Thursday, April 11, 2019

लोकतंत्र में शिक्षा का महत्व

लोकतंत्र में नागरिकों के मूलभूत अधिकारों में रोटी, कपड़ा और मकान के बाद शिक्षा और स्वास्थ्य को रखा जाता है। लेकिन लोकतंत्र के महान पर्व 'लोकसभा चुनाव 2019' में यह मूलभूत मुद्दे कहीं गायब हैं। गांव कनेक्शन की कोशिश है कि आम चुनाव से पहले इन मुद्दों और उनके वास्तविक स्थिति से लोगों को परिचित कराया जाए। किसानों की स्थिति, स्वास्थ्य, पर्यावरण के बाद गांव कनेक्शन की इस विशेष सीरिज 'इलेक्शन कलेक्शन' में आज शिक्षा का मुद्दा।

शिक्षा का अधिकार (RTE-2009) और अनिवार्य प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा लागू होने के बावजूद पिछले दस साल में असर के आंकड़े उत्साहवर्धक नहीं है। शिक्षा में नामांकन दर बढ़कर 96% अवश्य हो गई है, लेकिन आज भी 20% बच्चे प्राथमिक शिक्षा और 36% बच्चे उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाते हैं। वहीं देश के लगभग 70 प्रतिशत विद्यार्थी 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं।उच्च शिक्षा का भी यही हाल है। 

वहीं देश में शिक्षकों की हालत भी खराब है। एक रिपोर्ट की माने तो इस समय देश में शिक्षकों के लगभग 5 लाख से अधिक पद रिक्त हैं। शिक्षकों की यह पूर्ति एडहॉक शिक्षकों और प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षामित्रों के द्वारा पूरी की जाती है। इन एडहॉक शिक्षकों और शिक्षामित्रों की भी हालत कुछ खास उत्साहजनक नहीं है और आए दिन ये एडहॉक शिक्षक और शिक्षामित्र अपने अधिकारों और मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहते हैं।  शिक्षाविद् डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था, "शिक्षा अधिकारों को प्राप्त करने का प्रथम साधन होता है और इसकी सहायता से आम लोग प्रशिक्षित होकर लोकतंत्र में 'नागरिक' बनते हैं।" अमेरिका के महान शिक्षाविद् होराक मैन ने भी कहा था, "शिक्षा नागरिकों का एकमात्र राजनीतिक साधन है, जिसकी नांव पर सवार होकर लोकतंत्र की नदी में उतरा जा सकता है। शिक्षा के बिना यह नाव कहीं भी डूब सकती है।" इन शिक्षाविदों के कथन से साफ पता चलता है कि लोकतंत्र में शिक्षा का अपना महत्व है। हालांकि लोकतंत्र के महान पर्व यानी कि चुनावों में कभी भी यह प्रमुख मुद्दा नहीं बन पाता है।
परन्तु आज भी देश के प्रमुख राजनीतिक दल जाति, धर्म, मंदिर, सेना और पाकिस्तान पर राजनीति करते हैं। इनकी चुनावी सभाओं में इन सभी मुद्दों के अलावा अधिक से अधिक बेरोजगारी और विकास (आर्थिक विकास) का मुद्दा ही शामिल हो पाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के मुद्दे अभी भी राजनीतिक दलों के लिए कुछ खास मायने नहीं रखते।

इससे यह स्पष्ट होता है कि "भारतीय परिदृश्य में राजनीतिक दल चाहते ही नहीं हैं कि उनके सामने कोई सवाल खड़ा करने वाला एक समूह खड़ा हो, इसलिए वह शिक्षा को चुनावी मुद्दा कभी बनाते ही नहीं हैं।" कभी भी किसी नेता या पार्टी ने सार्वजनिक मंच से शिक्षा के लिए बात नहीं कि। शिक्षा को लेकर राजनीतिक दलों की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इनके घोषणा पत्रों में शिक्षा की बात महज एक पन्ने में सिमट कर रह जाती है। दो विपरीत ध्रुवों वाली राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में भी शिक्षा के लिए लगभग एक समान और परंपरागत रूप से पुरानी हो चुकी बातें लिखी जाती हैं।

हमारे देश की राजनीति जाति और धर्म आधारित हो गई है। राजनेताओं ने पहले जनता को जाति और धर्म आधारित मुद्दों पर भटकाया। धीरे-धीरे जनता को इसकी आदत हो गई। अब जनता खुद नहीं चाहती कि शिक्षा जैसे अहम मसले पर बात हो।"  पहले शिक्षा का सीधा संबंध रोजगार से होता था। लेकिन अब इस की कोई गारंटी नहीं कि शिक्षा मिलने के बाद आपको रोजगार मिले। इसलिए भी लोग शिक्षा के प्रति धीरे-धीरे उदासीन होते जा रहे हैं। "भारत में शिक्षा भले ही एक चुनावी मुद्दा ना हो लेकिन विदेशों में शिक्षा को लेकर चुनाव लड़े जाते रहे हैं।

  शिक्षा के प्रति सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नई शिक्षा नीति के लिए पिछले पांच साल में दो समितियां गठित हुई लेकिन नई शिक्षा नीति लागू नहीं हो सकी। आपको बता दें कि बीजेपी ने अपने 2014 के घोषणा पत्र में नई शिक्षा नीति बनाकर उसे लागू करने का वादा किया था। इससे पहले शिक्षा नीति 1986 में लागू हुई थी। आदर्श रूप में शिक्षा नीति को हर 20 साल पर मूल्यांकन कर इसमें परिवर्तन लाना रहता है लेकिन व्यवहारिक रूप में ऐसा कभी नहीं हो सका। देश की शिक्षा व्यवस्था का निर्धारण, शिक्षा नीति से ही होता है। इस शिक्षा नीति के निर्धारण के लिए आयोगों का गठन होता है। देश के आजादी के बाद पहली बार 1948 में विश्वविद्यालयी शिक्षा को दुरूस्त करने के लिए 'राधाकृष्णन आयोग' का गठन हूआ था। इस आयोग के अध्यक्ष देश के प्रथम उपराष्ट्रपति और प्रमुख शिक्षाविद डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे। इसके बाद माध्यमिक शिक्षा में सुधार लाने के उद्देश्य से 1952 में मुदालियार आयोग का गठन हुआ। स्कूली शिक्षा को ध्यान में रखते हुए 1964 में कोठारी आयोग का गठन किया गया। कोठारी आयोग के सुझावों को ध्यान में रखते हुए ही देश की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) में बनी। कोठारी आयोग का सबसे प्रमुख सुझाव था कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छः प्रतिशत शिक्षा के मद में खर्च किया जाए। प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) में इसे एक राष्ट्रीय लक्ष्य भी बनाया गया। लेकिन इस राष्ट्रीय लक्ष्य को आज 40 साल बाद भी नहीं प्राप्त किया जा सका है। 1968 की राष्ट्रीय नीति के बाद 1986 के दूसरे राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी इस लक्ष्य को दोहराया गया। 1992 की यशपाल समिति, 2016 के टीआरएस सुब्रमण्यन समिति और भारत सरकार की प्रमुख नीति नियंता 'नीति आयोग' भी लगातार 6 प्रतिशत खर्च करने की अनुशंसा करती रही है। नीति आयोग ने अपनी हालिया रिपोर्ट 'स्ट्रैटेजी फॉर न्यू इंडिया 75' में कहा है कि 2022 तक भारत सरकार को शिक्षा पर खर्च को वर्तमान से दोगुना करते हुए जीडीपी का न्यूनतम 6 प्रतिशत सुनिश्चित करना चाहिए। सरकारी रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले पांच सालों में शिक्षा पर जीडीपी का खर्च औसतन 2.5 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत रहा, जो कि निर्धारित लक्ष्य का आधा भी नहीं है। ऐसा निकट भविष्य में भी संभव होता नहीं दिख रहा है! शिक्षा के मद में खर्च का सीधा संबंध शिक्षा की गुणवत्ता से होता है। अगर हम वैश्विक आंकड़ों की बात करें तो वैश्विक आंकड़ें भारत से कहीं बेहतर हैं। शिक्षा पर खर्च का वैश्विक औसत जीडीपी का 4.7 प्रतिशत है। अमेरिका अपनी जीडीपी का 5.6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है। जबकि नार्वे और क्यूबा जैसे छोटे देश अपनी जीडीपी का क्रमशः 7 और 13 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं। भारत के समान अर्थव्यवस्था वाले देश ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका दोनों शिक्षा पर लगभग अपनी जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करते हैं। कांग्रेस ने अपने 2019 के घोषणा पत्र में शिक्षा पर जीडीपी के न्यूनतम 6 प्रतिशत खर्च करने की बात कही है। जबकि सत्तासीन बीजेपी के घोषणा पत्र के शिक्षा कॉलम में यह नदारद है। इससे पार्टियों और सरकारों का राष्ट्रीय शिक्षा लक्ष्य के प्रति गंभीरता का पता लगाया जा सकता है।

"शिक्षा के महत्व को सभी जानते हैं लेकिन इस पर बात करने वाला कोई नहीं है।  कभी किसी भी नेता को शिक्षा के बारे में बात करते नहीं सुना।" इसके लिए मीडिया भी दोषी हैं क्योंकि मीडिया कभी भी शिक्षा के मुद्दे को खासकर चुनावों के समय कभी गंभीरता से नहीं उठाती है।

  वर्तमान राजनीति मूद्दो में वो दम नहीं कि नेताओं को झकझोर सकें और भारत को नईं दिशा प्रदान कर सकें। अगर आप देश में शिक्षा के स्तर को लेकर चिंतित हैं और इसमें सुधार देखना चाहते हैं, तो इसे राजनीति से जोड़कर ही देखना होगा। वह शिक्षा को राजनीति से जोड़ने और इसे एक राजनीतिक मुद्दा बनाने की जरूरत हैं। "आज की जरूरत है कि हम शिक्षा का राजनीतिक संदर्भ पहचाने और राजनीति की पुनर्रचना में शिक्षा का संदर्भ तय करें।
"शिक्षा चुनावी मुद्दा इसलिए नहीं है क्योंकि यह कोई तात्कालिक परिणाम नहीं दे सकता। अगर शिक्षा व्यवस्था में कोई परिवर्तन किया जाता है तो इसके परिणाम 10-20 साल बाद ही देखने को मिलेंगे। जबकि चुनावी दल कोई ऐसा मुद्दा खोजते हैं जो कि उन्हें तात्कालिक लाभ दे।

"किसी भी व्यवस्था में परिवर्तन नेताओं और नौकरशाहों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। चुंकि नेताओं और नौकरशाहों के संतान सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते इसलिए वे इस पर अधिक ध्यान नहीं देते।  अगर इच्छाशक्ति हो तो भारत में शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। और शिक्षा व्यवस्था में सुधार किये बिना भारत के सर्वांगीण विकास कि कोई सम्भावना भी नहीं है।
-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार 

अहं ब्रह्मास्मि का व्याख्या

अहं ब्रह्मास्मि कहने से या विचार करने से कोई ब्रह्म नही हो जाता । ब्रह्म होने को जानने का उपाय है, निर्विचार हो  जाना अहं ब्रह्मास्मि दोहराना नहीं है, एक ऐसी शांत, मौन, शून्य अवस्था जहां कोई विचार की तरंग नहीं रह जाती, वहां अनुभव होता है कि मैं परमात्मा हूं। लेकिन उस अनुभव में “मैं” का कोई अनुभव नहीं होता, यह तो भाषा में कहना पड़ता है इसलिए । उस अनुभव में सिर्फ परमात्मा है ऐसा अनुभव होता है। उस “मैं” में और सब भी समाहित होते हैं । उस “मैं” में सब मैं समाहित होते हैं।इसलिए जिन्होंने जाना है उन्होंने ऐसा नहीं कहा है कि मैं परमात्मा हूं और तुम नहीं; जिन्होंने जाना है उन्होंने कहा है कि मैं परमात्मा हूं और तुम भी। बुद्ध ने कहा है : जिस क्षण मैं बुद्ध हुआ उस दिन सारा अस्तित्व मेरे साथ बुद्ध हो गया आदमी ही नहीं पशु पक्षी भी, पशु पक्षी ही नहीं पौधे पत्थर भी। बुद्ध ठीक कहते हैं : जिस क्षण मैं बुद्ध हुआ उस क्षण मैंने जाना अरे, मैं तो हूं ही नहीं, सिर्फ बुद्धत्व है; सिर्फ भगवत्ता है; कण कण में वही व्याप्त है। जो मुझमें है वही बाहर है; जो भीतर, वही बाहर। मगर यह विचार से नहीं होगा।
-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Monday, April 8, 2019

शास्त्रों में गुरु के १२ भेद बतलाये गए हैं

शास्त्रों में गुरु के १२ भेद बतलाये गए हैं

—१-अध्यापक, २-पिता, ३-ज्येष्ठभाई, ४-राजा, ५-मामा, ६-श्वसुर, ७-रक्षक, ८-नाना, ९-पितामह, १०-बन्धु, ११-अपने से बड़ा, १२- चाचा —

उपाध्यायः पिता ज्येष्ठ भ्राता चैव महीपतिः ।
मातुलः श्वसुरस्त्राता मातामहपितामहौ ।।

बन्धुर्ज्येष्ठः पितृव्यश्च पुंस्येते गुरवः स्मृताः ।।

स्त्री वर्ग में भी कौन २ गुरुहैं–

इसकी भी परिगणना की गयी है –नानी ,मामी ,मौसी,सास, दादी,अपने से बड़ी जो भी हो ,तथा जो पालन करने वाली है ।

देखें –

मातामही मातुलानी तथा मातुश्च सोदरा ।
श्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा धात्री च गुरवः स्त्रीषु ।।

किन्तु जब प्राणी के ह्रदय में मुमुक्षा जागृत होती है  तब उसे कहाँ जाना चाहिए इसका निर्देश भगवती  श्रुति स्वयं कर रही है –“

तद्विज्ञानार्थं स गुरु मेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।”

श्रोत्रिय =शास्त्रवेत्ता  ब्रह्मनिष्ठ
गुरु के पास समिधा (एक बित्ते की कनिष्ठिका जितनी मोटी ३लकडियाँ) लेकर जाय ,इससे अपनीदीनता भी प्रकट होगी और राजा गुरु तथा देवता के पास रिक्त हस्त नहीं जाना चाहिए –“

रिक्तहस्तेन  नोपेयाद् राजानं दैवतं  गुरुम् ।”—

इस शास्त्र आज्ञा का पालन भी । ऐसे गुरुजन संसार से पूर्ण विरक्त आत्मचिंतननिष्ठ होते हैं ।
तपश्चर्या और आत्मबल से परिपूर्ण इनका  दर्शन भगवत्कृपा से ही संभव है —“

लभ्यतेपि तत्कृपयैव”—नारदभक्तिसूत्र ,ये ३ प्रकार के होते हैं ।

जो विभाग इनकी क्रिया शैली के आधार पर  किया गया है —१-स्पर्शदीक्षाप्रद गुरु—स्पर्शमात्र से जो गुरुजन दीक्षा देते है वे इस कोटि मेंआते हैं इनके स्पर्श मात्र से कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरणहो जाता है । ये अपने स्पर्श से ही शिष्य का पोषण करने में समर्थ होते हैं  ।

उदाहरण के रूप में आप देख सकते हैं की पक्षी अपने बच्चों को चारा चुन्गाता है पर उनका संवर्धन अपने पंखों के द्वारा बार बार उन्हें पूर्ण स्पर्श पूर्वक ढककर करता है ।
केवल आहार से पक्षियों के बच्चे नहीं बढते बल्कि माँ के स्पर्श से उनकी वृद्धि होती है । इसी श्रेणी के प्रथम गुरुजन हैं ।

२-दृग्दीक्षाप्रद गुरु—दृष्टि मात्र से जो जीवों का कल्याण करने में समर्थ होते है वे गुरुजन इस श्रेणी में आते हैं । इसके दृष्टांत के रूप में हम मछली को प्रस्तुत करते हैं । मछली को दुग्ध नहींहोता इसे प्रायः सभी लोग जानते हैं फिर वह अपने बच्चों का पालन कैसे करती है ? सुनें– जब मछली जल में तैरती है तब छुधापीड़ित बच्चे उसकी आँखोंके समक्ष आते हैं । मत्स्य की दृष्टि उन पर पड़ती है इसी से वे पुष्ट होते रहते हैं । इस प्रकार के गुरुजन दुर्लभ होते हैं ये किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होते हैं  ।
३-वैधदीक्षाप्रद गुरु—ये गुरुजन उस कोटि के हैं जो अपनेध्यान मात्र से शिष्य का कल्याण करने में सक्षम होते हैं  । ये ध्यान मात्र से किसी की महाशक्ति कुण्डलिनी को जगा सकते हैं तथा  भगवान की अविरल भक्ति प्राप्त कराने में भी समर्थ होते है इनसे एक बार  किसी सौभाग्य शाली को  जुड़ने का शुभ अवसर प्राप्त हो जाय तो उसे माया अपने मोह पाश में नहीं बाँध सकती है । भगवान कृष्णद्वैपायन व्यास जी में ये तीनों लक्षण थे । तीर्थ, देवता  और गुरु, विप्र तथा भगवान के पावन नाम में स्वल्प पुण्य वालों का विश्वास नहीं होता है —तीर्थे देवे गुरौ विप्रे ईश नाम्नि च पार्थिवे  ।स्वल्प पुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते ।।गुरु को ब्रह्मा इसलिए कहा गया क्योंकि वे हमारे ह्रदय में विमल ज्ञान की सृष्टि करते है – गृ धातु से गुरु शब्द की निष्पत्ति होती है –गृणाति=उपदिशति ब्रह्म ज्ञानमिति गुरुः=जो भगवद् विषयक ज्ञान का उपदेश करें वे गुरु है ,अतः गुरु ब्रह्मा है नूतन ज्ञान की सृष्टि करने कारण । बार बारसचेत करते हुए उस ज्ञान का संरक्षण करते हैं इसलिए विष्णु हैं ।
और स्वप्रदत्त ज्ञान के द्वारा कुसंस्कारोंतथा अनिष्टकारी प्रवृत्तियों का विनाश करते हैं इसलिय संहारकारी शिव हैं ।इन्हीं कारणों से उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा परब्रह्म कहा गया है —गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।हाँ एक बात और जो मैंने इन ३ प्रकार की दीक्षाओं का निरूपण किया है ,येकुलार्णव तंत्र में भगवान शिवजी के द्वारा भगवती पार्वती को उपदिष्ट हुई हैं  और भागवत की श्रीधरी टीका पर जो वंशीधरी व्याख्या है उसमें १०/२/१८ में आप देख सकते हैं ।

Wednesday, March 27, 2019

सामवेद

!!!---: वेद-परिचय :---!!!

सामवेदः---
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चारों वेदों में सामवेद का महत्त्व सर्वाधिक है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने स्वयं को सामवेद कहा हैः--"वेदानां सामवेदोsस्मि।" वस्तुतः जो सामवेद को जानता है, वहीं वेदों के रहस्य को जान सकता हैः---"सामानि यो वेत्ति स वेद तत्त्वम्।" (बृहद् देवता)

परिचयः--ऋग्वेद के मन्त्र (ऋक् या ऋचा) को जब विशिष्ट गान-पद्धति से गाया जाता है, तब उसे "सामन्" (साम) कहा जाता हैः--"विशिष्टा काचिद् साम्नो गीतिः सामेत्युच्यते" (पू.मी. 2.1.37,,शबर स्वामी)। पूर्वमीमांसा में ही गीति या गान को "साम" कहा गया हैः--"गीतिषु सामाख्या" (पू.मी.2.1.36)

छान्दोग्योपनिषद् (1.3.4) के अनुसार जो ऋक् है वही साम हैः--या ऋक् तत् साम" । और----"ऋचि अध्यूढं साम" (छा.उप. 1.6.1) । साम का विग्रह हैः--सा और अम। सा का अर्थ है---ऋचा और अम का अर्थ हैः--गान। दोनों मिलकर सामन् बनाः-- "सा च अमश्चेति तत् साम्नः सामत्वम्।" (बृह.उप.--1.3.22)

यजुर्वेद ने सामवेद को "प्राणतत्त्व" कहा हैः--साम प्राणं प्रपद्ये" (यजुः 36.1) "प्राणो वै साम" (श.प.ब्रा. 14.8.14.3) "स यः प्राणस्तत् साम" (जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण--4.23.3)

सामवेद सूर्य का प्रतिनिधि है, अतः उसमें सौर-ऊर्जा है। जैसे सूर्य सर्वत्र समभाव से विद्यमान है, वैसे सामवेद भी समत्व के कारण सर्वत्र उपलब्ध है। सम का ही भावार्थक साम हैः---"तद्यद् एष (आदित्यः) सर्वैर्लोकैः समः तस्मादेषः (आदित्यः) एव साम।" (जै.उप.ब्रा.-1.12.5)

सामवेद सूर्य है और सामवेद के मन्त्र सूर्य की किरणें हैं, अर्थात् सामवेद से सौर-ऊर्जा मनुष्य को प्राप्त होती हैः---"(आदित्यस्य) अर्चिः सामानि" (श.प.ब्रा. 10.5.1.5)

सामवेद में साम (गीति) द्युलोक है और ऋक् पृथिवी हैः--"साम वा असौ (द्युः) लोकः ऋगयम् (भूलोकः)" (ताण्ड्य ब्रा.4.3.5)

सभी वेदों का सार सामवेद ही हैः--"सर्वेषां वा एष वेदानां रसो यत् साम" (श.प.ब्रा. 12.8.3.23 और गो.ब्रा. 2.5.7)

साम के बिना यज्ञ अपूर्ण हैः---"नासामा यज्ञोsस्ति" (श.प.ब्रा. 1.4.1.1)

सामवेद के दो मुख्य भाग हैं---(1.) पूर्वार्चिक और (2.) उत्तरार्चिक। "आर्चिक" का अर्थ हैः--ऋचाओं का समूह।

(1.) पूर्वार्चिकः--
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इसमें चार काण्ड हैं---(क) आग्नेय-काण्ड, (ख) ऐन्द्र-काण्ड, (ग) पावमान-काण्ड, और (घ) अरण्य-काण्ड। इसमें एक परिशिष्ट भी हैः--महानाम्नी आर्चिक। पूर्वार्चिक में 6 अध्याय है। इन 6 अध्यायों को खण्डित किया गया है, जिन्हें "दशति" कह जाता है। दशति का अर्थ दश ऋचाएँ हैं, परन्तु सर्वत्र 10 ऋचाएँ नहीं है, कहीं अधिक कहीं कम है।

(1.) अध्याय 1 आग्नेय-काण्ड है। इसमें 114 मन्त्र हैं। इसके देवता अग्नि है।
(2.) अध्याय 2 से 4 तक ऐन्द्र-काण्ड हैं। इसमें 352 मन्त्र हैं। इसके देवता इन्द्र है।

(3.) अध्याय 5 पावमान-काण्ड है। इसमें कुल 119 मन्त्र हैं। इसके देवता सोम है।

(4.) अध्याय 6 अरण्य-काण्ड है। इसमें कुल 55 मन्त्र हैं। इसके देवता इन्द्र, अग्नि और सोम है।

इसमें एक परिशिष्ट "महानाम्नी आर्चिक" है। इसमें 10 मन्त्र है।

इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल 650 मन्त्र हैं।

अध्याय 1 से 5 तक की ऋचाओं को "ग्राम-गान" कहा जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि इसकी ऋचाओं का गान गाँवों में किया जाता था। अध्याय 6 अरण्य-काण्ड है। इसकी ऋचाओं का गान अरण्य (वन) में किया जाता था।

(2.) उत्तरार्चिकः---
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इसमें कुल 21 अध्याय हैं और 9 प्रपाठक हैं। इसमें कुल 400 सूक्त हैं।  इसमें कुल 1225 मन्त्र हैं। दोनों को मिलाकर 650 और 1225 को मिलाकर सामवेद में कुल 1875 मन्त्र हैं।

ऋग्वेद के 1771 मन्त्र सामवेद में पुनः आएँ हैं। अतः सामवेद के अपने मन्त्र केवल 104 ही है। ऋग्वेद के 1771 मन्त्रों में से 267 मन्त्र सामवेद में पुनरुक्त हैं। सामवेद के 104 मन्त्रों में से भी 5 मन्त्र पुनरुक्त हैं। इस प्रकार सामवेद में कुल पुनरुक्त मन्त्र 272 हैं। इस प्रकार सामवेद के अपने मन्त्र 99 ही हैं।

शतपथ-ब्राह्मण  के अनुसार सामवेद में एक लाख चौवालिस हजार अक्षर हैं---"चत्वारि बृहतीसहस्राणि साम्नाम्।" (श.प.ब्रा. 10.4.2.24)

सामवेद के ऋत्विक् उद्गाता हैं। इसके मुख्य ऋषि आदित्य  हैं।

सामवेद की शाखाएँ---
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मुनि पतञ्जलि के अनुसार सामवेद की 1000 शाखाएँ हैं---"सहस्रवर्त्मा सामवेदः" (महाभाष्य, पस्पशाह्निक) इन 1000 शाखाओं में 13 नाम इस समय उपलब्ध हैं---

(1.) राणायम (राणायनि) , (2.) शाट्यमुग्र्य (सात्यमुग्रि),
(3.) व्यास,, (4.) भागुरि,, (5.) औलुण्डी,, (6.) गौल्गुलवि,,
(7.) भानुमान् औपमन्यव,, (8.) काराटि (दाराल),,,
(9.) मशक गार्ग्य (गार्ग्य सावर्णि),,(10.) वार्षगव्य (वार्षगण्य),,
(11.) कुथुम (कुथुमि, कौथुमि),, (12.) शालिहोत्र, (13.) जैमिनि।

इन 13 शाखाओं के नामों में से सम्प्रति 3 शाखाएँ ही उपलब्ध हैं---(1.) कौथुमीय, (2.) राणायनीय और (3.) जैमिनीय।

सामवेद का अध्ययन ऋषि व्यास ने अपने शिष्य जैमिनि को कराया था। जैमिनि ने अपने पुत्र सुमन्तु को, सुमन्तु ने सुन्वान् को और सुन्वान् ने अपने पुत्र सुकर्मा को सामवेद पढाया। सामवेद का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार व विस्तार सुकर्मा ने ही किया था। सुकर्मा के दो शिष्य थे---(क) हिरण्यनाभ कौशल्य और (ख) पौष्यञ्जि। इनमें हिरण्यनाभ का शिष्य कृत था। कृत ने एक महान् काम किया था। उसने सामवेद के 24 प्रकार के गान-स्वरों का प्रवर्तन किया। इसलिए उसके कई अनुयायी व शिष्य हुए। उनके शिष्य "कार्त" कहलाए। आज भी कार्त आचार्य पाये जाते हैं।

(1.) कौथुमीय (कौथुम) शाखाः--
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यह शाखा सम्प्रति सम्पूर्ण भारत में प्रचलित है। कौथुमीय और राणायमीय शाखा दोनों में विशेष भेद नहीं है। दोनों में केवल गणना-पद्धति का अन्तर है। कौथुमीय-शाखा का विभाजन अध्याय, खण्ड और मन्त्र के रूप में है। राणायनीय-शाखा का विभाजन प्रपाठक, अर्धप्रपाठक, दशति और मन्त्र के रूप में है। कौथुमीय-संहिता में कुल 1875 मन्त्र हैं।

इस संहिता सूत्र "पुष्पसूत्र" है। इसका ब्राह्मण "ताण्ड्य-महाब्राह्मण" है। इसे पञ्चविंश-ब्राह्मण भी कहा जाता है। इसमें कुल 25 अध्याय हैं, इसलिए इसका यह नाम पडा। इसका उपनिषद् "छान्दोग्योपनिषद्" है।

(2.) राणायनीय-शाखाः--
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इस शाखा में विभाजन प्रपाठक, अर्धप्रपाठक, दशति और मन्त्र के रूप में हैं।  इसकी एक शाखा सात्यमुग्रि है। इस शाखा का प्रचार दक्षिण भारत में सर्वाधिक है।

(3.) जैमिनीय-शाखाः---
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इस संहिता में कुल 1687 मन्त्र हैं। इसकी अवान्तर शाखा तवलकार है। इस शाखा से सम्बद्ध केनोपनिषद् है। तवलकार जैमिनि ऋषि के शिष्य थे।

सामवेद मुख्य रूप से उपासना का वेद है। इसमें मुख्य रूप से इन्द्र, अग्नि और सोम देवों की स्तुति की गई है। इसमें सोम और पवमान से सम्बद्ध मन्त्र सर्वाधिक है। सोम, सोमरस, देवता और परमात्मा का भी प्रतीक है। सोम से सौम्य की प्राप्ति होती है। सामगान भक्ति-भावना और श्रद्धा जागृत करने के लिए है।

स्वरः---
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सामवेद के मन्त्रों के ऊपर 1,2,3 संख्या लिखी जाती है, जो 1--उदात्त, 2--स्वरित और 3---अनुदात्त की पहचान है। ऋग्वेद के मन्त्रों में उदात्त के लिए कोई चिह्न नहीं होता, किन्तु सामवेद में उदात्त के लिए मन्त्र के ऊपर 1 लिखा जाता है। ऋक् के मन्त्र पर स्वरित वाले वर्ण पर खडी लकीर होती है, इसके लिए सामवेद में 2 लिखा जाता है। ऋक् में अनुदात्त के लिए अक्षर के नीचे पडी लकीर होती है, सामवेद में इसके लिए वर्ण के ऊपर 3 लिखा जाता है।ऋग्वेद में उदात्त के बाद अनुदात्त को स्वरित हो जाता है और स्वरित का चिह्न होता है। स्वरित के बाद आने वाले अनुदात्त वर्ण पर कोई चिह्न नहीं होता। इसी प्रकार सामवेद में चिह्न 2 के बाद यदि कोई अनुदात्त वर्ण है तो उस पर कोई अंक नहीं होगा और उसे खाली छोड दिया जाता है। ऐसे रिक्त वर्ण को "प्रचय" कहा जाता है। इसका उसका एक स्वर से (एकश्रुति) न ऊँचा न नीचा किया जाता है।

सात स्वर ये हैं---षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद।

ग्राम तीन हैः---मन्द्र (निम्न), मध्य (मध्यम) और तीव्र (उच्च)।

सामवेद से सम्बद्ध नारदीय-शिक्षा है।

सामविकारः---
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किसी भी ऋचा को गान का रूप देने के लिए कुछ परिवर्तन किए जाते हैं। इन्हें विकार कहा जाता है। ये कुल विकार 6 हैं। इनमें स्तोभ मुख्य है। ये छः विकार हैं---(क) स्तोभ, (ख) विकार, (ग) विश्लेषण, (घ) विकर्षण, (ङ) अभ्यास, (च) विराम।

सामगान के 4 भेदः---
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(1.) ग्राम-गेय-गानः--इसे प्रकृतिगान और वेयगान भी कहा जाता है। यह गाँव में सार्वजनिक स्थलों पर गाया जाता था।

(2.) आरण्यगानः--इसे वनों में गाया जाता था। इसे रहस्यगान भी कहा जाता है।

(3.) ऊहगानः--इसका अर्थ है विचार पूर्वक विन्यास करना। पूर्वार्चिक से सम्बन्धित उत्तार्चिक के मन्त्रों का गान इस विधि से किया जाता था। इसे सोमयाग व विशेष धार्मिक अवसर पर गाया जाता था।

(4.) ऊह्य-गानः--इसे रहस्यगान भी कहा जाता है। रहस्यात्मक होने के कारण इसे साधारण लोगों में नहीं गाया जाता था। ऊहगान और ऊह्यगान विकार गान है।

शस्त्रः---
सामवेद में "शस्त्र" शब्द का प्रयोग किया है। इसका अभिप्राय है कि गान-रहित मन्त्रों के द्वारा सम्पादित स्तुति को "शस्त्र" कहा जाता है। इसी कारण ऋग्वेद के स्तुति-मन्त्र को "शस्त्र" कहा जाता है।

स्तोत्रः---
इसके विपरीत गान युक्त मन्त्रों द्वारा सम्पादित स्तुति को "स्तोत्र" कहा जाता है। सामवेद के मन्त्र "स्तोत्र" है, क्योंकि वे गेय हैं, जबकि ऋग्वेद के मन्त्र "शस्त्र" हैं।

स्तोमः--तृक् (तीन ऋचा वाले सूक्त) रूपी स्तोत्रों को जब आवृत्ति पूर्वक गान किया जाता है, तो "स्तोम" कहा जाता है।

विष्टुतिः---
विष्टुति का अर्थ है----विशेष प्रकार की स्तुति। विष्टुति स्तोत्र रूपी तृचों के द्वारा सम्पादित होती है। इसे गान के तीन पर्याय या क्रम समझना चाहिए। स्तोम के 9 भेद हैः--त्रिवृत् , पञ्चदश, सप्तदश, एकविंश, चतुर्विंश, त्रिणव, त्रयस्त्रिंश, चतुश्चत्वारिंश, अष्टचत्वारिंश।

सामगान की पाँच भक्तियाँ----
(1.) प्रस्ताव, (2.) उद्गीथ, (3.) प्रतिहार, (4.) उपद्रव और (5.) निधन। वरदराज का कहना है कि इन पाँचों में हिंकार और ओंकार जोड देने से 7 हो जाती हैं। इन मन्त्रों का गान तीन प्रकार के ऋत्विक् करते हैं---(1.) प्रस्तोता, (2.) उद्गाता और (3.) प्रतिहर्ता।

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Wednesday, March 13, 2019

क्या धर्म का वैज्ञानिक विश्लेषण सम्भव है?

धार्मिक बातें वैज्ञानिक हो सकती हैं। ऐसा लग सकता है कि धर्म में जो कहा गया है वह वैज्ञानिक है। परन्तु धर्म का वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता। यह संभव ही नहीं । धार्मिकता और वैज्ञानिकता एक ही सिक्के के दो आयाम हैं। बिल्कुल विपरीत आयाम। जैसे सिक्के के एक पहलू को देखकर दूसरे के बारे में कुछ भी ठीक ठीक नहीं कहां जा सकता। उसी प्रकार धर्म और विज्ञान है।

यह संसार दो भागों में बँटा है।
1- भौतिक
2- आध्यात्मिक (धार्मिक)
भौतिक वस्तुओं का विवेचन विज्ञान के आधार पर होता है। और आध्यात्मिकता का विवेचन चेतना के आधार पर होता है।
आध्यात्मिकता या धर्म का वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता। हाँ उदाहरण द्वारा समझने का प्रयास जरूर किया जा सकता है।
जीवन का उद्देश्य आध्यात्मिक होना है। और आध्यात्मिक होने का दो मार्ग है।
पहला मार्ग है चेतना को (प्रकृति मे) जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करना।
और दूसरा मार्ग है भौतिक वस्तुओं का खोज करना प्राप्त करना और निषेध करना कि यह जीवन का लक्ष्य नहीं हैं।
ध्यानी पुरुष पहले मार्ग का चयन करते हैं और हम लोग(जो ध्यान नहीं करते) दूसरे मार्ग का चयन करते हैं।
विज्ञान का गणित और धर्म का गणित बिल्कुल भिन्न है। विज्ञान में एक और एक, दो होता है चाहें  जिस परिस्थिति में या जैसे जोड़ा जाय परन्तु, धर्म में एक और एक कुछ भी हो सकता है।
समाधि में एक और एक शून्य होता है।
तथा भक्ति और प्रेम में एक और एक! एक ही रह जाता है।
और कर्मकांड में एक और एक दो हो जाता है।
अतः जब धर्म कर्मकांड रूप में होगा तो वैज्ञानिक लगेगा। इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि धर्म का वैज्ञानिक विश्लेषण हो सकता है क्योंकि दूसरे क्षण ही यह विश्लेषण गलत हो जायेगा।

-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार