Saturday, September 2, 2017

दम तोड़ रही भाषाएँ


भारत में ये भाषाएं दम तोड़ रही हैं

दुनिया में सैकड़ों भाषाएं दम तोड़ने के कगार पर हैं. यूनेस्को के मुताबिक 577 ऐसे भाषाएं है जिन पर लुप्त होने का सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है. इसमें भारत की 42 भाषाएं शामिल हैं. इनमें अधिकतर आदिवासी इलाकों की भाषाएं हैं.

जारवा

यूनेस्को के अनुसार दक्षिण अंडमान द्वीप की जारवा भाषा को बोलने वाले अब सिर्फ 31 लोग बचे हैं. इस इलाके की और भी कई भाषाओं पर खतरा मंडरा रहा है.

ग्रेट अंडमानीज

इस भाषा को अका जेरू या जेरू भी कहते हैं. मध्य और उत्तरी अंडमान में प्रचलित रही इस भाषा को बोलने वाले सिर्फ पांच लोग हैं. यूनेस्को के पास यह आंकड़ा 2007 का है.


सेंटीनल

अंडमान द्वीप पर बोली जाने वाली भाषा सेंटीनल भी दम तोड़ने के कगार पर है. इसे बोलने वाले लोगों की संख्या अब 50 से भी कम बची है.

ओंगे

यूनेस्को का कहना है कि ओंगे भाषा को बोलने वाले लोगों का आंकड़ा भी 50 ही माना जाता है, हालांकि वास्तविक संख्या इससे काफी कम हो सकती है.

शोमपेन

ग्रेट निकोबार आइलैंड के जंगलों में रहने वाले लोग इस भाषा को बोलते हैं. असली संख्या पता नहीं लेकिन अनुमान है कि अब इसे सिर्फ 100 लोग ही इस्तेमाल करते हैं.

लामोंगीज

लिटिल निकोबार और कोंडुल द्वीपों पर लामोंगीज भाषा बोली जाती है. लेकिन अब इसे बोलने वाले सिर्फ 400 लोग बचे हैं.

ताराओ

ताराओ भाषा पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के चंदेल और उखरुल जिले के इलाकों में बोली जाती है. 2001 की जनगणना के अनुसार अब सिर्फ 870 लोग ताराओ भाषा बोलते हैं.

पुरुम

मणिपुर के सेनापाटी जिले के फाइजोल, लाइकोट, थुइसेनपाई और खरम पालेन गांवों में यह भाषा बोली जाती है. माना जाता है कि अब इसे बोलने वाले सिर्फ 503 लोग ही बचे हैं.

तंगम

अरुणाचल प्रदेश के तंगम गांव में इस भाषा को बोलने वाले लोग रहते हैं. उसी के नाम पर इसका नाम भी पड़ा है. इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 100 के आसपास है.

म्रा

अरुणाचल प्रदेश की ऊपरी सुबानसीरी नदी घाटी के कुछ गावों में यह भाषा बोली जाती है. ताजा आंकड़ों के अनुसार अब सिर्फ 350 लोग ही इस भाषा को बोलते हैं.

ना

चीन से लगने वाले अरुणाचल प्रदेश के कुछ गांवों में ना भाषा भी चलती है. लेकिन इसे इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या सिमट कर अब 350 रह गयी है.

ग्रहों के रंग रत्न और धातु

ग्रहों के रंग रत्न और धातु
++++++++++++++++
क्रम ग्रह         कपडे का रंग      धातु       रत्न           उपरत्न
1 सूर्य            केशरिया        तांबा      माणिक्य       लाडली
2 चन्द्र             सफ़ेद         चांदी       मोती         मून स्टोन
3 मंगल             लाल         तांबा       मूंगा लाल    हकीक
4 बुध               हरा          स्वर्ण       पन्ना           जेड
5 गुरु               पीला        स्वर्ण       पुखराज   सुनहला
6 शुक्र             सफ़ेद        स्वर्ण         हीरा        जिर्कान
7 शनि            काला          रांगा       नीलम      काकानीली
8 राहु            नीला           लोहा       गोमेद         तुरमुली
9 केतु           धारीदार      पंचधातु    लहसुनिया      सुलेमानी

मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे, यह एक गलत धारणा है।

मिथक : मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे।

आपने यह कई जगह पढ़ा होगा कि मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे! डार्विन के विकासवाद के विरोधी तथा धार्मिक कथाओं मे विश्वास करने वाले भी यह कहते रहते है कि यदि मानवो का विकास बंदरो से हुआ है तो अभी तक बंदर क्यो बचे हुये है, उन्हे मानव या कम से कम आदिमानव अवस्था मे होना चाहिये।

सत्य क्या है ?

वैज्ञानिक तथ्य यह है कि बंदर मानव के पूर्वज नही है। यह गलतफहमी चित्र के बांये भाग मे दिखाये गये प्रसिद्ध भाग से उपजी है। इस चित्र का प्रयोग डार्विन के क्रमिक विकासवाद को दर्शाने के लिये किया जाता है। यह चित्र जीवन के विकासवाद का गलत चित्रण है।

पृथ्वी पर जीवन का प्रारंभ अमीबा जैसे एक कोशीय जीव से हुआ है। इन एक कोशीय जीवो से बहु कोशीय जीव बने। इन बहुकोशीय जीवो मे क्रमिक विकास से अन्य जीव बनते गये। यह विकास एक वृक्ष की तरह हुआ है। जीवन की हर प्रजाती इस वृक्ष की एक शाखा है। चित्र का दांया भाग देखे।

इस तरह से सारे जीवों का पूर्वज एक कोशीय जीव था। इस एक कोशीय जीव से सारी प्रजातियाँ उत्पन्न हुयी है। उसी तरह से बंदर (वानर प्रजाति) और मानव जाति का पूर्वज एक ही जीव प्रजाति थी। इस आदीवानर-मानव प्रजाति की दो शाखाये बनी, एक शाखा मानव के रूप मे विकसित हुयी, दूसरी शाखा से वानर प्रजाति बनी। मानव की शाखा से भी अन्य आधुनिक प्रजातियाँ बनी, जैसे अफ़्रीकी मानव, मंगोलीय मानव, युरेशीयन मानव इत्यादि! दूसरी शाखा से वानर की अन्य प्रजाति जैसे बंदर, लंगूर, चिम्पाजी, ओरेंग उटांग, बनमानुष जैसी प्रजातियाँ बनी।
इस तरह से देखे तो यह स्पष्ट है कि बंदर मानव के पूर्वज नही है, बल्कि बंदरो तथा मानवो का पूर्वज एक ही है। वानरो को मानवो का चचेरा भाई माना जा सकता है।

दूसरा प्रश्न कि यदि मानवो का विकास बंदरो से हुआ है तो अभी तक बंदर क्यो बचे हुये है, उन्हे मानव या कम से कम आदिमानव अवस्था मे होना चाहिये। यह प्रश्न उपर दिये गये तथ्य की रोशनी मे बेमानी हो जाता है। हर प्रजाति मे विकास की दर अलग होती है, मानव मे यह दर तेज है, अन्य प्रजाति मे यह दर धीमी है। वानरो मे विकास हो रहा है, लेकिन उन्हे मानव के समकक्ष आने मे लाखो वर्ष लग सकते है।

-डॉ मुकेश ओझा 

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार 

Tuesday, August 29, 2017

भवान्यष्टकम् अर्थ सहित

।। भवान्यष्टकम् ।।

न  तातो  न  माता  न  बन्धुर्न दाता
न  पुत्रों  न  पुत्री  न  भृत्यो  न  भर्ता।
न  जाया  न  विद्या  न  वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं  त्वमेका  भवानी।।

अर्थात:

हे भवानी ! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, नौकर, स्वामी, स्त्री, विद्या, वृत्ति --इनमें से कुछ भी मेरा नहीं है।
हे देवी ! तुम्ही एकमात्र मेरी गति हो।

भवाब्धावपारे        महादु:खभीरु:
पपात   प्रकामी   प्रलोभी   प्रमत्त:।
कुसंसारपाशप्रबद्धः           सदाहं
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं  त्वमेका  भवानी ।।

अर्थात:

मैं विशाल भवसागरमें, महादुःखों से कायर हो चुका हु। मैं कामी, लोभी, और प्रमत्त बनकर अनिच्छनीय ऐसे संसार के बंधनों में सदा सदा बंधा पड़ा हुँ।
हे भवानी ! अब तुम्ही एकमात्र मेरी गति हो।।

न  जानामि  दानं   न    च   ध्यानयोगं
न  जानामि  तन्त्रं   न   च  स्तोत्रमन्त्रम्।
न  जानामि  पूजां   न   च    न्यासयोगं
गतिस्त्वं   गतिस्त्वं  त्वमेका    भवानी।।

अर्थात:

मैं दान देना नही जानता, ध्यानयोग की मुझे जानकारी नही। पूजा और मंत्र का भी मुझे ज्ञान नही है, और न्यासादि कर्मकांड से तो मैं बिलकुल अनजान हूँ ।
हे भवानी ! अब तुम्ही एकमात्र मेरी शरण हो।।

न  जानामि  पुण्यं  न  जानामि  तीर्थं
न  जानामि  मुक्तिं  लयं  वा  कदाचित्।
न  जानामि  भक्तिं  व्रतं   वापि    मातः
गतिस्त्वं   गतिस्त्वं   त्वमेका      भवानी ।।

अर्थात:

मैं पुण्य जानता नहीं, ना ही तीर्थ, लय या मुक्ति का तो मुझे बान है।
हे माता! भक्ति या व्रत भी मै नही जानता। हे भवानी! अब तो तुम्ही केवल मेरी शरण हो।।

कुकर्मी   कुसंगी   कुबुद्धिः   कुदासः
कुलाचारहीनः           कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः   कुवाक्यप्रबन्धः      सदाहं
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं   त्वमेका  भवानी।।

अर्थात:

मैं खराब कर्म वाला, खराब संगत में रहने वाला, खराब आदतों का गुलाम, कुल की शोभा बढ़े ऐसे मेरे आचरण भी नही है, दुराचारों में व्यस्त, खराब दृष्टि वाला, अयोग्य शब्द बोलने में माहिर हूँ मै।
हे भवानी! अब तो तुम्ही एकमात्र मेरी शरण हो।।

प्रजेशं     रमेशं      महेशं     सुरेशं
दिनेशं   निशीथेश्वरं  वा   कदाचित।
न   जानामि  चान्यत्  सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं  त्वमेका   भवानी।।

अर्थात:

मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चंद्रमा या अन्य कोई देवताओं को तो मै जानता भी नही हूँ ।
सदा सदा शरण देने वाली हे भवानी!
तुम्ही मेरी एकमात्र गति हो ।।

विवादे   विषादे   प्रमादे   प्रवासे
जले  चानले  पर्वते       शत्रुमध्ये।
अरण्ये  शरण्ये  सदा  मां    प्रपाहि
गतिस्त्वं   गतिस्त्वं  त्वमेका भवानी।।

अर्थात:

हे शरण में आनेवाले की रक्षा करनेवाली !
विवाद, विषाद, प्रमाद, प्रवास, जल, अग्नि, पर्वत, शत्रु, जंगल के बीच ( आपत्ति के बीच ) सदा  मेरी रक्षा करना।
हे भवानी! तुम्ही एकमात्र मेरी गति हो।।

अनाथो  दरिद्रो     जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः   सदाजाऽयवक्त्रः।
विपत्तौ  प्रविष्टः   प्रणष्टः   सदाहं
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं। त्वमेका  भवानी।।

अर्थात:

हे देवी!  मैं सदा सदा के लिए अनाथ, दरिद्र, वृद्धावस्था से क्षीण, रोगी, अति दुर्बल, दीन, जड़, आपदाओं में फँसा हुआ, खत्म हो चुका हूँ।
हे भवानी! तुम्ही एकमात्र मेरी शरण हो।।

इति श्रीमच्छंऽकराचार्यविरचितं भवान्यष्टकं संपूर्णं।

।। गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ।।
हे माँ ! मै मंदबुद्धि जड तेरे शरण के योग्य हूँ ।।
शरणम् मम।।

Sunday, August 27, 2017

शंकराचार्य और भगवान शंकर का काशी में शास्त्रार्थ

मुझे आदि शंकराचार्य के बारे में एक सूंदर घटना का स्मरण आता है, वे पहले शंकराचार्य थे, जिन्होंने चार मंदिरों का निर्माण करवाया था--चारों दिशाओं में बैठे चार शंकराचार्यों के लिए चार गद्दियां। संभवत: पूरी दुनिया में वे उस वर्ग के दार्शनिको में सबसे प्रसिद्ध हैं जो कि यह सिद्ध करने में लगे हैं कि सब माया है। निसंदेह वे एक महान तार्किक थे, क्योंकि वह निरंतर दूसरे दार्शनिकों को पराजित करते आए थे उन्होंने देश भर में घूम कर बाकी सभी दर्शनशास्त्र के विद्यालयों को हरा दिये। उन्होंने अपने दर्शनशास्त्र को एकमात्र उचित दर्शन के रूप में स्थापित कर दिया । वह एकमात्र दृष्टिकोण: कि सब कुछ झूठ है, सब माया है।

शंकराचार्य वाराणसी में थे। एक दिन, सुबह-सुबह--अभी अंधेरा ही था, क्योंकि हिन्दू पंडित सूरज उगने से पहले ही नहा लिया करते हैं--उन्होंने स्नान किया। और जब वे सीढ़ियों से ऊपर आ ही रहे थे, एक आदमी ने उनको छू लिया और ऐसा गलती से नहीं हुआ था यह उसने जानबूझ कर किया था, "क्षमा करें मैं क्षुद्र हूं, आप को गलती से छू लिया परंतु अब आप को स्वच्छ होने के लिए दौबारा स्नान करना होगा।"

शंकराचार्य क्रोधित हो गए। वे बोले, "यह तुमसे गलती से नहीं हुआ, जिस तरीके से तुमने ऐसा किया; उससे साफ़ पता चलता है कि यह तुमने जान-बूझ के किया था। तुम्हे नरक भोगना होगा।"
वह व्यक्ति बोला, "जब सब-कुछ माया है, तो लगता है अवश्य ही नरक सत्य होगा।" शंकराचार्य तो यह सुन कर स्तभ्ध रह गए।

वह व्यक्ति बोला, "इससे पहले कि तुम स्नान करने जाओ, तुम्हे मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर देना होगा। यदि तुमने मेरे उत्तर नहीं दिए तो अब जब भी तुम स्नान कर के आओगे मैं तुम्हारा स्पर्श कर लूंगा।"
उस समय वहां एकांत था, सिवाय उन दोनों के कोई नही था, तो शंकराचार्य ने कहा, "तुम बड़े अजीब व्यक्ति हो। क्या हैं तुम्हारे प्रश्न?"

उसने कहा, "मेरा पहला प्रश्न है: क्या मेरा शरीर भ्रम है? क्या आपका शरीर भ्रम है? और यदि दो भ्रम शरीर एक दुसरे का स्पर्श कर लेते हैं तो, इसमें आपत्ति क्या है? क्यों आप एक और स्नान लेने के लिए जा रहे हो? जो उपदेश आप देते हो उसका पालन स्वयं ही नहीं करते । एक माया के जगत में, क्या एक अछूत और ब्राह्मण में कोई भेद हो सकता है?- पवित्र और अपवित्र में ?--जब दोनों ही भ्रम हैं, जब दोनों उसी एक तत्व के बने हो जिनके सपने बने होते हैं? तब कैसा उपद्रव?"

शंकराचार्य, जो कि बड़े-बड़े दार्शनिको को पराजित कर रहे थे, इस सरल से व्यक्ति को कोई उत्तर नहीं दे पाए क्योंकि जो भी उत्तर वे देते वो उनके खुद के दर्शन के विरुद्ध होता। यदि वे कहते हैं कि यह भ्रम है, तब इसमें क्रोधित होने जैसा कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यदि वे कहते कि ये सत्य है, तब वे इस तथ्य को स्वीकार करते कि शरीर सत्य है... पर तब एक समस्या है। यदि मनुष्य का शरीर सत्य है, तब पशुओं का शरीर, पेड़ो का शरीर, ग्रहों का शरीर, सितारों... सब सत्य है।

और उस व्यक्ति ने कहा, "मैं इस बात से अवगत हूं की आपको इसका उत्तर नहीं पता--यह आपके सारे दर्शनशास्त्र को नष्ट कर देगा। मैं आपसे एक और प्रश्न करता हूं: मैं एक क्षुद्र हूं, अछूत हूं, अपवित्र हूं, मेरी अपवित्रता कहां है--मेरे शरीर में या कि मेरी आत्मा में? मैंने आपको यह घोषणा करते सुना है कि आत्मा पूर्ण और शाश्वत रूप से पवित्र है, और उसे अपवित्र करने का कोई उपाय नहीं है; तो दो आत्माओं के बीच भेद कैसे हो सकता है? दोनों ही पवित्र हैं, पूर्णता, पवित्र और अपवित्रता की कोई सीमा नहीं होती--कि कोई ज्यादा पवित्र हो और कोई कम। तो हो सकता है कि मेरी आत्मा ने आपको अपवित्र कर दिया है और आपको दूसरा स्नान करना पड़ रहा है?

अब यह और भी कठिन था। लेकिन वे कभी भी इस तरह के परेशानी में नहीं पड़े थे-- यथार्थ, वास्तविक, एक तरह से वैज्ञानिक। बजाय शब्दों से तर्क करने के, उस क्षुद्र ने ऐसी स्तिथि खड़ी कर दी कि अदि शंकराचार्य को अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी। और क्षुद्र ने कहा, "तो आपको दुबारा स्नान करने की आवश्यकता नहीं है, वैसे भी वहां कोई नदी नहीं है, मैं भी नहीं, आप भी नहीं; सब स्वप्न ही तो है। आप मंदिर में जाएं--और वह भी एक स्वप्न है--और परमात्मा से प्रार्थना करें, वह भी एक स्वप्न है। क्योंकि वह भी मन के द्वारा खड़ा किया हुआ एक प्रक्षेपण है जो कि एक भ्रम है, और एक भ्रमित मन कुछ भी सत्य प्रक्षेपित नहीं कर सकता।
       ओशो
(कथा कहती है कि वे क्षुद्र  चाण्डाल वेष धारी साक्षात शिव  ही थे)

Tuesday, August 15, 2017

शाकाहारी हुई दुनिया तो हर साल 70 लाख तक कम मौतें

शाकाहारी हुई दुनिया तो हर साल 70 लाख तक कम मौतें

दुनिया भर में 12 जून का दिन विश्व मांस मुक्त दिवस के रूप में मनाया गया. अगर दुनिया अचानक हमेशा के लिए शाकाहारी हो जाए तो इसका असर क्या होगा?

हम यहां बता रहे हैं कि इससे जलवायु, वातावरण, हमारी सेहत और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा.

यदि 2050 तक दुनिया शाकाहारी हो गई तो हर साल 70 लाख कम मौतें होंगी और अगर पशु से जुड़े उत्पाद बिल्कुल नहीं खाए जाते हैं तो हर साल 80 लाख लोग कम मरेंगे.ऑक्सफर्ड मार्टिन स्कूल फ्यूचर ऑफ फूड प्रोग्राम में एक रिसर्चर मार्को स्प्रिंगमैन के मुताबिक खाद्य समाग्रियों से जुड़े उत्सर्जन में 60 फ़ीसदी की गिरावट आएगी. यह रेड मीट से मुक्ति के कारण होगा क्योंकि रेड मीट मिथेन गैस उत्सर्सिज करने वाले पशुओं से मिलता है.हालांकि इससे विकासशील दुनिया में किसान बुरी तरह से प्रभावित होंगे. शुष्क और अर्धशुष्क इलाक़ों को पशुपालन के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अफ़्रीका में सहारा के पास सहेल लैंड है और यहां रहने वाले लोग पशुपालन पर निर्भर हैं. ये स्थायी रूप से कहीं और विस्थापित होने के लिए मजबूर होंगे. इससे इनकी सांस्कृतिक पहचान ख़तरे में पड़ेगी.

चारागाहों को लेकर फिर से सोचना होगा. जंगल जलवायु परिवर्तन से कम प्रभावित होंगे. ख़त्म हो रही जैव विविधता फिर से वापस आएगी. जंगल में एक किस्म का संतुलन बनेगा. पहले शाकाहारी पशुओं को बचाने के लिए हिंसक जानवरों को मार दिया जाता था.जो पशुओं से जुड़ी इंडस्ट्री में लगे हैं उन्हें अपने नए ठिकाने और करियर की तलाश करनी होगी. वे कृषि, बायोऊर्जा और वनीकरण की तरफ़ रुख कर सकते हैं. अगर इन्हें दूसरा रोजगार नहीं मिलता है तो व्यापक पैमाने पर लोग बेरोजगार होंगे और इससे पारंपरिक समाज में भारी उठापटक की स्थिति होगी.कुछ मामलों में इसका जैवविविधता पर बुरा असर भी पड़ेगा. भेड़ों की चारागाहों वाले कई शताब्दियों से ज़मीन को आकार देने में मदद मिलती है. ऐसे में पर्यावरण की वजह से पशुओं को रखने के लिए किसानों को भुगतान करना होगा.
दुनिया शाकाहारी होती है तो फिर क्रिसमस टर्की (एक तरह का पक्षी जिसे लोग खाते हैं) नहीं रहेगा. शाकाहारी होने का मतलब है कि परंपराएं बुरी तरह से प्रभावित होंगी. दुनिया भर में कई ऐसे समुदाय हैं जो विवाह और उत्सव में मांस उपहार में देते हैं. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के बेन फिलन का कहना है कि इसलिए अक्सर इस तरह की कोशिश कम पड़ जाती है.मांस की खपत नहीं होने की वजह से दिल की बीमारी, डायबिटीज़, स्ट्रोक और कुछ तरह के कैंसर की आशंका नहीं रहेगी. ऐसे में दुनिया भर की दो या तीन फ़ीसदी जीडीपी जो मेडिकल बिल पर खर्च होती है वो बच जाएगी.
लेकिन हम लोगों को पोषण की कुछ वैकल्पिक चीज़ें के बदले ही मांस को हटाना होगा. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर के दो अरब लोग कुपोषित हैं. अनाज के मुकाबले मांस और उससे जुड़े उत्पादों से लोगों को ज़्यादा पोषण मिलता है.

शोफिया स्मिथ गेलरबीबीसी
13 जून 2017

वन्दे मातरम् (राष्ट्रगीतम्)

शुभरात्रि:मित्राणि!
कृपया शयनात् पूर्वम् एकवारं प्रतिदिनं मॉभारतीं स्मराम:इति विनम्रनिवेदनम्||

वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम्।। १।।
शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित-यामिनीम्,
फुल्ल-कुसुमित-द्रुमदल-शोभिनीम्|
सुहासिनीम्,सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम्। वन्दे मातरम्।। २।।

कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केनो मॉ एतो बले,
बहुबलधारिणीम्, नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम्।। ३।।

तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदये तुमि माँ भक्ति,
तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।
वन्दे मातरम्। । ४।।

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम्।। ५।।

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्। वन्दे मातरम्।। ६।।