‍थर का एक बाट समझते थे और उनसे मांस तौला करते थे।

साधु का स्‍वप्‍न

एक दिन एक साधु सदन की दुकान के सामने से जा रहे थे। दृष्टि पड़ते ही वे शालग्राम जी को पहचान गये। मांस-विक्रेता कसाई के यहाँ अपवित्र स्‍थल में शालग्राम जी को देखकर साधु को बड़ा क्‍लेश हुआ। सदन से माँगकर वे शालग्राम को ले गये। सदन ने भी प्रसन्नतापूर्वक साधु को अपना वह चमकीला बाट दे दिया। साधु बाबा कुटिया पर पहुँचे। उन्‍होंने विधिपूर्वक शालग्राम जी की पूजा की; परंतु भगवान को न तो पदार्थों की अपेक्षा है न मंत्र या विधि की। वे तो प्रेम के भूखे हैं, प्रेम से रीझते हैं। रात में उन साधु को स्‍वप्‍न में भगवान ने कहा- "तुम मुझे यहाँ क्‍यों ले आये? मुझे तो अपने भक्त सदन के घर में ही बड़ा सुख मिलता था। जब वह मांस तौलने के लिये मुझे उठाता था, तब उसके शीतल स्‍पर्श से मुझे अत्‍यन्‍त आनन्‍द मिलता था। जब वह ग्राहकों से बातें करता था, तब मुझे उसके शब्‍द बड़े मधुर स्‍तोत्र जान पड़ते थे। जब वह मेरा नाम लेकर कीर्तन करता, नाचने लगता था, तब आनन्‍द के मारे मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता था। तुम मुझे वहीं पहुँचा दो। मुझे सदन के बिना एक क्षण कल नहीं पड़ती।"

साधु महराज जगे। उन्‍होंने शालग्राम जी को उठाया और सदन के घर जाकर उसे दे आये। साथ ही उसको भगवत्‍कृपा का महत्त्व भी बता आये। सदन को जब पता लगा कि उनका यह बटखरा तो भगवान शालग्राम हैं, तब उन्‍हें बड़ा पश्‍चात्ताप हुआ। वे मन-ही-मन कहने लगे- "देखो, मैं कितना बड़ा पापी हूँ। मैंने भगवान को निरादरपूर्वक अपवित्र मांस के तराजू का बाट बना रखा। प्रभो ! अब मुझे क्षमा करो।" अब सदन को अपने व्‍यवसाय से घृणा हो गयी।

प्रभु की लीला

सदन कसाई शालग्राम जी को लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्र श्री जगन्नाथ पुरी को चल पड़े। मार्ग में सन्‍ध्‍या-समय सदन जी एक गाँव में एक गृहस्‍थ के घर ठहरे। उस घर में स्‍त्री-पुरुष दो ही व्‍यक्ति थे। स्‍त्री का आचरण अच्‍छा नहीं था। वह अपने घर ठहरे हुए इस स्‍वस्‍थ, सुन्‍दर, सबल पुरुष पर मोहित हो गयी। आधी रात के समय सदन जी के पास आकर वह अनेक प्रकार की अशिष्‍ट चेष्‍टाएं करने लगी। सदन जी तो भगवान के परम भक्त थे। उन पर काम की कोई चेष्‍टा सफल न हुई। वे उठकर, हाथ जोड़कर बोले- "तुम मेरी माता हो ! अपने बच्‍चे की परीक्षा मत लो, माँ ! मुझे तुम आशीर्वाद दो।"

भगवान के सच्‍चे भक्त पर-स्‍त्री को माता ही देखते हैं। स्‍त्री का मोहक रूप उनको भ्रम में नहीं डालता। वे हड्डी, मांस, चमड़ा, मल-मूत्र, थूक-पीब की पुतली को सुन्‍दर मानने की मूर्खता कर ही नहीं सकते; परंतु जो काम के वश हो जाता है, उसकी बुद्धि मारी जाती है। वह न सोच-समझ पता, न कुछ देख पाता। वह निर्लज्‍ज और निर्दय हो जाता है। उस कामातुरा स्‍त्री ने समझा कि मेरे पति के भय से ही यह मेरी बात नहीं मानता। वह गयी और तलवार लेकर सोते हुए अपने पति का सिर उसने काट दिया। कामान्‍ध कौन-सा पाप नहीं कर सकता। अब वह कहने लगी- "प्‍यारे ! अब डरो मत। मैंने अपने खूसट पति का सिर काट डाला है। हमारे सुख का कण्‍टक दूर हो गया। अब तुम मुझे स्‍वीकार करो।"

सदन भय से काँप उठे। स्‍त्री ने अनुनय-विनय करके जब देख लिया कि उसकी प्रार्थना स्‍वीकार नहीं हो सकती, तब द्वार पर आकर छाती पीट-पीटकर रोने लगी। लोग उसका रुदन सुनकर एकत्र हो गये। उसने कहा- "इस यात्री ने मेरे पति को मार डाला है और यह मेरे साथ बलात्‍कार करना चाहता था।" लोगों ने सदन को खूब भला बुरा कहा, कुछ ने मारा भी; पर सदन ने कोई सफाई नहीं दी। मामला न्‍यायाधीश के पास गया। सदन तो अपने प्रभु की लीला देखते हुए अन्‍त तक चुप ही बने रहे। अपराध सिद्ध हो गया। न्‍यायाधीश की आज्ञा से उनके दोनों हाथ काट लिये गये।

पुजारी को भगवान का आदेश

सदन के हाथ कट गये, रुधिर की धारा चलने लगी; उन्‍होंने इसे अपने प्रभु की कृपा ही माना। उनके मन में भगवान के प्रति तनिक भी रोष नहीं आया। भगवान के सच्‍चे भक्त इस प्रकार निरपराध कष्‍ट पाने पर भी अपने स्‍वामी की दया ही मानते हैं। भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए सदन जगन्नाथ पुरी चल पड़े। उधर पुरी में प्रभु ने पुजारी को स्‍वप्‍न में आदेश दिया- "मेरा भक्त सदन मेरे पास आ रहा है। उसके हाथ कट गये हैं। पालकी लेकर जाओ और उसे आदरपूर्वक ले आओ।" पुजारी पालकी लिवाकर गये और आग्रहपूर्वक सदन को उसमें बैठाकर ले आये।

चमत्कारिक प्रसंग

सदन ने जैसे ही श्री जगन्नाथ जी को दण्‍डवत करके कीर्तन के लिये भुजाएँ उठायी, उनके दोनों हाथ पूर्ववत ठीक हो गये। प्रभु की कृपा से हाथ ठीक तो हुए, पर मन में शंका बनी ही रही कि वे क्‍यों काटे गये। भगवान के राज्‍य में कोई निरपराध तो दण्‍ड पाता नहीं। रात में स्‍वप्‍न में भगवान ने सदन जी को बताया- "तुम पूर्वजन्‍म में काशी में सदाचारी विद्वान ब्राह्मण थे। एक दिन एक गाय कसाई के घेरे से भागी जाती थी। उसने तुम्‍हें पुकारा। तुमने कसाई को जानते हुए भी गाय के गले में दोनों हाथ डालकर उसे भागने से रोक लिया। वही गाय वह स्‍त्री थी और कसाई उसका पति था। पूर्वजन्‍म का बदला लेने के लिये उसने उसका गला काटा। तुमने भयातुरा गाय को दोनों हाथों से पकड़कर कसाई को सौंपा था, इस पाप से तुम्‍हारे हाथ काटे गये। इस दण्‍ड से तुम्‍हारे पाप का नाश हो गया।"

परमधाम गमन

सदन ने भगवान की असीम कृपा का परिचय पाया। वे भगवत्‍प्रेम में विह्वल हो गये। बहुत काल तक नाम-कीर्तन, गुणगान तथा भगवान के ध्‍यान में तल्‍लीन रहते हुए उन्‍होंने पुरुषोत्तम क्षेत्र में निवास किया और अन्‍त में श्री जगन्‍नाथ जी के चरणों में देह त्‍यागकर वे परमधाम पधारे।