Saturday, November 18, 2017

14 वर्ष के वनवास में भगवान राम कहां-कहां रहे?

*14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे?*
प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।
रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार
*जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की।* इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमें से 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है।
जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आईये जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में…

*पहला पड़ाव…*
1.केवट प्रसंग : राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।
‘सिंगरौर’ : इलाहाबाद से 22 मील (लगभग 35.2 किमी) उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।
‘कुरई’ : इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।
इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था।

*दूसरा पड़ाव…*
2.चित्रकूट के घाट पर : कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।
चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

*तीसरा पड़ाव…*
3.अत्रि ऋषि का आश्रम : चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी।
अत्रि पत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अनसूइया के सतीत्व की परीक्षा ली थी, लेकिन तीनों को उन्होंने अपने तपोबल से बालक बना दिया था। तब तीनों देवियों की प्रार्थना के बाद ही तीनों देवता बाल रूप से मुक्त हो पाए थे। फिर तीनों देवताओं के वरदान से उन्हें एक पुत्र मिला, जो थे महायोगी ‘दत्तात्रेय’। अत्रि ऋषि के दूसरे पुत्र का नाम था ‘दुर्वासा’। दुर्वासा ऋषि को कौन नहीं जानता?
अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।
प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’
राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देकर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।
चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से निकलकर भगवान राम पहुंच गए घने जंगलों में…

*चौथा पड़ाव,*
4. दंडकारण्य : अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।
‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।
राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।
वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।
दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यहां रामायण काल में रावण के सहयोगी बाणासुर का राज्य था। उसका इन्द्रावती, महानदी और पूर्व समुद्र तट, गोइंदारी (गोदावरी) तट तक तथा अलीपुर, पारंदुली, किरंदुली, राजमहेन्द्री, कोयापुर, कोयानार, छिन्दक कोया तक राज्य था। वर्तमान बस्तर की ‘बारसूर’ नामक समृद्ध नगर की नींव बाणासुर ने डाली, जो इन्द्रावती नदी के तट पर था। यहीं पर उसने ग्राम देवी कोयतर मां की बेटी माता माय (खेरमाय) की स्थापना की। बाणासुर द्वारा स्थापित देवी दांत तोना (दंतेवाड़िन) है। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।
इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।
दंडकारण्य क्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।
डॉ. रमानाथ त्रिपाठी ने अपने बहुचर्चित उपन्यास ‘रामगाथा’ में रामायणकालीन दंडकारण्य का विस्तृत उल्लेख किया है।

*पांचवां पड़ाव…*
‘पंचानां वटानां समाहार इति पंचवटी’।
5. पंचवटी में राम : दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।
उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 20 मील (लगभग 32 किमी) दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।
अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है।
ये पांच वृक्ष थे पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।
यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है।
मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

*छठा पड़ाव..*
6.सीताहरण का स्थान ‘सर्वतीर्थ’ : नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।
जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।
पर्णशाला : पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था।
इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

*सातवां पड़ाव....*
7.सीता की खोज : सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।
आठवां पड़ाव…
8.शबरी का आश्रम : तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है।
शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा।
पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है।
केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।
सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।

*नौवां पड़ाव…*
9.हनुमान से भेंट : मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया।
ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था।
ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।

*दसवां पड़ाव..*
10.कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।
तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है।
लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

*ग्यारहवां पड़ाव…*
11.रामेश्‍वरम : रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।

*बारहवां पड़ाव…*
12.धनुषकोडी : वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया।
छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।
धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।
इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।
दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया।
30 मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।

*तेरहवां पड़ाव…*
13.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला : वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।
श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए हैं।

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Monday, October 23, 2017

अनुभव और शास्त्र

◆ शास्त्रों से नहीं, केवल अनुभव से सत्य जाना जा सकता है। ◆ आपके अनुभव से शास्त्र सिद्ध होते हैं।

एक कहानी है

एक निर्जन रास्ते पर दो यात्रीयों को रुकना
पड़ा, क्योंकि सामने ही बड़ी तख्ती
लगी थी: 'रास्ता बंद है'। लेकिन तख्ती के पास से ही उन्होंने
देखा कि अभी - अभी गई गाड़ी के, कार के निशान
हैं। तो फिर उन्होंने तख्ती की फिक्र न की। फिर उन्होंने
उन निशानों का पीछा किया। वे आगे बढ़ गये। तीन मील बाद वह रास्ता टूट गया था, पुल गिर गया था, और उन्हें वापिस लौटने के सिवाय कोई उपाय न था। उनमें से एक ने दूसरे
को कहा, हमने तख्ती पर भरोसा क्यों नहीं किया?

दोनों
वापिस लौटे तो तख्ती की दूसरी तरफ नजर पड़ी,
जहां लिखा था, 'अब भरोसा आया न कि रास्ता
बंद है?'

मानव का जीवन भी
करीब - करीब ऐसा ही है।
तख्तियों पर सब लिखा है।
वे तख्तियां ही शास्त्र हैं। लेकिन
तुम उनकी न सुनोगे, जब तक तुम्हारा
अनुभव ही तुम्हें न बता दे कि वे सच हैं।
अनुभव के अतिरिक्त सच को जानने का कोई
उपाय भी नहीं है।

Saturday, October 21, 2017

परमात्मा का मन्त्र

अ,आ,इ, ई,उ, ऊ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ 
क,ख,ग,घ,ड़,च,छ,ज,झ,ञ,ट,ठ,ड,ढ,ण,त,थ,द,ध,न,प,फ,ब,भ,म,य,र,ल,व,व,श,ष,स,ह,क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,
हे प्रभु! मै आपकी आराधना करू भी तो कैसे करू आपके स्तुति मे कहा हुआ शब्द छोटा प्रतित होता है, मन्त्र बनाने का सामर्थ्य नहीं और पहले से बने मन्त्र इतने अधिक हैं कि याद नहीं होते, उन मन्त्रोंका अर्थ  समझ नहीं आता।
इसलिए मै आपके स्तुति मे वर्णमाला को कह रहा हूँ। अपने अनुसार उसको ठीक ठीक बैठा लेना।

धार्मिक क्रिया करने से धार्मिक नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि धार्मिकता एक आन्तरिक रूपांतरण है।
मनुर्भव
डॉ मुकेश ओझा

धार्मिक होने का अर्थ है मैं जो हूँ उससे संतुष्ट नहीं हूँ मुझे और विशिष्ट होना है

Wednesday, October 18, 2017

धन्वन्तरि पर एक पूर्ण लेख

यह लेख अरुण उपाध्याय जी का है जिसे मैं समाज के उपयोगिता के दृष्टि से प्रेषित कर रहा हूँ।

धन्वन्तरि का इतिहास-धन-त्रयोदशी को धन्वन्तरि-जयन्ती भी कहा जाता है। इतिहास में कई धन्वन्तरि हुये हैं, जिनमें २ कलियुग के पूर्व थे। धनु चाप के आकार का होता है जिससे बाण छोड़ते हैं। इसी प्रकार के यन्त्र द्वारा शरीर से शल्य निकालते हैं अतः शल्य चिकित्सक को धन्वन्तरि कहा गया है। शल्य चिकित्सा तथा आयुर्वेद कई विद्याओं का समन्वय है अतः चिकित्सक को वैद्य (विद्या युक्त) कहते हैं। आज भी डाक्टर का अर्थ चिकित्सक या शोध करने वाला भी होता है। इसी अर्थ में इसके अध्येता को सुश्रुत (श्रुति = वेद का विद्वान्) कहा गया है। कालक्रम से इन धन्वन्तरि का वर्णन है-
(१) समुद्र-मन्थन के समय-राजा बलि ने इन्द्र के ३ लोकों (रूस, चीन, भारत) पर अधिकार कर लिया था। मक्का (मख-मेदिनी = मक्का, मदीना) में उनका यज्ञ हुआ। यह राजसूय यज्ञ था जिसमें प्रजा से कर वसूल कर उसका पुनः लोकहित में प्रयोग होता है, जैसे मेघ समुद्र से जल लेकर उसे पुनः लोगों के लिये वर्षा करते हैं-
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्। सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः॥ (रघुवंश १/१८)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा आपो वसाना दिवमुत्पतन्ति।
त आववृत्रन् त्सदनादृतस्यादिद घृतेन पृथिवी व्युद्यते॥ (ऋक् १/१६४/४७)
     देवों का यज्ञ भाग असुरों को जा रहा था जैसा पराधीनता में होता है। वामन अवतार विष्णु ने जब ३ पद भूमि मांगी तो बलि ने तुच्छ जानकर दे दिया। यहां विष्णु का १ पद विषुव से कर्क रेखा तक की गति है। उत्तरी ध्रुव तक इस पद से २ ही पद पूर्ण होते हैं। तीसरा पद ध्रुव-वृत्त में आयेगा, जो बलि का सिर (उनकी अधिकृत भूमि का उत्तरतम भाग) कहा गया है। देव उतने निर्बल नहीं थे। युद्ध से बचने के लिये बलि ने इन्द्र का राज्य वापस कर दिया। पर कई असुर सन्तुष्ट नहीं थे और युद्ध चलते रहे। कूर्म अवतार विष्णु ने समझाया कि युद्ध द्वारा दूसरे देशों पर कब्जा करने से की लाभ नहीं है। यदि उत्पादन नहीं बढ़ेगा तो किस सम्पत्ति पर अधिकार होगा? उनकी सलाह मान कर असुरों ने देवों के साथ खनिज निकालने में सहयोग किया। असुर खनिज निकालने में दक्ष थे अतः उन्होंने खान के भीतर काम किया जो वासुकि नाग का गर्म मुंह कहा गया है। यह मुख्यतः छोटानागपुर में हुआ जहां मन्दार पर्वत पर वासुकिनाथ तीर्थ है। बाद में राजा सगर ने उस क्षेत्र के यवनों को ग्रीस भगाया अतः आज भी ग्रीक भाषा में जो खनिजों के नाम हैं वही छोटानागपुर के पूर्व असुरों की उपाधि हैं। वासुकिनाग का क्षेत्र होने से नागपुर तथा अच्युच-च्युत इन्द्र का क्षेत्र होने से च्युत = चुतिया =छोटा (अंग्रेजी उच्चारण) नागपुर हुआ। देव विरल खनिजों से धातु निकालने में दक्ष थे अतः जिम्बाबवे का सोना (जाम्बूनद स्वर्ण) तथा मेक्सिको की चान्दी निकालने में योग दिया (माक्षिकः = चान्दी)। पुनः खनिज सम्पत्ति के वितरण को लेकर युद्ध हुये तब कार्त्तिकेय ने असुरों को पराजित कर क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर अधिकार किया। इन सभी घटनाओं के समय असुर राजा बलि ही थे अतः उनको ७ चिरजीवियों में गिना गया है। कार्त्तिकेय का समय महाभारत वन पर्व (२३०/८-१०) में निर्दिष्ट है। उस समय उत्तरी ध्रुव की दिशा अभिजित् से दूर हट गयी अर्थात् अभिजित् का पतन हो गया। तब धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ हुआ। यह १५,८०० ई.पू. का काल है जब धनिष्ठा आरम्भ से वर्षा आरम्भ होती थी अतः सम्वत्सर को वर्ष कहा गया। इसी समुद्र मन्थन के १४ रत्नों में एक अमृत है जिसका कलश लेकर धन्वन्तरि निकले थे। उस समय लगातार युद्ध हुये, उसके घायल चिकित्सा के बिना मर रहे थे अतः शल्य चिकित्सा का व्यापक प्रयोग कर आहत लोगों की प्राण रक्षा हुयी। यही अमृत कलश है। इस परम्परा में राजा ययाति काल के शुक्राचार्य भी मृत सञ्जीवनी विद्या जानते थे।
(२) धन्वन्तरि द्वितीय काशीराज दिवोदास थे जिनका उल्लेख सुश्रुत संहिता, अध्याय १ में हुआ है-
अथातो वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः॥२॥
अथ खलु भगवन्तममरवरं ऋषिगण परिवृतमाश्रमस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरिं औपधेनव-वैतरणौरभ्रपौष्कलावत-
करवीर्य (र) गोपुर रक्षित सुश्रुत प्रभृतय ऊचुः॥३॥
एवमयमायुर्वेदोऽष्टाङ्ग उपदिष्यते, अत्र कस्मै किमुच्चतामिति॥९॥
त ऊचुः-अस्माकं सर्वेषामेव शल्यज्ञानं मूलं कृत्वोपदिशतु भगवानिति॥१०॥
त ऊचुर्भूयोऽपि भगवन्तम्-अस्माकमेककमतीनां मतमभिसमीक्ष्य सुश्रुतो भगवन्त प्रक्ष्यति, अस्मै चोपदिश्यमानं वयमप्युपधारिश्यामः॥१२॥
= काशीराज धन्वन्तरि ने शिष्यों के अनुरोध पर आयुर्वेद की ८ शाखायें पढ़ाई, जिसमें शल्य चिकित्सा पर अधिक जोर था।
सभी शिष्यों के विचारों का संकलन सुश्रुत ने किया, अतः इसे सुश्रुत संहिता कहा गया।
ब्रह्माण्ड पुराण में इनको समुद्र मन्थन काल के धन्वन्तरि का अवतार कहा गया है-
आयोः पुत्रा महात्मानः पञ्चैवासन् महाबलाः।१।
नहुषः प्रथमस्तेषां क्षत्रवृद्धस्ततः स्मृतः। रम्भो रजिरनेनाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः॥२॥
क्षत्रवृद्धात्मजश्चैव सुनहोत्रो महायशाः। सुनहोत्रस्य दायादस्त्रयः परमधार्मिकाः॥३॥
काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः।४।
काश्यश्च काशिपो राजा पुत्रो दीर्घतपास्तथा। धन्वश्च दीर्घतपसो विद्वान्धन्वन्तरिस्ततः॥७॥
धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं श्रूयतामिति वै द्विजाः। स सम्भूतः समुद्रान्ते मथ्यमानेऽमृते पुरा॥१०॥
उत्पन्नः कलशात्पूर्वं सर्वतश्च श्रिया वृतः। सद्यः संसिद्धकार्यं तं दृष्ट्वा विष्णुखस्थितः।।११॥
अब्जस्त्वमिति होवाच तस्मादब्जस्तु स स्मृतः॥१२॥ अथ वा त्वं पुनश्चैव ह्यायुर्वेदं विधास्यसि॥१८॥
द्वितीये द्वापरे प्राप्ते सौनहोत्रः स काशिराट्॥ पुत्रकामस्तपस्तेपे नृपो दीर्घतपास्तथा॥२०॥
तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा॥२३॥ (ब्रह्मांड पुराण २/३/६७)
    इस काल में दाशराज युद्ध हुआ था जिसका समय प्रायः ७३०० ई.पू. अनुमानित है। मान्धाता का पुत्र पुरुकुत्स, दिवोदास पुत्र सुदास का समकालीन था। मान्धाता का काल १५ वां त्रेता कहा गया है (वायु पुराण ९८/८८-९१)। ९१०२ ई.पू. तक १० त्रेता पूरे हो चुके थे। उसके बाद १ दिव्य वर्ष = ३६० वर्ष का १ युग-खण्ड लेने पर १५वें त्रेता का आरम्भ ९१०२-४x३६० = ७६६२ ई.पू. में होगा जो ७३०२ ई.पू. तक चलेगा। मान्धाता की १८ पीढ़ी बाद राजा बाहु यवन आक्रमण में मारा गया था जिसका काल मेगास्थनीज ने बाक्कस = डायोनिसस आक्रमण काल कहा है। यह जुलाई ३२६ ई.पू. के सिकन्दर आक्रमण से ६४५१ वर्ष ३ मास पूर्व अर्थात् ६७७७ ई.पू. अप्रैल में था। बाक्कस की १५ पीढ़ी बाद परशुराम (विष्णु अवतार) काल कहा है, जिनके देहान्त के बाद ६१७७ ई.पू. में कलम्ब सम्वत् आरम्भ हुआ जो आज भी केरल में चल रहा है। परशुराम काल १९वां त्रेता कहा है, जो ९१०२-८x३६० = ६२२२ ई.पू. में आरम्भ होकर ३६० वर्ष चला। इस काल में भी दाशराज नाम से व्यापक युद्ध हुये अतः शल्य चिकित्सा की बहुत आवश्यकता हुयी।
   पारसी इतिहास में भी ९८४४ ई.पू. में यम-वैवस्वत काल में जल प्रलय का आरम्भ कहा है उसके बाद ४ वंशों का शासन २५९८ वर्ष तक चला (७२४६ ई.पू. तक)। तब विस्तास्प ने १२० वर्ष राज्य किया। इसे ऋग्वेद में दाशराज युद्ध का ऋज्राश्व कहा गया है (ऋक् १/१०० आदि)।
(३) कलियुग के धन्वन्तरि-
   (क) परीक्षित को जब तक्षक नाग ने काटा था (३०४२ ई.पू.) तब भी एक धन्वन्तरि थे जो उनकी चिकित्सा करने में सक्षम थे। उनको घूस दे कर हटा दिया गया-
सप्ताहे समतीते तु गच्छन्तं तक्षकं पथि। धन्वन्तरिर्मोचयितुमपश्यद् गन्तुको नृपम्॥१०६॥
ब्रह्म वैवर्त पुराण (अध्याय २/४६)
  (ख) भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय ९,२०,२१ में कहा है कि समुद्र-मन्थन काल के धन्वन्तरि का जन्म काशी के कल्प ब्राह्मण के पुत्र रूप में हुआ जिन्होंने क्षत्रिय शिष्य सुश्रुत को कल्प-वेद (व्यावहारिक शल्य विज्ञन) पढ़ाया जो उन्होंने १० अध्यायों में लिखा-
तदा प्रसन्नो भगवान् (सूर्य) देवानाह शुभं वचः। अहं काश्यां भवाम्यद्य नाम्ना धन्वन्तरिः स्वयम्॥१७॥
कल्पदत्तस्य विप्रस्य पुत्रो भूत्वा महीतले॥१९॥
सुश्रुतं राजपुत्रं च विप्रवृद्ध समन्वितम्। शिष्यं कृत्वा प्रसन्नात्मा कल्पवेदमचीकरत्॥ २०॥
सुश्रुतः कल्पवेदं तं धन्वन्तरि विनिर्मितम्।पठित्वा च शताध्यायं सौश्रुतं तन्त्रमाकरोत्॥२३॥
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय ९)
   (ग) उसके बाद कलि की २३वीं शताब्दी (९०२ ई.पू. से) में धन्वन्तरि ने आयुर्वेद का प्रसार किया। उनके शिष्य सुश्रुत थे किनके शिष्य पुनः धन्वन्तरि ही कहे गये-
त्रिविंशाब्दे (कलि २२०० = ईसापूर्व ९०२) च यज्ञांशेतत्र वासमकारयत्।३४।
धन्वन्तरिर्द्विजो नाम ब्रह्मभक्ति परायणः।३६।
इति धन्वन्तरिः श्रुत्वा शिष्यो भूत्वा च तद्गुरोः। सुश्रुतादपरे चापि शिष्या धन्वन्तरेः स्मृताः॥४५॥
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय २०)
    (घ) कलि की २७ वीं शताब्दी (५०२ ई.पू. से) में शाक्यसिंह गौतम बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू. के सिद्धार्थ बुद्ध नहीं) ने वैदिक मार्ग को नष्ट करने के लिये यन्त्र स्थापित किये थे। प्रयाग के धन्वन्तरि ने उन यन्त्रों को हटा कर पुनः वेद मार्ग स्थापित किया तथा आयुर्वेद का उद्धार किया।
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय २१-सप्तविंशच्छते भूमौ कलौ सम्वत्सरे गते॥२१॥
शाक्यसिंह गुरुर्गेयो बहु माया प्रवर्तकः॥३॥
स नाम्ना गौतमाचार्यो दैत्य पक्षविवर्धकः। सर्वतीर्थेषु तेनैव यन्त्राणि स्थापितानि वै॥ ३१॥
धन्वन्तरिः प्रयागे च गत्वा तद्यन्त्रमुत्तमम्। विलोमं कृतवांस्तत्र तदधो ये गता नराः॥७०॥
   (ङ) अन्तिम धन्वन्तरि को विक्रमादित्य (८२ ई.पू.-१९ ई तक) के नवरत्नों में कहा गया है। विक्रमादित्य काल में भी शकों से व्यापक युद्ध हुये तथा सभी शास्त्रों का पुनः सम्पादन हुआ। इनका उल्लेख ३०६८ कलि (३४ ई.पू.) में कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण में है-
धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंह शंकु वेतालभट्ट घटखर्पर कालिदासाः॥
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
वर्षः सिन्धुरदर्शनम्बरगुणैः (३०६८) र्याते कलौ सम्मिते।
मासे माधव संज्ञिते च विदितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः॥ (ज्योतिर्विदाभरण, कालिदास)

Tuesday, October 10, 2017

गणित ज्योतिषशास्त्र मे वायु शब्द से 49 का ग्रहण करते है

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  शास्त्रों मे 49 प्रकार के वायु के  नाम पठित किए गए है ।
  : ४९ उनचास वायु देवता :
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१ सत्त्वज्योति, २ आदित्य, ३ सत्यज्योति, ४ तिर्यक् ज्योति,

५ सज्योति, ६ ज्योतिष्मान्, ७ हरित, ८ ऋतजित, ९ सत्यजित, १० सुषेणा,

११ सेनजित, १२ सत्यमित, १३ अभिमित्र, १४ हरिमित्र, १५ कृत, १६ सत्य,

१७ ध्रुव, १८ धर्ता, १९ विधर्ता, २० विधाराय, २१ ध्वन्ति, २२ धुनि, २३ उग्र, २४ भीम,

२५ अभियु, २६ साक्षिप, २७ ईदृक, २८ अन्यादृक, २९ यादृक, ३० प्रतिकृत, ३१ ऋक्,

३२ समिति, ३३ संरम्भ, ३४ ईदृक्ष, ३५ पुरुष, ३६ अन्यादृक्ष, ३७ चेतस, ३८ समिता,

३९ सर्मिदृक्ष, ४० प्रतिदृक्ष, ४१ मारुती, ४२ सरत, ४३ देव, ४४ दिश, ४५ यजुः,

४६ अनुद्रुक, ४७ साम, ४८ मानुष,४९ विश्