Sunday, April 5, 2020

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले श्रीकृष्ण स्तुति

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले,
वक्षस्थले कौस्तुभम ।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले,
वेणु करे कंकणम ।
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम,
कंठे च मुक्तावलि ।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते,
गोपाल चूडामणी ॥
अर्थ -
'हे श्रीकृष्ण! आपके मस्तक पर कस्तूरी तिलक सुशोभित है। आपके वक्ष पर देदीप्यमान कौस्तुभ मणि विराजित है। आपने नाक में सुंदर मोती पहना हुआ है। आपके हाथ में बांसुरी है और कलाई में आपने कंगन धारण किया हुआ है। हे हरि! आपकी सम्पूर्ण देह पर सुगन्धित चंदन लगा हुआ है और सुंदर कंठ मुक्ताहार से विभूषित है। आप सेवारत गोपियों के मुक्ति प्रदाता हैं। हे ईश्वर! आपकी जय हो। आप सर्वसौंदर्यपूर्ण हैं।'

Monday, March 23, 2020

सोशल मीडिया में व्यक्तिगत जानकारी साझा न करें। क्यों?

प्रिय आत्मन!
बन्धुओं!
सोशल मीडिया पर अपने विचार साझा करें। व्यक्तिगत जानकारी जितना गुप्त रख सके उतना उचित है।
व्यक्तिगत जानकारी व्यक्तिगत रूप से प्राप्त करें या साझा करें।
• इससे बहुत सारी व्यक्तिगत जानकारीयाँ सार्वजनिक हो जातीं है।
• जिस जानकारी को किसी भी प्रकार से तोड़-मरोड़कर पेश किया जा सकता है।
• किसी भी जानकारी का स्वरूप बदलकर वह उकसावे वाली बनाई जा सकती है जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता।
• आपकी प्राइवेसी पूर्णत: भंग हो जाती है। जिससे आपको ब्लेकमेल भी किया जा सकता है, या डराया धमकाया जा सकता है।
• फोटो या वीडियो की एडिटिंग करके भ्रम फैला सकते हैं, इस कार्य में मित्रों की व्यक्तिगत टिप्पणीयाँ मदद करतीं हैं।
• सायबर अपराध सोशल मीडिया से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या है। आपकी व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर आपके नाम से अपराध किया जा सकता है।
#आपका
मुकेश ओझा 

Sunday, March 22, 2020

लॉक-डाउन के दिनों में अथवा अवकाश के दिनों में समय का सदुपयोग कैसे करें?

#लॉक_डाउन के दिनों में अथवा #अवकाश के दिनों में समय का सदुपयोग कैसे करें?
🌻अपने प्रत्येक कार्य को #साधना का अंग बनाएँ।
🌻घर में आपके साधना का क्रम क्या होना चाहिए?
👉दिन में 5 बार दश-दश के क्रम से प्राणायाम करें।
 👉प्रातः एवं संध्या के समय २५ से ३० मिनट का  भावातीत ध्यान करें।
👉जो मन्त्रों का जप कभी नहीं करते, वे जरूर कुछ देर भगवन्नाम मन्त्र का जप करें। 
👉जो नित्य मन्त्र जप करते हैं वे भी मन्त्र जप का संख्या बढ़ा लें।
👉 मैत्री भावना का अभ्यास करें।
👉यदि सोने का मन करें तो विपस्ना का अभ्यास करते हुए सोएँ।
👉किसी भी कार्य को साक्षी भाव से करने का प्रयास करें ।
#मनुर्भव
-डॉ मुकेश ओझा 
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Saturday, March 7, 2020

परपरागत संस्कृत और समान्य संस्कृत मे अंतर को जाने

 बन्धुओं!
संस्कृत बहुत विस्तृत है। अतः संस्कृत को दो भागों में विभक्त किया गया है।
1- परपरागत संस्कृत और 2- समान्य संस्कृत।
संस्कृत का सामान्य अध्ययन करने के लिए छात्र सामान्य संस्कृत पढ़ते हैं और संस्कृत से बी.ए., एम.ए. करते हैं।
👉
परन्तु यदि संस्कृत का विस्तृत ज्ञान चाहिये तो परंपरागत संस्कृत पढ़ना होता है। परंपरागत संस्कृत में स्नातक को शास्त्री तथा परास्नातक को आचार्य कहते है।
👉
सामान्य संस्कृत पढ़ने वाला अध्यापन के लिए सामान्य संस्कृत के पद पर नियुक्त होता है। 90% शैक्षणिक संस्थानों मे सामान्य संस्कृत का ही अध्ययन अध्यापन होता है।
👉परंपरागत संस्कृत पढ़ने वाला अध्यापन करने के लिए परंपरागत पद पर नियुक्त होता है।मात्र 10% शैक्षणिक संस्थानों में ही परंपरागत संस्कृत का अध्ययन अध्यापन होता है।
परंपरागत संस्कृत लगभग लुप्त होने के कगार पर हैं।
सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्व विद्यालय वाराणसी में सामान्य संस्कृत के छात्र सत्येन्द्र यादव की नियुक्ति परंपरागत पद (अथर्ववेद) पर हो गई जो UGC के नियमों के विरुद्ध है। जिस पर हमने एक लेख लिखा है।
परन्तु कुछ लोगों द्वारा इस विषय को जाती से जोड़ कर समाज में असंतोष फैलाया जा रहा है कि मै जाति के कारण नियुक्ति का विरोध किया हूँ। 
अतः आप सभी पाठकगण स्व बुद्धि का प्रयोग कर देश को समृद्ध करें।
आपका
-डॉ मुकेश ओझा

Tuesday, March 3, 2020

समाज निर्माण में अध्यापकों का योगदान

👉यदि आप अपने छात्रों के #आजीविका के लिए चिंतित नहीं हैं तो आप अच्छे #अध्यापक नहीं हैं।
अध्यापक समाज निर्माता होता है। अतः समाज कैसा है इसका उत्तरदायित्व भी अध्यापकों पर निर्भर करता है।
यदि आज भारत में बेरोजगारी बढ़ रही है तो इसके भी कारण अध्यापक ही हैं। 
उस शिक्षा से क्या लाभ जो शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी आजीविका के लिए सरकार या किसी और पर निर्भर रहना पड़े।
👉 सरकार का कार्य होना चाहिए निःशुल्क, श्रेष्ठ शिक्षा उपलब्ध कराना और अध्यापक का कार्य है श्रेष्ठ छात्रों का निर्माण करना। अध्यापकों का कार्य है ऐसे छात्रों का निर्माण करना जो किसी भी प्रकार से किसी अन्य पर निर्भर न रहे। ऐसे छात्रों का निर्माण करना जो अपने आजीविका के साधन स्वयं निर्मित करें।
और अध्यापकों का एक और महत्वपूर्ण कार्य है, यदि छात्रों के आजीविका में कोई बाधा है तो अध्यापक उस बाधा को स्वयं दूर करें।
मैं परंपरागत संस्कृत (प्रथमा, मध्यमा, शास्त्री, आचार्य किया हुआ) छात्र हूँ। 
👉 मैं आपलोगों को बता दूँ, आजकल संस्कृत कि दो उपाधियाँ (डिग्रीयाँ) विद्यालयों, विश्वविद्यालयों से प्राप्त होतीं हैं।
1- परंपरागत संस्कृत (प्रथमा, मध्यमा, शास्त्री, आचार्य) कि उपाधि।
2- आधुनिक संस्कृत (बी.ए.,एम.ए.) कि उपाधि।
👉
परंपरागत संस्कृत के छात्रों के आजीविका के लिए केवल दो मार्ग निकलते हैं। 1- कर्मकांड करें। या 2- परंपरागत संस्कृत विद्यालयों मे अध्यापन का कार्य करें।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आधुनिक संस्कृत को पढ़ने वाला परंपरागत संस्कृत विद्यालयों मे अध्यापन कर सकता है। और मंदिरों में कर्मकांड भी कर सकता है, परन्तु परंपरागत संस्कृत छात्र किसी भी आधुनिक विद्यालय विश्वविद्यालयों में आवेदन के लिए भी पात्र नहीं।
👉अब परंपरागत विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के अध्यापकों का यह दायित्व है कि वे अपने छात्रों के आजीविका के लिए संघर्ष करें और उनके लिए भी सभी जगहों पर आवेदन के लिए मार्ग प्रशस्त करें।
आपका छात्र जो परंपरा से पढ़कर शास्त्री, आचार्य किया है, वह आजीविका कैसे प्राप्त करेगा इस विषय पर कार्य करें।
परंपरागत संस्कृत के लगभग 18 विषय है। जिनका ह्रास हो रहा है। इन 18 विषयों का विस्तृत चर्चा पुनः करेंगे।
आपका
-डॉ मुकेश ओझा 
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार 
 🙏🙏

Saturday, February 29, 2020

कुछ प्रश्न स्वयं से

मेरी इच्छा है कि? 
मुझे जो भाषा सबसे ज्यादा पसंद है ।
मुझे इन्हें इकट्ठा करने में मजा आता है।
यदि मेरी कोई तीन इच्छाएँ पूरी होती हो तो वह होंगी।
चित्रकार जो मुझे बहुत पसंद है।
आप किसे एक महत्वपूर्ण खोज मानते हैं।
मेरी पसंदीदा एडवेंचर वाली गतिविधि।
वो लेखक जिन्हें पढ़कर मेरा जीवन बदल गया...
जीवन का वह निश्चय जिसे मैं अभी तक पूरा नहीं कर पाया।
नये वर्ष का वह निश्चय जिसे मैं अभी तक पूरा नहीं कर पाया।

मेरी समस्त इच्छाएँ विसर्जित हो जाएँ।
मै साक्षी हो जाऊँ।
मौन की भाषा
मै साक्षी हो जाऊँ
परमात्मा 
स्वयं का खोज
ध्यान 
🕊. वेद
जिसके लेखक का नाम - परमात्मा है।
🐣. ओशो
🌻. मैथली शरण गुप्त

#साक्षी_भाव
-डॉ मुकेश ओझा

Wednesday, February 19, 2020

प्राचीन शिव मंदिर का वैज्ञानिक और भौगोलिक विश्लेषण

भारत में ऐसे शिव मंदिर हैं जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक सीधी रेखा में बनाये गये हैं।
आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये?

उत्तराखंड का केदारनाथ, तेलंगाना का कालेश्वरम, आंध्रप्रदेश का कालहस्ती, तमिलनाडू का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः
रामेश्वरम मंदिरों को 79° E 41’54” Longitude के भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है।
यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे हम आम भाषा में पंच भूत कहते है।पंच भूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष।
इन्ही पाँच तत्वों के आधार पर इन पाँच शिव लिंगों को प्रतिष्ठापित किया है।
●जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है,
●अग्नि का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है,
●वायु का प्रतिनिधित्व कालहस्ती में है,
●पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम में है
●अतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है!

वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पाँच मंदिर।
भौगॊलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है। 
इन पाँच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था,और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है।
इस के पीछे निश्चित ही कॊई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा।
इन मंदिरों का करीब चार हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं था।
तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पाँच मंदिरों को प्रतिष्ठापित किया गया था? 
उत्तर भगवान ही जाने।केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है। 
लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते हैं।आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयॊग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है यह आज तक रहस्य ही है।
श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है।
तिरूवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है।
अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि
वह अग्नि लिंग है।
कंचिपुरम के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है...
और चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान के निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है।

अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करनेवाले पाँच लिंगो को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्ठापित किया गया है।
हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्धिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसा विज्ञान और तकनीक था जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है।माना जाता है कि केवल यह पाँच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होगें जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते हैं।
इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है।
संभवतः यह सारे मंदिर कैलाश को ध्यानन में रखते हुए बनाया गया हो जो 81.3119° E में पड़ता है!? 
उत्तर शिवजी ही जाने। 
कमाल की बात है
महाकाल से शिव ज्योतिर्लिंगों के बीच कैसा सम्बन्ध है...
उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों की दूरी भी है रोचक-
●उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी
●उज्जैन से,मल्लिकार्जुन- 999 किमी
●उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी
●उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी
●उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी
●उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी
●उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी
●उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी
●उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी
●उज्जैन से रामेश्वरम- 1999 किमी

उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है।
इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले।और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क)अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायीं गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला।
आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये।।