🌱 आपका वस्त्र, भाषा और आपका पसंद बताता है आप चेतना के किस ऊँचाई पर स्थित हैं।
ढीले ढालें वस्त्र आपके शांत चित्त एवं उच्च चेतना को इंगित करता है। आप ध्यान देंगे जब आप ढीले वस्त्र जैसे धोती कुर्ता एवं महिलाएं साड़ी पहनती हैं तो अपने व्यवहार में एक सौम्यता होता हैं।
और जब आप चुस्त दुरुस्त वस्त्र पहनते हैं तो एक अस्थिरता गर्मजोशी वाला व्यवहार करते हैं।
इसलिए भारत में राजा महाराजा गुरु एवं शिष्य के लिए ढिले वस्त्र हुआ करता था। और सेवक एवं सैनिकों के लिए चुस्त दुरुस्त वस्त्र हुआ करता था।
जैसे जैसे आप चेतना के शिखर पर चढ़ते जाएँगे आपको भी थे वस्त्र ही पसंद आएँगे।
- डॉ मुकेश ओझा
पुनः शेष विषयों पर चर्चा अगले लेख में करेंगे।
नमो नमः
Saturday, June 16, 2018
आपका वस्त्र, भाषा और आपका पसंद बताता है आप चेतना के किस ऊँचाई पर स्थित हैं।
Wednesday, June 6, 2018
यः सर्वगुणसम्पूर्णः ।सर्वदोषविवर्जितः ।।प्रियतां प्रीत एवालं ।विष्णुर्मे परमः सुहृत्
यः सर्वगुणसम्पूर्णः ।
सर्वदोषविवर्जितः ।।
प्रियतां प्रीत एवालं ।
विष्णुर्मे परमः सुहृत् ।।
पदच्छेदः पदपरिचयशास्त्रं च ।👉
👉
यः - दकारान्तपुल्लिङ्गस्य यद् शब्दस्य प्रथमाविभक्तेः एकवचनान्तं पदमिदम् ।
सर्वगुणसम्पूर्णः - अकारान्तपुल्लिङ्गस्य सर्वगुणसम्पूर्णशब्दस्य प्रथमाविभक्तेः एकवचनान्तं पदमिदम् ।
सर्वाणि च तानि गुणानि सर्वगुणानि ।
सम्यक् पूर्णः सम्पूर्णः ।
सर्वगुणैः सम्पूर्णः सर्वगुणसम्पूर्णः ।
सर्वदोषविवर्जितः - अकारान्तपुल्लिङ्गस्य सर्वदोषविवर्जितशब्दस्य प्रथमाविभक्तेः एकवचनान्तं पदमिदम् ।
सर्वाः च ते दोषाः च सर्वदोषाः ।
विशेषेण वर्जितः विवर्जितः ।
सर्वदोषेभ्यः विवर्जितः सर्वदोषविवर्जितः ।
प्रियताम् - नकारान्तपुल्लिङ्गस्य (या तकारान्तमपि वर्तते) प्रियन् शब्दस्य षष्ठीविभक्तेः बहुवचनान्तं पदमिदम् ।
प्रीतः - अकारान्तपुल्लिङ्गस्य प्रीत शब्दस्य प्रथमाविभक्तेः एकवचनान्तं पदमिदम् ।
एव + अलम् - अव्यये ।
विष्णुः - उकारान्तपुल्लिङ्गस्य विष्णुशब्दस्य प्रथमाविभक्तेः एकवचनान्तं पदमिदम् ।
मे - त्रिषुलिङ्गेषु समस्य दकारान्तस्यअस्मद् शब्दस्य षष्ठीविभक्तेः एकवचनान्तं पदमिदम् ।
परमः - अकारान्तपुल्लिङ्गस्य परम शब्दस्य प्रथमाविभक्तेःएकवचनान्तं पदमिदम् ।
सुहृत् - तकारान्तपुल्लिङ्गस्य सुहृत् शब्दस्य प्रथमाविभक्तेः एकवचनान्तं पदमिदम् ।
अन्वयः -👉
👉
यः सर्वगुणसम्पूर्णः, सर्वदोषविवर्जितः प्रियतां अलं प्रीतः एव सः विष्णुः मे परमः सुहृत् अस्ति ।
यः - जो श्रीमन्महाविष्णु जी
सर्वगुणसम्पूर्णः - आनंदादि समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण,
सर्वदोषविवर्जितः - दुःख आदि समस्त दोषों से वर्जित
च - तथा
प्रियताम् - प्रेम करने वाले भक्तों के
अलम् - अच्छे
प्रीतः - प्रेमी हैं
सः - वह
विष्णुः एव - श्रीमन्महाविष्णु जी ही
मे - मेरे
परमः - उत्तम
सुहृत् - मित्र
अस्ति - हैं ।
विवरण:-👉
👉
श्रीमन्महाविष्णु जी समस्त सद्गुणों के आकर हैं । और सामान्य मनुष्य या प्राणियों के जैसे दुःख, पीडा जैसे दोष इन से परे रहते हैं । जो भी इन के भक्त बन कर इन को प्रेम करते हैं, उन भक्तों के प्रेम से भी अत्यधिक प्रेम ये प्रदान करते हैं । ऐसे श्रीमन्महाविष्णु जी ही मेरे परम या श्रेष्ठ मित्र हैं ।
।।मनुर्भव।।
Thursday, May 31, 2018
नक्षत्रों का शरीर के अंगों पर स्थान
नक्षत्रों का शरीर के अंगों पर स्थान
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नक्षत्रों को शरीरांगो पर विभाजित करने में विद्वानों में एक से अधिक मत रहे है !
१.शास्त्रीय मत से नक्षत्र पुरुष का विचार :
शरीर के अंगो पर सभी नक्षत्रों का कोई क्रम नहीं है !
"वामनपुराणानुसार " इनका विभाजन निम्नलिखित है !
क्रम. नक्षत्र - शरीरांग
१. अश्विनी - दोनों घुटने
२. भरणी - सिर
३. कृतिका - कटिप्रदेश
४. रोहिणी - दोनों टांगे
५. मृगशिरा - दोनों नेत्र
६. आर्द्रा - बाल
७. पुनर्वसु - अंगुलियाँ
८. पुष्य - मुख
९. आश्लेषा - नख
१०. मघा - नाक
११. पूर्वा फाल्गुनी - गुप्तांग
१२. उत्तरा फाल्गुनी- गुप्तांग
१३. हस्त - दोनों हाथ
१४. चित्रा - मस्तक
१५. स्वाति - दांत
१६. विशाखा - दोनों भुजाएं
१७. अनुराधा - ह्रदय, वक्षस्थल
१८. ज्येष्ठा - जिव्हा
१९. मूल - दोनों पैर
२०. पूर्वा षाढा - दोनों जांघें
२१. उत्तरा षाढा - दोनों जांघें
२२. श्रवण - दोनों कान
२३. धनिष्ठा - पीठ
२४. शतभिषा - ठोड़ी के दोनों पार्श्व
२५. पूर्वा भाद्रपद - बगल
२६. उत्तरा भाद्रपद - बगल
२७. रेवती - दोनों कांख
नोट : -
i. शरीर में निशान और चोट का निश्चय करने में इसका उपयोग होता है ! क्रूर का बुरे ग्रह कुंडली में जिस नक्षत्र में गये हो उसी अंग पर घाव या निशान पैदा कर देते है !
ii. सूर्य चन्द्रमा के नक्षत्रानुसार उस अंग में चिन्ह आदि जन्मजात होता है या बना देता है !
iii. दशा-अन्तर्दशा में भी लग्ने वाली चोट का निर्धारण इसी से किया जाता है !
iv. जो नक्षत्र पापयुक्त हो, निर्बल ग्रह से युक्त हो वही अंग पीड़ित, शिथिल या दोषयुक्त होता है !
२. जन्म नक्षत्र से नक्षत्र पुरुष विचार :
जातक के जन्म नक्षत्र से प्रारम्भ करके १,१,३,१,१,४,३,५,१,४,३ नक्षत्रों को सारणी के अनुसार स्थापित कर लें ! जिन नक्षत्रों पर पाप प्रभाव, क्रूर दृष्टि, नीच-शत्रु ग्रह होगा उन्ही नक्षत्रों के अंगो पर चोट व अन्य निशान उस ग्रह की दशा अन्तर्दशा में मिलेंगे ! यह विचार महर्षि पराशर ने बताया है !
अंग - नक्षत्र
मुख - जन्म नक्षत्र
वाम नेत्र - १
माथा - ३
छाती (दायीं) - १
गला (दक्षिण भाग) - १
दायाँ हाथ - ४
दायाँ पैर - ३
छाती (बायीं) - ५
गला (वाम bhag) - १
बांया हाथ - ४
दायाँ पैर - ३
३. पाराशरीय मत :
पराशर ने प्रश्न विचार हेतु अलग नक्षत्र पुरुष का वर्णन किया है !
क्रम. नक्षत्र - शरीरांग
१. अश्विनी - सर
२. भरणी - माथा
३. कृतिका - भौंहें
४. रोहिणी - आँखें
५. मृगशिरा - नाक
६. आर्द्रा - कान
७. पुनर्वसु - गाल
८. पुष्य - होंठ
९. आश्लेषा - ठुड्डी
१०. मघा - गला
११. पूर्वा फाल्गुनी - कंधे
१२. उत्तरा फाल्गुनी- ह्रदय
१३. हस्त - बगलें
१४. चित्रा - छाती
१५. स्वाति - पेट
१६. विशाखा - नाभि
१७. अनुराधा - कमर
१८. ज्येष्ठा - जांघ
१९. मूल - नितम्ब
२०. पूर्वा षाढा - लिंग
२१. उत्तरा षाढा - अंडकोष
२२. श्रवण - पेडू
२३. धनिष्ठा - जंघा
२४. शतभिषा - घुटने
२५. पूर्वा भाद्रपद - पिंडली
२६. उत्तरा भाद्रपद - टखने
२७. रेवती - पैर
* ज्येष्ठा को जांघों के उपरी हिस्से अर्थात कमर के नीचे के आधे भाग में व धनिष्ठा को शेष जांघें समझे !
-डॉ मुकेश ओझा
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मनुर्भव 🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷मनुर्भव
शिव वास कब एवं किस तिथि पर कहाँ रहता है?-
*शिव वास कब एवं किस तिथि पर कहाँ रहता है?- रूद्राभिषेक कब करना फल दाई होता है?*
1. प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथिमें रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।
2. कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार मेंआनंद-मंगल होता है।
3. कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है।अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।
4. कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं।
अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर भगवान शिव की साधना भंग होती है, जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।
5. कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं।
इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।
6. कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं।
इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।
7. कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं।
इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।
-डॉ मुकेश ओझा
सम्पर्क सूत्र- 8808634026
Wednesday, May 30, 2018
उत्तमा वेदपाठी च...
उत्तमा वेदपाठी च
विज्ञान पाठक मध्यमा
अधमा वाइबिल द्रष्टा च
कुरान द्रष्टाधमाधमा।।
-डॉ मुकेश ओझा
अर्थ- वेदों में सर्वोत्तम ज्ञान हैं। अतः वेद को पढ़ना मानवता का सर्वोत्तम गुण माना गया है। अतः वेद पढ़ने वाला उत्तम श्रेणी का मानव कहलाता है।
विज्ञान पढ़ने वाला मध्यम ज्ञान को प्राप्त करता है अतः विज्ञान पढ़ने वाला मध्यम मानव के श्रेणी में आता है।
एवं वाईबिल को देखने वाला अधम श्रेणी का मानव कहलाता है तथा कुरान को देखने वाला अधमो में भी अधम होता है।
🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱मनुर्भव🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷
उत्तमा सहजावस्था, मध्यमा ध्यान धारणा। अधमा मूर्तिपूजा च, तीर्थयात्राधमाधमा।
उत्तमा सहजावस्था,मध्यमा ध्यान धारणा।
अधमा मूर्तिपूजा च,तीर्थयात्राधमाधमा।।
यहाँ जीवन को पूर्ण आनंद से भरने के लिए या जीवन के पूर्णता को स्वीकारने के लिए चार अवस्थाओं को बताया गया है। उन चारों अवस्थाओं को उत्तम, मध्यम, अधम, एवं अधमाधम के रूप मे स्वीकार करने का निर्देश भी दिया गया है।
जीवन को समझने के लिए या सम्पूर्ण रूप से धारण करने के लिए जो सर्वोत्तम उपाय है वह है। सहजावस्था अर्थात साक्षी भाव इसलिए इसे उत्तम कहा गया है। इस अवस्था को भगवान कृष्ण, राम, स्वीकार किये।
उसके बाद जीवन को आनंद पूर्वक धारण करने का जो उपाय है वह धारणा ध्यान से सम्भव है। और इस अवस्था मे प्रयास रहता है अतः इसे मध्यम कहा गया है। इस अवस्था से जीवन को आनंद से भरने वाले योगी होते हैं।
जीवन को आनंदित करने के लिए जो तीसरा उपाय है वह है- मूर्ति पूजा इसे अधम इसलिए कहा गया क्योंकि मूर्ति पूजा के द्वारा हम धारणा ध्यान को उपलब्ध होते है पुनः सहजावस्था (साक्षी भाव )को यह एक कठिन प्रक्रिया हो जाता है और भ्रमित होने का भी भय होता है। इस अवस्था को रामकृष्ण परमहंश ने स्वीकार किया था यदि "तोता पूरी" बाबा नहीं मिले होते तो रामकृष्ण आत्म साक्षात्कार कभी नहीं कर पाते।
चतुर्थ उपाय है तीर्थ यात्रा के भ्रमण द्वारा जीवन को आनंद से भरा जाय यह मार्ग सबसे कठिन एवं धीरे धीरे घटित होने वाला मार्ग है। तीर्थ यात्रा कर आप मूर्ति पूजा करते है तदनन्तर धारणा ध्यान को उपलब्ध होते है और अन्त में साक्षी भाव को उपलब्ध होते हैं। इसलिए तीर्थ यात्रा को अधमाधम उपाय कहा गया है।
यहाँ एक बात ध्यान में लेने योग्य है कि आप जिस उपाय से जीवन को उपलब्ध हो जाय उसे स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि विभिन्न प्रकार के मानव अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म कर आनन्दित हो सकते है। यदि आप प्रत्यक्ष रूप से साक्षी भाव को उपलब्ध हो जाते हैं तो सबसे अच्छा नहीं तो तीर्थ यात्रा से ही प्रयास करना चाहिए।
-डॉ मुकेश ओझा
🌱मनुर्भव🌱
Tuesday, May 29, 2018
मैं ब्राह्मण हूँ पुनः ब्राह्मण बन दिखाता हूँ
मै मौन था तुम सोचे मै निर्बल हूँ।
मै! तुम दिन दुःखी के लिए आरक्षण स्वीकार किया।
तुम समझे मैं मूर्ख हूँ।
अब तुम हमारे साथ हमारे देवी देवताओं का अपमान करने लगे।
हमारे धर्म ग्रंथ जलाने लगे।
और तुम हमारे ही टुकड़े पर पल कर हमें ही गरियाने लगें।
विश्व जिस वेद का गुण गान कर रहा तुम उसे अपशब्द बोलने लगें।
तो लो अब मैं भी सुनाता हूँ।
क्रोध का अग्नि जलाता हूँ।
तुम्हें तुम्हारे करनी का फल दिलाता हूँ सभ्यता का पाठ पढाता हूँ।
पुनः दरिद्र बनाता हूँ धूल तुम्हें चटाता हूँ।
संस्कार अब मैं सिखाता हूँ,
त्रिशूल अपना दिखाता हूँ परशु अपना चमकाता हूँ।
मैं ब्राह्मण हूँ पुनः ब्राह्मण बन दिखाता हूँ।
-डॉ मुकेश ओझा
🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱💧🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷