Thursday, May 2, 2019

संगीत में सात स्वरों का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण - संस्कृत महात्म्य

संगीत में सात स्वरों का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण
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सात स्वर - सा रे ग म प ध नि ।।

संगीत आत्मा की सात्विक खुराक है। ब्रह्म के परम पवित्र प्रणव नाद ओंकार (ऊँ) की उत्पत्ति सृष्टि के साथ मानी गई है। भारतीय संगीत के सात स्वर न केवल हमारी शारीरिक तंत्रिकाओं को प्रभावित करते हैं , बल्कि पाशविक वृतियों का दमन भी करते हैं और हमारे अन्दर अध्यात्मिक एवं सात्विक विचारों का संचार भी करते है। भारत के योगियों ने सात स्वरों की उत्पति मानव शरीर के सात यौगिक चक्रों से मानी है। जब स्वरों को गाना बजाया जाता है तो स्वरों में जो आन्दोलन अलग-अलग निश्िचत संख्या में होता है उनके कंपन का प्रभाव मानव शरीर के यौगिक चक्रों पर पड़ता है इसी स्वर उपासना से मनुष्य आहत नाद से अनाहत नाद की ओर अग्रसर होता है। योगियों की भाषा में संगीत नाद योग है। सात यौगिक चक्र मानव शरीर के सात स्थानों में सर्प की भांति कुंडली मारे हुए है। सात यौगिक स्थानों से विकसित शक्तियों को योगी एकत्र करके जैसे जैसे उर्ध्वगामी करते हैं वैसे वैसे शक्ति मनुष्य के नीचे के केन्द्रों से ऊपर के केन्द्रों में चढ़ती जाती है। अंततः सप्तचक्र भेदन होने पर शिव शक्ति अर्थात आध्यात्मिक शक्ति मेल हो जाता है जिन सप्त चक्रों से सप्त स्वरों की उत्पत्ति मानी है वह है, या स्वर की उत्पत्ति मूलाधार चक्र से मानी गई है अर्थात्‌ सा का केन्द्र मूलाधार है।

मूलाधार चक्र का हमारे शरीर में गुदा स्थान है। जब सा की आन्दोलन अर्थात कंपन बढ़ता है तो ऋषभ (रे) स्वर की उत्पति होती है। जिसका केन्द्र स्वाधिष्ठान चक्र माना गया है। रे से रस की उत्पति होने लगती है। स्वाधिष्ठान का स्थान शरीर में जननेन्द्रिय के ठीक ऊपर और जधन अस्थि पर स्थिर है। गंधार स्वर की उत्पति मणिपुर चक्र से होती है। गंधार स्वर से ही अग्नि तत्व की जागृति होती है मूल नाद ब्रह्म की उत्पति मणिपुर चक्र से ही होती है। मणिपुर चक्र का स्थान शरीर में नाभि में होता है। मध्यम (म) स्वर का उत्पत्ति स्थान अनाहत चक्र कहा गया है। जिसका स्थान वक्षस्थल के मध्य में रीढ़ की हड्डी के अन्दर है। अनाहत चक्र शरीर को दो भागों में बांटता है। मध्यम स्वर एक लय बनाता है यह लय मंकार कहलाती है। जिसके कारण अनाहत नाद की अनुभूति होने लगती है। पंचम स्वर का उद्गम विशुद्धि चक्र से होता है। जिसका स्थान गले में (थायराइज के पास) है। प अर्थात प्राण, विशुद्धि चक्र में 16 छोटे-छोटे पंपल होते है। जो प्राण वायु को नियंत्रित करते हैं। गायन संगीत में रियाज की आवश्यकता होती है। रियाज से ये पंपल संस्कारित होते हैं और पंचम स्वर की उत्पति और निशुद्धि चक्र की जागृति करते हैं। पंचम स्वर की उत्पति होने के बाद मनुष्य ध्यान की ओर बढ़ जाता है, उसी ध्यान में जब वह लीन हो जाता है तो आज्ञा चक्र से धेवत (ध) स्वर की उत्पति होती है और व्यक्ति अन्तर्मुखी हो जाता है। आज्ञाचक्र का स्थान दोनों भोंहों के बीच में है। जहां पर तिलक लगाया जाता है। यहां पर भगवान शिव (रूद्र ग्रंथि)का वास कहा जाता है। इसी धैवत के ध्यान से अर्थात आज्ञा चक्र की जागृति से सूरदास जैसे महान कवि व संगीतज्ञ हुए हैं। सातवां स्वर निषाद है जिसकी उत्पति सहस्जार चक्र से हुई है। सहस्त्राट चक्र का स्थान सिर के ऊपरी भाग जहां पर चोटी रखी जाती हैं। इस स्थान को कृपाल कहा जाता है। निषाद की उपासना से व्यक्ति निरलिप्तत्ता की अवस्था में पहुचता है। तभी कहा भी गया है, ÷निरलिप्त समाधिनाः' अर्थात्‌ जो व्यक्ति संसारिक भोगों को छोड कर समाधि की अवस्था में पहुच जाता है। इस अवस्था में पहुंचने के ताल सहायक होता है जब ताल में कंपन पैदा होता है तो मूलाधार चक्र जागृत होता है और यही विशिष्ट कंपन सभी चक्रों को जागृत करके मनुष्य निरलिप्त अवस्था अर्थात मोक्ष मार्ग की ओर बढ जाता है ।।
-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार
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मनुर्भव

ज्योतिष

ज्योतिषशास्त्र को समझने के लिए कुछ बातों को समझ लेना आवश्यक है।
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ज्योतिषशास्त्र बीज को देखकर वृक्ष, फल, फुल, रंग ,स्वाद, आदि विभिन्न प्रकार के बातों को बताने वाला शास्त्र है।।
भारतीय दर्शन के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं,-१.संचित कर्म,२-प्राब्ध कर्म,३-क्रियमाण कर्म. वर्तमान तक किया गया कर्म संचित कर्म कहलाता है, वर्तमान मे जो कर्म हो रहा है, वह क्रियमाण है, संचित कर्म का जो भाग हम भोगते है, वह प्रारब्ध कहलाता है, लेकिन जब हम किसी बात को सोचते हैं तो कहते हैं, कि पीछे जो हम करके आये हैं, वह याद क्यों नही रहता है, तथा कल जो होने वाला हमें याद क्यों नही रहता है, प्रकति से हमारे सामने जो अभी है, वह ही हमे याद रहता है, कल हमने जो किया है, कल क्या होगा, यह हमे दूसरे दिन ही पता लगता है, जो व्यक्ति पीछे और आगे की बात को कहता है, उसके लिये ही ज्योतिष विज्ञान का निर्माण किया गया है, इस विज्ञान के द्वारा जन्म समय के जो भी तत्व सामने होते हैं, उनके प्रभाव का असर प्रकॄति के अनुसार जो भी पहले हुआ या इतिहास बताता है, उन तत्वों का विवेचन करने के बाद ही ज्योतिष का कथन किया जाता है, ज्योतिश मे तीन प्रकार के कर्मों की व्याख्या बताई जाती है, पहला-सत, दूसरा-रज और तीसरा-तम.उसी तरह से तीन प्रकार के शरीर भी बताये गये हैं-स्थूल शरीर, सूक्षम शरीर, कारण शरीर.
*१.स्थूल शरीर* जन्म के बाद जो शरीर सामने दिखाई देता है, वह स्थूल शरीर होता है, इसी स्थूल शरीर का नाम दिया जाता है, इसी के द्वारा संसारी कार्य किये जाते है, इसी शरीर को संसारी दुखों से गुजरना पडता है और जो भी दुख होते हैं, उनके लिये केवल एक ही भाषा होती है कि हमारी कोई न कोई भूल होती है, जो भूलता है वही भुगतता है, इसी शरीर के अन्दर एक शरीर और होता है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं।
*२.सूक्षम शरीर)* हर भौतिक शरीर के अन्दर एक सूक्षम शरीर होता है, इस बात का पता पहले नही था, मगर जब से लोगों को पुनर्जनम और ॠषियों द्वारा दिये गये हजारों साल पहले के कारण और आज के वैज्ञानिक युग मे आकर उनका दिखाई देना, जिनके बारे मे पहले कभी सोचा नही हो, वे सामने आयें और उनको देख कर हम लोग यही कहें, कि यह तो बहुत पहले देखा था, या सुना था, मंगल की पूजा के लिये हनुमानजी की पूजा हजारों सालों से की जा रही है और मंगल के लिये सभी ने पुराने वेदों की बातो के अनुसार ही उनका अभिषेक आदि करना चालू कर दिया था, मगर जब अमेरिका के नासा संस्थान ने वाइकिन्ग मंगल पर भेज कर मंगल का चेहरा प्रकाशित किया, तो लोगों का कौतूहल और जग गया कि, वेदों मे यह बात किस प्रकार से पता लगी थी कि मंगल का चेहरा एक बन्दर से मिलता है और मंगल एक लाल ग्रह है, इस बात के लिये कितनी बातें जो हम पिछले समय से सुनते आ रहे है, मंगल का रूप अंगारक, महाभान, अतिबक्र, लोहित और लोहित अंगोसे सुसज्जित शरीर की कामना बिना सूक्षम शरीर की उपस्थिति के पता नही चल सकती है।
*३.कारण शरीर * जब कारण पैदा होता है, तभी शरीर सूर्य की तरह से उदय होता है, इस शरीर को जो भी कार्य संसार मे करने होते हैं, उन्ही के प्रति इस शरीर का संसार मे आना होता है, कार्यों के खत्म होते ही यह शरीर बिना किसी पूर्व सूचना के चल देता है, पानी मे मिल जाता है, मिट्टी मिट्टी मे मिल जाती है, हवा हवा मे मिल जाती है, आग आग मे मिल जाती है और आत्मा अपनी यात्रा को दूसरे काम के लिये पुनर्जन्म लेने के लिये बाध्य हो जाती है, यही कारण रूपी शरीर की गति कहलाती है।
*ज्योतिष से व्यक्तित्व का विभाजन* ज्योतिष के अनुसार व्यक्तित्व को दो भागों मे विभाजित किया है, पहला-बाह्य व्यक्तित्व और दूसरा-आन्तरिक व्यक्तित्व.सौरमण्डल के सातों ग्रह उपरोक्त दोनों व्यक्तित्वओं को अपने अपने गुण धर्म के अनुसार प्रभावित करते हैं, सूर्य और चन्द्रमा का प्रत्यक्ष प्रभाव सॄष्टि पर द्रष्टिगोचर है, जिस परिस्थति के अनुसार जातक का जन्म होता है, उसी के अनुसार जातक का प्राकॄतिक स्वभाव बन जाता है, सूर्य के प्रभाव से जाडा, गर्मी, वर्षा ॠतुओं का आगमन होता है और चन्द्र के अनुसार शरीर मे पानी का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है, समुद्र मे आने वाला ज्वार-भाटा चन्द्रमा के प्रभाव का प्रत्यक्ष कारण है। जीवन के भाव, विचार, रूप, व्यक्तित्व, यादें, प्रवॄत्ति, न्याय, अन्याय, सत्य, असत्य, प्रेम, कला, आदि जितने भी जीवन के कारण हैं, सब के सब ग्रहों के प्रभाव से ही बनते बिगडते रहते हैं, सात ग्रह तो प्रत्यक्ष है और दो छाया ग्रह हैं, इस प्रकार से वैदिक ज्योतिष मे नौ ग्रहों का विवेचन मिलता है।

Wednesday, May 1, 2019

लट लकार -अभ्यास (वर्तमान काल)

ॐहरिःॐ ॥ ॐहरिःॐ ॥ ॐहरिःॐ

     ❁ लट्लकार-अभ्यास ❁
१)प्रातः सूर्योदयः भवति ।
               (सवेर सूर्योदय होता है)।
२)मार्गे आम्रे पतिते भवतः ।
               (राह में दो आम गिरे होते हैं)।
३)उपवने इदानीं जनाः भवन्ति ।
               (बाग में इस समय लोग होते हैं)।

४)त्वं तत्रैव कथं भवसि ?
               (तुम वहीं क्यों होते हैं ?)
५)युवां प्रातः कुत्र भवथः ?
               (तुम दोनों सवेरे कहाँ होते हो?)
६)यूयं क्रीडाङ्गणे भवथ खलु ?
               (तुम सब खेल के मैदान में होते हो ! न ?)

७)अहं तु तत्र न भवामि ।
               (मैं तो वहाँ नहीं होता हूँ।)
८)आवां तदा पठन्तौ भवामः ।
               (हम दोनों तब पढ़ते हुए होते हैं।)
९)वयं सार्धसप्तवादने पाठशालायां भवामः ।
               (हम सब ०७:३० बजे पाठशाला में होते हैं।)

ॐ॥ जयतु संस्कृतम् ॥ॐ॥ जयतु भारतम् ॥ॐ

Sunday, April 28, 2019

ध्यान का महत्व

यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं योजनान्बहून।
भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन।।
-ध्यानबिन्दोपनिषद
अर्थ- :
यदि अनेक योजनों में भी पहाड़ के समान पाप हो , तो वह भी ध्यान योगी के द्वारा विदीर्ण हो जाता है, पापो को नष्ट करने का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

आत्म ज्ञानी कैसे होते हैं?

वचने वचने वेदास्तीर्थानि च पदे पदे।
दृष्टौ दृष्टौ च कैवल्यं ह्यात्मज्ञानी स कथ्यते।।

अर्थ-
जिसके प्रत्येक वचन में वेदमंत्र अभिव्यक्त होता है। जिसके पद पर मे तीर्थों का वास होता है। जिसकी प्रत्येक दृष्टि मे मोक्ष प्रदान करने कि क्षमता होती है। यह आत्म ज्ञानी लक्षण है।

Friday, April 19, 2019

क्यों? प्रिय दिखाई पड़ने वाले लोग अप्रिय हो जाते हैं।

पाइथागोरस ने दिलचस्प बात कही थी कि संसार और कुछ नहीं सिर्फ संख्या है। अंको का खेल। हम सब अंक हैं। अपने अपने तरीके से तमाम तरह के अंक। घर में बड़े हैं तो प्रथम अंक हैं। भाइयों बहनों में तीसरे चौथे हैं। कार्यालय में भी हमारा अंक है, वरिष्ठता या कनिष्ठता में। जेल में हम कैदी नंबर-अंक हैं। मतदाता सूची, बैंक खाता, राशन कार्ड या परीक्षा में भी हम अंक हैं। हम अंक आच्छादित जान पड़ते हैं। अंकों का महत्व विभाजन में है। विभक्त देखने में अंको का उपयोग है, लेकिन प्रश्न ढेर सारे हैं। हम उनमे से कुछ प्रश्नों से मजेदार मुठभेड़ कर सकते हैं। क्या हमारे अंक कोई वास्तविकता हैं? उत्तर है नहीं। हम हम हैं। अंक सुविधा हैं। तो क्या हमारा नाम कोई वास्तविकता है? उत्तर होगा-नहीं। नाम भी घर समाज से मिला है। तो क्या हमारी यश प्रतिष्ठा वास्तविक है? क्या इसका संबंध नाम, रूप से ही नहीं है? प्रश्नाकुलता में परत दर परत आभासी रूप, कथन ही पकड़ में आते हैं। 'मैं' भी आभासी ही हूँ। ज्ञान प्रवाह के हरेक चरण से हमारी अपनी ही अभिलाषाएं आभासी बनती हैं। हमारी अभिलाषाओं ने ही हमारा संसार रचा है। संसार पर अनेक विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं। प्रश्न बड़े मजेदार हैं-कि क्या आखों से दिखाई पड़ने वाली ये वस्तुएं, नदियां और प्राणी पूरे दिखाई पड़ते हैं? वे जैसे दिखाई पड़ते हैं क्या वे वास्तव में वैसे ही हैं? वे हमारी आंख का धोखा तो नहीं हैं? आंख न भी धोखा दे तो क्या हमारी समझ विश्वसनीय है? ऐसे तर्क और प्रश्न यों ही नहीं काटे जा सकते। हमारी समझ में गहरा गए मित्र बाद में मित्र नहीं रह जाते। प्रिय दिखाई पड़ने वाले लोग अप्रिय हो जाते हैं।
-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Tuesday, April 16, 2019

चिरञ्जीवी

19 अप्रैल 2019 चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को परम प्रतापी, अमिट तेजस्वी, भक्त शिरोमणि भगवान हनुमानजी का जन्मोत्सव है।
आप सभी को हनुमतजयन्ती की अशेष शुभकामनाएँ।

इस धरा पर जो जन्म लिया एक न एक दिन उसको इस धरा को छोड़कर जाना भी निश्चित है।

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थात इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की पूर्ण आयु को प्राप्त करता है।

7 मई 2019 अक्षय तृतीया को भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव है।
16 जुलाई 2019 गुरुपूर्णिमा को भगवान वेद व्यास जी का जन्मोत्सव है।