Tuesday, September 5, 2017

शिक्षक दिवस किस देश मे कब और क्यों मनाते हैं।

विश्व के कुछ देशों में शिक्षकों (गुरुओं) को विशेष सम्मान देने के लिये शिक्षक दिवस का आयोजन होता है। कुछ देशों में छुट्टी रहती है जबकि कुछ देश इस दिन कार्य करते हुए मनाते हैं।

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन (५ सितंबर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

आइए जानते हैं कि शिक्षक दिवस किस देश मे कब और क्यों मनाते हैं।

अर्जेन्टीना      
११ सितम्बर
डोमिंगो फास्टिनो सार्मिएन्टो की मृत्यु का दिन

अल्बानिया
शिक्षक दिवस
७ मार्च
सन १८६७ में अल्बानी भाषा में पाठन करने वाला प्रथम स्कूल खुला था।

ऑस्ट्रेलिया
World Teachers’ Day
अक्टूबर मास का अंतिम शुक्रवार

ब्राज़ील
Docente Dia
१५ अक्टूबर
1947 में साओ पाउलोके एक छोटे से स्कूल के पढ़ाने वालों ने पहली बार शिक्षक दिवस मनाया। इस तिथि को इसलिए चुना गया क्योंकि अक्तूबर 15, 1827 को पेड्रो १ ने एक फ़रमान के द्वारा ब्राज़ील में प्राथमिक शिक्षा को नियंत्रित किया। यह समारोह पूरे देश में लोकप्रिय हो गया और अक्तूबर 15 को आधिकारिक रूप से 1963 में शिक्षक घोषित किया गया था।

चिली
Día del Profesor
१६ अक्टूबर
1977 में इस तिथि को चुना गाया क्योंकि इसी दिन चिली के शिक्षकों के कॉलेज (Colegio de Profesores de Chile) की स्थापना हुई थी। 

चीन
१० सितम्बर
सामान्यतः कुछ गतिविधियाँ आयोजित होती हैं जिनमें विद्यार्थी अपने शिक्षकों का आदर करते हैं, जैसे कार्ड और फूल की प्रस्तुति।

चेक गणराज्य
Den učitelů
२८ मार्च
सामान्यतः समारोह या गतिविधियाँ इस दिन नहीं होती हैं, पर शिक्षक कभी-कभी एक दूसरे को तोहफ़े देते हैं।

इक्वाडोर
१३ अप्रैल

अल साल्वाडोर
२२ जून
एक राष्ट्र-व्यापी छुट्टी के रूप में मनाया जाता है।[5][6]

हांग कांग
१२ सितम्बर
हांग कांग के चीन का हिस्सा बनने के पश्चात 1997 से शिक्षक दिवस सितम्बर 10 को चीन के साथ-साथ मनाया जाता है।

हंगरी
शिक्षक दिवस
जून का पहला शनिवार

भारत
शिक्षक दिवस

५ सितम्बर
भारत के भूतपूर्वराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन (५ सितंबर) भारत में शिक्षक दिवसके रूप में मनाया जाता है।

इंडोनेशिया
Hari Guru
२५ नवम्बर

ईरान
२ मई (ईरानी पञ्चांग में Ordibehesht 12)
मोरतेज़ा मोतहरी के वीरगति को प्राप्त होने (मई 2, 1979) की याद में मनाया जाता है।

मलेशिया
Hari Guru
१६ मई
1956 में इसी दिन रज़ाक़ रिपोर्ट स्वीकृत हुई जिसके आधार पर मलेशिया में शिक्षा प्रणाली का चयन हुआ। शिक्षक दिवस को आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है।

मेक्सिको
Día del Maestro
१५ मई

मंगोलिया
Багш нарийн баярын өдөр (शिक्षक दिवस)
फ़रवरी का पहला सप्ताहांत

पाकिस्तान
शिक्षक दिवस
५ अक्टूबर
इसके माध्यम से शिक्षकों का महत्व और उनके गुणों मान्यता दी जाती है ताकि पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली में लगातार प्रगति हो।

पेरू
Día del Maestro
६ जुलाई
1953 में पेरू के राष्ट्रपति मैनुएल ए ऑड्रिया ने अध्यादेश द्वारा 6 जुलाई को शिक्षक दिवस घोषित किया था क्योंकि पेरू स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जोसे डे सन मार्टिन इसी दिन 1822नौर्मल स्कूल का प्रस्ताव पारित किया था। 

फ़िलीपीन्स
५ अक्टूबर
आधिकारिक तौर पर 5 अक्टूबर 
वास्तव में सितम्बर-अकतूबर के बीच बनाया जाता है।
फ़िलिपीनो-चीनियों के स्कूलों में यह सितम्बर 27 को मनाया जाता है जबकि 28 कन्फूश्स के जन्मदिन की छुट्टी दी जाती है।
कुछ कैथलिक स्कूलों में यह जनवरी 26 मनाया जाता है। 

पोलैंड
Dzień Nauczyciela
१४ अक्टूबर

रूस
День Преподавателя
५ अक्टूबर
1994 से अक्तूबर 5 को विश्व शिक्षक दिवस के अनुरूप मनाया जाता है।

सिंगापुर
१ सितम्बर
आधिकारिक स्कूल की छुट्टी। सामान्यतः समारोह एक दिन पूर्व होते हैं, जब विद्यार्थियों को आधे दिन के बाद छोड़ा जाता है।

दक्षिण कोरिया
스승의 날
१५ मई 1963 से सियोल में और 1964 से चुंजू शहर में
पूर्व में शिक्षकों को उपहार देने की प्रथा थी। आजकल रिश्वत के आरोपों के चलते कई स्कूल इस दिन बन्द रहते हैं।

ताइवान
२८ सितम्बर
स्कूलों में यह सितम्बर 27 को मनाया जाता है जबकि 28 कन्फूश्स के जन्मदिन की छुट्टी दी जाती है।

थाईलैंड
วันครู
१६ जनवरी
थाईलैंड सरकार द्वारा एक प्रस्ताव २१ नवम्बर,१९५६ को पारित करके प्रथम शिक्षक दिवस 1957 में मनाया गया।

तुर्की
Öğretmenler Günü
२४ नवम्बर
कमाल अतातुर्क का विचार था कि नई नसल का निर्माण शिक्षकों द्वारा होता है। अतातुर्क को ही सर्वोच्च शिक्षक (तुर्की भाषा:Başöğretmen) माना गया है क्यों कि उन्होंने तुर्की के लिए नई लिपि को 1923 में अपने देश के लिए चुना।

संयुक्त राज्य अमेरिका
राष्ट्रीय शिक्षक दिवस६ मई को मनाया जाता है। गुरु-मान्यता सप्ताह मई के पूरे सप्ताह मनाया जाता है।[11] मसाचुएट्स में यह जून के पहले सप्ताह मनाया है।

वियतनाम
Ngày nhà giáo Việt Nam
२० नवम्बर
यह पहली बार 1958 में अंतरराष्ट्रीय शिक्षकों के घोषणा पत्र के दिन के रूप में मनाया गया। 1982 में इसे पुनः नामांकित करके वियतनामी शिक्षक दिवस घोषित किया गया था।

अन्य देश जहाँ शिक्षक दिवस मनाया जाता है-

ओमान, सीरिया, मिश्र, लीबिया, कतर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, टुनिशिया, जार्डन, सउदी अरब, अल्जीरिया,मोरक्को और अन्य इस्लामी देशों में २८ फरवरी को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Saturday, September 2, 2017

दम तोड़ रही भाषाएँ


भारत में ये भाषाएं दम तोड़ रही हैं

दुनिया में सैकड़ों भाषाएं दम तोड़ने के कगार पर हैं. यूनेस्को के मुताबिक 577 ऐसे भाषाएं है जिन पर लुप्त होने का सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है. इसमें भारत की 42 भाषाएं शामिल हैं. इनमें अधिकतर आदिवासी इलाकों की भाषाएं हैं.

जारवा

यूनेस्को के अनुसार दक्षिण अंडमान द्वीप की जारवा भाषा को बोलने वाले अब सिर्फ 31 लोग बचे हैं. इस इलाके की और भी कई भाषाओं पर खतरा मंडरा रहा है.

ग्रेट अंडमानीज

इस भाषा को अका जेरू या जेरू भी कहते हैं. मध्य और उत्तरी अंडमान में प्रचलित रही इस भाषा को बोलने वाले सिर्फ पांच लोग हैं. यूनेस्को के पास यह आंकड़ा 2007 का है.


सेंटीनल

अंडमान द्वीप पर बोली जाने वाली भाषा सेंटीनल भी दम तोड़ने के कगार पर है. इसे बोलने वाले लोगों की संख्या अब 50 से भी कम बची है.

ओंगे

यूनेस्को का कहना है कि ओंगे भाषा को बोलने वाले लोगों का आंकड़ा भी 50 ही माना जाता है, हालांकि वास्तविक संख्या इससे काफी कम हो सकती है.

शोमपेन

ग्रेट निकोबार आइलैंड के जंगलों में रहने वाले लोग इस भाषा को बोलते हैं. असली संख्या पता नहीं लेकिन अनुमान है कि अब इसे सिर्फ 100 लोग ही इस्तेमाल करते हैं.

लामोंगीज

लिटिल निकोबार और कोंडुल द्वीपों पर लामोंगीज भाषा बोली जाती है. लेकिन अब इसे बोलने वाले सिर्फ 400 लोग बचे हैं.

ताराओ

ताराओ भाषा पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के चंदेल और उखरुल जिले के इलाकों में बोली जाती है. 2001 की जनगणना के अनुसार अब सिर्फ 870 लोग ताराओ भाषा बोलते हैं.

पुरुम

मणिपुर के सेनापाटी जिले के फाइजोल, लाइकोट, थुइसेनपाई और खरम पालेन गांवों में यह भाषा बोली जाती है. माना जाता है कि अब इसे बोलने वाले सिर्फ 503 लोग ही बचे हैं.

तंगम

अरुणाचल प्रदेश के तंगम गांव में इस भाषा को बोलने वाले लोग रहते हैं. उसी के नाम पर इसका नाम भी पड़ा है. इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 100 के आसपास है.

म्रा

अरुणाचल प्रदेश की ऊपरी सुबानसीरी नदी घाटी के कुछ गावों में यह भाषा बोली जाती है. ताजा आंकड़ों के अनुसार अब सिर्फ 350 लोग ही इस भाषा को बोलते हैं.

ना

चीन से लगने वाले अरुणाचल प्रदेश के कुछ गांवों में ना भाषा भी चलती है. लेकिन इसे इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या सिमट कर अब 350 रह गयी है.

ग्रहों के रंग रत्न और धातु

ग्रहों के रंग रत्न और धातु
++++++++++++++++
क्रम ग्रह         कपडे का रंग      धातु       रत्न           उपरत्न
1 सूर्य            केशरिया        तांबा      माणिक्य       लाडली
2 चन्द्र             सफ़ेद         चांदी       मोती         मून स्टोन
3 मंगल             लाल         तांबा       मूंगा लाल    हकीक
4 बुध               हरा          स्वर्ण       पन्ना           जेड
5 गुरु               पीला        स्वर्ण       पुखराज   सुनहला
6 शुक्र             सफ़ेद        स्वर्ण         हीरा        जिर्कान
7 शनि            काला          रांगा       नीलम      काकानीली
8 राहु            नीला           लोहा       गोमेद         तुरमुली
9 केतु           धारीदार      पंचधातु    लहसुनिया      सुलेमानी

मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे, यह एक गलत धारणा है।

मिथक : मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे।

आपने यह कई जगह पढ़ा होगा कि मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे! डार्विन के विकासवाद के विरोधी तथा धार्मिक कथाओं मे विश्वास करने वाले भी यह कहते रहते है कि यदि मानवो का विकास बंदरो से हुआ है तो अभी तक बंदर क्यो बचे हुये है, उन्हे मानव या कम से कम आदिमानव अवस्था मे होना चाहिये।

सत्य क्या है ?

वैज्ञानिक तथ्य यह है कि बंदर मानव के पूर्वज नही है। यह गलतफहमी चित्र के बांये भाग मे दिखाये गये प्रसिद्ध भाग से उपजी है। इस चित्र का प्रयोग डार्विन के क्रमिक विकासवाद को दर्शाने के लिये किया जाता है। यह चित्र जीवन के विकासवाद का गलत चित्रण है।

पृथ्वी पर जीवन का प्रारंभ अमीबा जैसे एक कोशीय जीव से हुआ है। इन एक कोशीय जीवो से बहु कोशीय जीव बने। इन बहुकोशीय जीवो मे क्रमिक विकास से अन्य जीव बनते गये। यह विकास एक वृक्ष की तरह हुआ है। जीवन की हर प्रजाती इस वृक्ष की एक शाखा है। चित्र का दांया भाग देखे।

इस तरह से सारे जीवों का पूर्वज एक कोशीय जीव था। इस एक कोशीय जीव से सारी प्रजातियाँ उत्पन्न हुयी है। उसी तरह से बंदर (वानर प्रजाति) और मानव जाति का पूर्वज एक ही जीव प्रजाति थी। इस आदीवानर-मानव प्रजाति की दो शाखाये बनी, एक शाखा मानव के रूप मे विकसित हुयी, दूसरी शाखा से वानर प्रजाति बनी। मानव की शाखा से भी अन्य आधुनिक प्रजातियाँ बनी, जैसे अफ़्रीकी मानव, मंगोलीय मानव, युरेशीयन मानव इत्यादि! दूसरी शाखा से वानर की अन्य प्रजाति जैसे बंदर, लंगूर, चिम्पाजी, ओरेंग उटांग, बनमानुष जैसी प्रजातियाँ बनी।
इस तरह से देखे तो यह स्पष्ट है कि बंदर मानव के पूर्वज नही है, बल्कि बंदरो तथा मानवो का पूर्वज एक ही है। वानरो को मानवो का चचेरा भाई माना जा सकता है।

दूसरा प्रश्न कि यदि मानवो का विकास बंदरो से हुआ है तो अभी तक बंदर क्यो बचे हुये है, उन्हे मानव या कम से कम आदिमानव अवस्था मे होना चाहिये। यह प्रश्न उपर दिये गये तथ्य की रोशनी मे बेमानी हो जाता है। हर प्रजाति मे विकास की दर अलग होती है, मानव मे यह दर तेज है, अन्य प्रजाति मे यह दर धीमी है। वानरो मे विकास हो रहा है, लेकिन उन्हे मानव के समकक्ष आने मे लाखो वर्ष लग सकते है।

-डॉ मुकेश ओझा 

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार 

Tuesday, August 29, 2017

भवान्यष्टकम् अर्थ सहित

।। भवान्यष्टकम् ।।

न  तातो  न  माता  न  बन्धुर्न दाता
न  पुत्रों  न  पुत्री  न  भृत्यो  न  भर्ता।
न  जाया  न  विद्या  न  वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं  त्वमेका  भवानी।।

अर्थात:

हे भवानी ! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, नौकर, स्वामी, स्त्री, विद्या, वृत्ति --इनमें से कुछ भी मेरा नहीं है।
हे देवी ! तुम्ही एकमात्र मेरी गति हो।

भवाब्धावपारे        महादु:खभीरु:
पपात   प्रकामी   प्रलोभी   प्रमत्त:।
कुसंसारपाशप्रबद्धः           सदाहं
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं  त्वमेका  भवानी ।।

अर्थात:

मैं विशाल भवसागरमें, महादुःखों से कायर हो चुका हु। मैं कामी, लोभी, और प्रमत्त बनकर अनिच्छनीय ऐसे संसार के बंधनों में सदा सदा बंधा पड़ा हुँ।
हे भवानी ! अब तुम्ही एकमात्र मेरी गति हो।।

न  जानामि  दानं   न    च   ध्यानयोगं
न  जानामि  तन्त्रं   न   च  स्तोत्रमन्त्रम्।
न  जानामि  पूजां   न   च    न्यासयोगं
गतिस्त्वं   गतिस्त्वं  त्वमेका    भवानी।।

अर्थात:

मैं दान देना नही जानता, ध्यानयोग की मुझे जानकारी नही। पूजा और मंत्र का भी मुझे ज्ञान नही है, और न्यासादि कर्मकांड से तो मैं बिलकुल अनजान हूँ ।
हे भवानी ! अब तुम्ही एकमात्र मेरी शरण हो।।

न  जानामि  पुण्यं  न  जानामि  तीर्थं
न  जानामि  मुक्तिं  लयं  वा  कदाचित्।
न  जानामि  भक्तिं  व्रतं   वापि    मातः
गतिस्त्वं   गतिस्त्वं   त्वमेका      भवानी ।।

अर्थात:

मैं पुण्य जानता नहीं, ना ही तीर्थ, लय या मुक्ति का तो मुझे बान है।
हे माता! भक्ति या व्रत भी मै नही जानता। हे भवानी! अब तो तुम्ही केवल मेरी शरण हो।।

कुकर्मी   कुसंगी   कुबुद्धिः   कुदासः
कुलाचारहीनः           कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः   कुवाक्यप्रबन्धः      सदाहं
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं   त्वमेका  भवानी।।

अर्थात:

मैं खराब कर्म वाला, खराब संगत में रहने वाला, खराब आदतों का गुलाम, कुल की शोभा बढ़े ऐसे मेरे आचरण भी नही है, दुराचारों में व्यस्त, खराब दृष्टि वाला, अयोग्य शब्द बोलने में माहिर हूँ मै।
हे भवानी! अब तो तुम्ही एकमात्र मेरी शरण हो।।

प्रजेशं     रमेशं      महेशं     सुरेशं
दिनेशं   निशीथेश्वरं  वा   कदाचित।
न   जानामि  चान्यत्  सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं  त्वमेका   भवानी।।

अर्थात:

मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चंद्रमा या अन्य कोई देवताओं को तो मै जानता भी नही हूँ ।
सदा सदा शरण देने वाली हे भवानी!
तुम्ही मेरी एकमात्र गति हो ।।

विवादे   विषादे   प्रमादे   प्रवासे
जले  चानले  पर्वते       शत्रुमध्ये।
अरण्ये  शरण्ये  सदा  मां    प्रपाहि
गतिस्त्वं   गतिस्त्वं  त्वमेका भवानी।।

अर्थात:

हे शरण में आनेवाले की रक्षा करनेवाली !
विवाद, विषाद, प्रमाद, प्रवास, जल, अग्नि, पर्वत, शत्रु, जंगल के बीच ( आपत्ति के बीच ) सदा  मेरी रक्षा करना।
हे भवानी! तुम्ही एकमात्र मेरी गति हो।।

अनाथो  दरिद्रो     जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः   सदाजाऽयवक्त्रः।
विपत्तौ  प्रविष्टः   प्रणष्टः   सदाहं
गतिस्त्वं  गतिस्त्वं। त्वमेका  भवानी।।

अर्थात:

हे देवी!  मैं सदा सदा के लिए अनाथ, दरिद्र, वृद्धावस्था से क्षीण, रोगी, अति दुर्बल, दीन, जड़, आपदाओं में फँसा हुआ, खत्म हो चुका हूँ।
हे भवानी! तुम्ही एकमात्र मेरी शरण हो।।

इति श्रीमच्छंऽकराचार्यविरचितं भवान्यष्टकं संपूर्णं।

।। गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ।।
हे माँ ! मै मंदबुद्धि जड तेरे शरण के योग्य हूँ ।।
शरणम् मम।।

Sunday, August 27, 2017

शंकराचार्य और भगवान शंकर का काशी में शास्त्रार्थ

मुझे आदि शंकराचार्य के बारे में एक सूंदर घटना का स्मरण आता है, वे पहले शंकराचार्य थे, जिन्होंने चार मंदिरों का निर्माण करवाया था--चारों दिशाओं में बैठे चार शंकराचार्यों के लिए चार गद्दियां। संभवत: पूरी दुनिया में वे उस वर्ग के दार्शनिको में सबसे प्रसिद्ध हैं जो कि यह सिद्ध करने में लगे हैं कि सब माया है। निसंदेह वे एक महान तार्किक थे, क्योंकि वह निरंतर दूसरे दार्शनिकों को पराजित करते आए थे उन्होंने देश भर में घूम कर बाकी सभी दर्शनशास्त्र के विद्यालयों को हरा दिये। उन्होंने अपने दर्शनशास्त्र को एकमात्र उचित दर्शन के रूप में स्थापित कर दिया । वह एकमात्र दृष्टिकोण: कि सब कुछ झूठ है, सब माया है।

शंकराचार्य वाराणसी में थे। एक दिन, सुबह-सुबह--अभी अंधेरा ही था, क्योंकि हिन्दू पंडित सूरज उगने से पहले ही नहा लिया करते हैं--उन्होंने स्नान किया। और जब वे सीढ़ियों से ऊपर आ ही रहे थे, एक आदमी ने उनको छू लिया और ऐसा गलती से नहीं हुआ था यह उसने जानबूझ कर किया था, "क्षमा करें मैं क्षुद्र हूं, आप को गलती से छू लिया परंतु अब आप को स्वच्छ होने के लिए दौबारा स्नान करना होगा।"

शंकराचार्य क्रोधित हो गए। वे बोले, "यह तुमसे गलती से नहीं हुआ, जिस तरीके से तुमने ऐसा किया; उससे साफ़ पता चलता है कि यह तुमने जान-बूझ के किया था। तुम्हे नरक भोगना होगा।"
वह व्यक्ति बोला, "जब सब-कुछ माया है, तो लगता है अवश्य ही नरक सत्य होगा।" शंकराचार्य तो यह सुन कर स्तभ्ध रह गए।

वह व्यक्ति बोला, "इससे पहले कि तुम स्नान करने जाओ, तुम्हे मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर देना होगा। यदि तुमने मेरे उत्तर नहीं दिए तो अब जब भी तुम स्नान कर के आओगे मैं तुम्हारा स्पर्श कर लूंगा।"
उस समय वहां एकांत था, सिवाय उन दोनों के कोई नही था, तो शंकराचार्य ने कहा, "तुम बड़े अजीब व्यक्ति हो। क्या हैं तुम्हारे प्रश्न?"

उसने कहा, "मेरा पहला प्रश्न है: क्या मेरा शरीर भ्रम है? क्या आपका शरीर भ्रम है? और यदि दो भ्रम शरीर एक दुसरे का स्पर्श कर लेते हैं तो, इसमें आपत्ति क्या है? क्यों आप एक और स्नान लेने के लिए जा रहे हो? जो उपदेश आप देते हो उसका पालन स्वयं ही नहीं करते । एक माया के जगत में, क्या एक अछूत और ब्राह्मण में कोई भेद हो सकता है?- पवित्र और अपवित्र में ?--जब दोनों ही भ्रम हैं, जब दोनों उसी एक तत्व के बने हो जिनके सपने बने होते हैं? तब कैसा उपद्रव?"

शंकराचार्य, जो कि बड़े-बड़े दार्शनिको को पराजित कर रहे थे, इस सरल से व्यक्ति को कोई उत्तर नहीं दे पाए क्योंकि जो भी उत्तर वे देते वो उनके खुद के दर्शन के विरुद्ध होता। यदि वे कहते हैं कि यह भ्रम है, तब इसमें क्रोधित होने जैसा कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यदि वे कहते कि ये सत्य है, तब वे इस तथ्य को स्वीकार करते कि शरीर सत्य है... पर तब एक समस्या है। यदि मनुष्य का शरीर सत्य है, तब पशुओं का शरीर, पेड़ो का शरीर, ग्रहों का शरीर, सितारों... सब सत्य है।

और उस व्यक्ति ने कहा, "मैं इस बात से अवगत हूं की आपको इसका उत्तर नहीं पता--यह आपके सारे दर्शनशास्त्र को नष्ट कर देगा। मैं आपसे एक और प्रश्न करता हूं: मैं एक क्षुद्र हूं, अछूत हूं, अपवित्र हूं, मेरी अपवित्रता कहां है--मेरे शरीर में या कि मेरी आत्मा में? मैंने आपको यह घोषणा करते सुना है कि आत्मा पूर्ण और शाश्वत रूप से पवित्र है, और उसे अपवित्र करने का कोई उपाय नहीं है; तो दो आत्माओं के बीच भेद कैसे हो सकता है? दोनों ही पवित्र हैं, पूर्णता, पवित्र और अपवित्रता की कोई सीमा नहीं होती--कि कोई ज्यादा पवित्र हो और कोई कम। तो हो सकता है कि मेरी आत्मा ने आपको अपवित्र कर दिया है और आपको दूसरा स्नान करना पड़ रहा है?

अब यह और भी कठिन था। लेकिन वे कभी भी इस तरह के परेशानी में नहीं पड़े थे-- यथार्थ, वास्तविक, एक तरह से वैज्ञानिक। बजाय शब्दों से तर्क करने के, उस क्षुद्र ने ऐसी स्तिथि खड़ी कर दी कि अदि शंकराचार्य को अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी। और क्षुद्र ने कहा, "तो आपको दुबारा स्नान करने की आवश्यकता नहीं है, वैसे भी वहां कोई नदी नहीं है, मैं भी नहीं, आप भी नहीं; सब स्वप्न ही तो है। आप मंदिर में जाएं--और वह भी एक स्वप्न है--और परमात्मा से प्रार्थना करें, वह भी एक स्वप्न है। क्योंकि वह भी मन के द्वारा खड़ा किया हुआ एक प्रक्षेपण है जो कि एक भ्रम है, और एक भ्रमित मन कुछ भी सत्य प्रक्षेपित नहीं कर सकता।
       ओशो
(कथा कहती है कि वे क्षुद्र  चाण्डाल वेष धारी साक्षात शिव  ही थे)