Monday, October 23, 2017

अनुभव और शास्त्र

◆ शास्त्रों से नहीं, केवल अनुभव से सत्य जाना जा सकता है। ◆ आपके अनुभव से शास्त्र सिद्ध होते हैं।

एक कहानी है

एक निर्जन रास्ते पर दो यात्रीयों को रुकना
पड़ा, क्योंकि सामने ही बड़ी तख्ती
लगी थी: 'रास्ता बंद है'। लेकिन तख्ती के पास से ही उन्होंने
देखा कि अभी - अभी गई गाड़ी के, कार के निशान
हैं। तो फिर उन्होंने तख्ती की फिक्र न की। फिर उन्होंने
उन निशानों का पीछा किया। वे आगे बढ़ गये। तीन मील बाद वह रास्ता टूट गया था, पुल गिर गया था, और उन्हें वापिस लौटने के सिवाय कोई उपाय न था। उनमें से एक ने दूसरे
को कहा, हमने तख्ती पर भरोसा क्यों नहीं किया?

दोनों
वापिस लौटे तो तख्ती की दूसरी तरफ नजर पड़ी,
जहां लिखा था, 'अब भरोसा आया न कि रास्ता
बंद है?'

मानव का जीवन भी
करीब - करीब ऐसा ही है।
तख्तियों पर सब लिखा है।
वे तख्तियां ही शास्त्र हैं। लेकिन
तुम उनकी न सुनोगे, जब तक तुम्हारा
अनुभव ही तुम्हें न बता दे कि वे सच हैं।
अनुभव के अतिरिक्त सच को जानने का कोई
उपाय भी नहीं है।

Saturday, October 21, 2017

परमात्मा का मन्त्र

अ,आ,इ, ई,उ, ऊ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ 
क,ख,ग,घ,ड़,च,छ,ज,झ,ञ,ट,ठ,ड,ढ,ण,त,थ,द,ध,न,प,फ,ब,भ,म,य,र,ल,व,व,श,ष,स,ह,क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,
हे प्रभु! मै आपकी आराधना करू भी तो कैसे करू आपके स्तुति मे कहा हुआ शब्द छोटा प्रतित होता है, मन्त्र बनाने का सामर्थ्य नहीं और पहले से बने मन्त्र इतने अधिक हैं कि याद नहीं होते, उन मन्त्रोंका अर्थ  समझ नहीं आता।
इसलिए मै आपके स्तुति मे वर्णमाला को कह रहा हूँ। अपने अनुसार उसको ठीक ठीक बैठा लेना।

धार्मिक क्रिया करने से धार्मिक नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि धार्मिकता एक आन्तरिक रूपांतरण है।
मनुर्भव
डॉ मुकेश ओझा

धार्मिक होने का अर्थ है मैं जो हूँ उससे संतुष्ट नहीं हूँ मुझे और विशिष्ट होना है

Wednesday, October 18, 2017

धन्वन्तरि पर एक पूर्ण लेख

यह लेख अरुण उपाध्याय जी का है जिसे मैं समाज के उपयोगिता के दृष्टि से प्रेषित कर रहा हूँ।

धन्वन्तरि का इतिहास-धन-त्रयोदशी को धन्वन्तरि-जयन्ती भी कहा जाता है। इतिहास में कई धन्वन्तरि हुये हैं, जिनमें २ कलियुग के पूर्व थे। धनु चाप के आकार का होता है जिससे बाण छोड़ते हैं। इसी प्रकार के यन्त्र द्वारा शरीर से शल्य निकालते हैं अतः शल्य चिकित्सक को धन्वन्तरि कहा गया है। शल्य चिकित्सा तथा आयुर्वेद कई विद्याओं का समन्वय है अतः चिकित्सक को वैद्य (विद्या युक्त) कहते हैं। आज भी डाक्टर का अर्थ चिकित्सक या शोध करने वाला भी होता है। इसी अर्थ में इसके अध्येता को सुश्रुत (श्रुति = वेद का विद्वान्) कहा गया है। कालक्रम से इन धन्वन्तरि का वर्णन है-
(१) समुद्र-मन्थन के समय-राजा बलि ने इन्द्र के ३ लोकों (रूस, चीन, भारत) पर अधिकार कर लिया था। मक्का (मख-मेदिनी = मक्का, मदीना) में उनका यज्ञ हुआ। यह राजसूय यज्ञ था जिसमें प्रजा से कर वसूल कर उसका पुनः लोकहित में प्रयोग होता है, जैसे मेघ समुद्र से जल लेकर उसे पुनः लोगों के लिये वर्षा करते हैं-
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्। सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः॥ (रघुवंश १/१८)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा आपो वसाना दिवमुत्पतन्ति।
त आववृत्रन् त्सदनादृतस्यादिद घृतेन पृथिवी व्युद्यते॥ (ऋक् १/१६४/४७)
     देवों का यज्ञ भाग असुरों को जा रहा था जैसा पराधीनता में होता है। वामन अवतार विष्णु ने जब ३ पद भूमि मांगी तो बलि ने तुच्छ जानकर दे दिया। यहां विष्णु का १ पद विषुव से कर्क रेखा तक की गति है। उत्तरी ध्रुव तक इस पद से २ ही पद पूर्ण होते हैं। तीसरा पद ध्रुव-वृत्त में आयेगा, जो बलि का सिर (उनकी अधिकृत भूमि का उत्तरतम भाग) कहा गया है। देव उतने निर्बल नहीं थे। युद्ध से बचने के लिये बलि ने इन्द्र का राज्य वापस कर दिया। पर कई असुर सन्तुष्ट नहीं थे और युद्ध चलते रहे। कूर्म अवतार विष्णु ने समझाया कि युद्ध द्वारा दूसरे देशों पर कब्जा करने से की लाभ नहीं है। यदि उत्पादन नहीं बढ़ेगा तो किस सम्पत्ति पर अधिकार होगा? उनकी सलाह मान कर असुरों ने देवों के साथ खनिज निकालने में सहयोग किया। असुर खनिज निकालने में दक्ष थे अतः उन्होंने खान के भीतर काम किया जो वासुकि नाग का गर्म मुंह कहा गया है। यह मुख्यतः छोटानागपुर में हुआ जहां मन्दार पर्वत पर वासुकिनाथ तीर्थ है। बाद में राजा सगर ने उस क्षेत्र के यवनों को ग्रीस भगाया अतः आज भी ग्रीक भाषा में जो खनिजों के नाम हैं वही छोटानागपुर के पूर्व असुरों की उपाधि हैं। वासुकिनाग का क्षेत्र होने से नागपुर तथा अच्युच-च्युत इन्द्र का क्षेत्र होने से च्युत = चुतिया =छोटा (अंग्रेजी उच्चारण) नागपुर हुआ। देव विरल खनिजों से धातु निकालने में दक्ष थे अतः जिम्बाबवे का सोना (जाम्बूनद स्वर्ण) तथा मेक्सिको की चान्दी निकालने में योग दिया (माक्षिकः = चान्दी)। पुनः खनिज सम्पत्ति के वितरण को लेकर युद्ध हुये तब कार्त्तिकेय ने असुरों को पराजित कर क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर अधिकार किया। इन सभी घटनाओं के समय असुर राजा बलि ही थे अतः उनको ७ चिरजीवियों में गिना गया है। कार्त्तिकेय का समय महाभारत वन पर्व (२३०/८-१०) में निर्दिष्ट है। उस समय उत्तरी ध्रुव की दिशा अभिजित् से दूर हट गयी अर्थात् अभिजित् का पतन हो गया। तब धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ हुआ। यह १५,८०० ई.पू. का काल है जब धनिष्ठा आरम्भ से वर्षा आरम्भ होती थी अतः सम्वत्सर को वर्ष कहा गया। इसी समुद्र मन्थन के १४ रत्नों में एक अमृत है जिसका कलश लेकर धन्वन्तरि निकले थे। उस समय लगातार युद्ध हुये, उसके घायल चिकित्सा के बिना मर रहे थे अतः शल्य चिकित्सा का व्यापक प्रयोग कर आहत लोगों की प्राण रक्षा हुयी। यही अमृत कलश है। इस परम्परा में राजा ययाति काल के शुक्राचार्य भी मृत सञ्जीवनी विद्या जानते थे।
(२) धन्वन्तरि द्वितीय काशीराज दिवोदास थे जिनका उल्लेख सुश्रुत संहिता, अध्याय १ में हुआ है-
अथातो वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः॥२॥
अथ खलु भगवन्तममरवरं ऋषिगण परिवृतमाश्रमस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरिं औपधेनव-वैतरणौरभ्रपौष्कलावत-
करवीर्य (र) गोपुर रक्षित सुश्रुत प्रभृतय ऊचुः॥३॥
एवमयमायुर्वेदोऽष्टाङ्ग उपदिष्यते, अत्र कस्मै किमुच्चतामिति॥९॥
त ऊचुः-अस्माकं सर्वेषामेव शल्यज्ञानं मूलं कृत्वोपदिशतु भगवानिति॥१०॥
त ऊचुर्भूयोऽपि भगवन्तम्-अस्माकमेककमतीनां मतमभिसमीक्ष्य सुश्रुतो भगवन्त प्रक्ष्यति, अस्मै चोपदिश्यमानं वयमप्युपधारिश्यामः॥१२॥
= काशीराज धन्वन्तरि ने शिष्यों के अनुरोध पर आयुर्वेद की ८ शाखायें पढ़ाई, जिसमें शल्य चिकित्सा पर अधिक जोर था।
सभी शिष्यों के विचारों का संकलन सुश्रुत ने किया, अतः इसे सुश्रुत संहिता कहा गया।
ब्रह्माण्ड पुराण में इनको समुद्र मन्थन काल के धन्वन्तरि का अवतार कहा गया है-
आयोः पुत्रा महात्मानः पञ्चैवासन् महाबलाः।१।
नहुषः प्रथमस्तेषां क्षत्रवृद्धस्ततः स्मृतः। रम्भो रजिरनेनाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः॥२॥
क्षत्रवृद्धात्मजश्चैव सुनहोत्रो महायशाः। सुनहोत्रस्य दायादस्त्रयः परमधार्मिकाः॥३॥
काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः।४।
काश्यश्च काशिपो राजा पुत्रो दीर्घतपास्तथा। धन्वश्च दीर्घतपसो विद्वान्धन्वन्तरिस्ततः॥७॥
धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं श्रूयतामिति वै द्विजाः। स सम्भूतः समुद्रान्ते मथ्यमानेऽमृते पुरा॥१०॥
उत्पन्नः कलशात्पूर्वं सर्वतश्च श्रिया वृतः। सद्यः संसिद्धकार्यं तं दृष्ट्वा विष्णुखस्थितः।।११॥
अब्जस्त्वमिति होवाच तस्मादब्जस्तु स स्मृतः॥१२॥ अथ वा त्वं पुनश्चैव ह्यायुर्वेदं विधास्यसि॥१८॥
द्वितीये द्वापरे प्राप्ते सौनहोत्रः स काशिराट्॥ पुत्रकामस्तपस्तेपे नृपो दीर्घतपास्तथा॥२०॥
तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा॥२३॥ (ब्रह्मांड पुराण २/३/६७)
    इस काल में दाशराज युद्ध हुआ था जिसका समय प्रायः ७३०० ई.पू. अनुमानित है। मान्धाता का पुत्र पुरुकुत्स, दिवोदास पुत्र सुदास का समकालीन था। मान्धाता का काल १५ वां त्रेता कहा गया है (वायु पुराण ९८/८८-९१)। ९१०२ ई.पू. तक १० त्रेता पूरे हो चुके थे। उसके बाद १ दिव्य वर्ष = ३६० वर्ष का १ युग-खण्ड लेने पर १५वें त्रेता का आरम्भ ९१०२-४x३६० = ७६६२ ई.पू. में होगा जो ७३०२ ई.पू. तक चलेगा। मान्धाता की १८ पीढ़ी बाद राजा बाहु यवन आक्रमण में मारा गया था जिसका काल मेगास्थनीज ने बाक्कस = डायोनिसस आक्रमण काल कहा है। यह जुलाई ३२६ ई.पू. के सिकन्दर आक्रमण से ६४५१ वर्ष ३ मास पूर्व अर्थात् ६७७७ ई.पू. अप्रैल में था। बाक्कस की १५ पीढ़ी बाद परशुराम (विष्णु अवतार) काल कहा है, जिनके देहान्त के बाद ६१७७ ई.पू. में कलम्ब सम्वत् आरम्भ हुआ जो आज भी केरल में चल रहा है। परशुराम काल १९वां त्रेता कहा है, जो ९१०२-८x३६० = ६२२२ ई.पू. में आरम्भ होकर ३६० वर्ष चला। इस काल में भी दाशराज नाम से व्यापक युद्ध हुये अतः शल्य चिकित्सा की बहुत आवश्यकता हुयी।
   पारसी इतिहास में भी ९८४४ ई.पू. में यम-वैवस्वत काल में जल प्रलय का आरम्भ कहा है उसके बाद ४ वंशों का शासन २५९८ वर्ष तक चला (७२४६ ई.पू. तक)। तब विस्तास्प ने १२० वर्ष राज्य किया। इसे ऋग्वेद में दाशराज युद्ध का ऋज्राश्व कहा गया है (ऋक् १/१०० आदि)।
(३) कलियुग के धन्वन्तरि-
   (क) परीक्षित को जब तक्षक नाग ने काटा था (३०४२ ई.पू.) तब भी एक धन्वन्तरि थे जो उनकी चिकित्सा करने में सक्षम थे। उनको घूस दे कर हटा दिया गया-
सप्ताहे समतीते तु गच्छन्तं तक्षकं पथि। धन्वन्तरिर्मोचयितुमपश्यद् गन्तुको नृपम्॥१०६॥
ब्रह्म वैवर्त पुराण (अध्याय २/४६)
  (ख) भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय ९,२०,२१ में कहा है कि समुद्र-मन्थन काल के धन्वन्तरि का जन्म काशी के कल्प ब्राह्मण के पुत्र रूप में हुआ जिन्होंने क्षत्रिय शिष्य सुश्रुत को कल्प-वेद (व्यावहारिक शल्य विज्ञन) पढ़ाया जो उन्होंने १० अध्यायों में लिखा-
तदा प्रसन्नो भगवान् (सूर्य) देवानाह शुभं वचः। अहं काश्यां भवाम्यद्य नाम्ना धन्वन्तरिः स्वयम्॥१७॥
कल्पदत्तस्य विप्रस्य पुत्रो भूत्वा महीतले॥१९॥
सुश्रुतं राजपुत्रं च विप्रवृद्ध समन्वितम्। शिष्यं कृत्वा प्रसन्नात्मा कल्पवेदमचीकरत्॥ २०॥
सुश्रुतः कल्पवेदं तं धन्वन्तरि विनिर्मितम्।पठित्वा च शताध्यायं सौश्रुतं तन्त्रमाकरोत्॥२३॥
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय ९)
   (ग) उसके बाद कलि की २३वीं शताब्दी (९०२ ई.पू. से) में धन्वन्तरि ने आयुर्वेद का प्रसार किया। उनके शिष्य सुश्रुत थे किनके शिष्य पुनः धन्वन्तरि ही कहे गये-
त्रिविंशाब्दे (कलि २२०० = ईसापूर्व ९०२) च यज्ञांशेतत्र वासमकारयत्।३४।
धन्वन्तरिर्द्विजो नाम ब्रह्मभक्ति परायणः।३६।
इति धन्वन्तरिः श्रुत्वा शिष्यो भूत्वा च तद्गुरोः। सुश्रुतादपरे चापि शिष्या धन्वन्तरेः स्मृताः॥४५॥
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय २०)
    (घ) कलि की २७ वीं शताब्दी (५०२ ई.पू. से) में शाक्यसिंह गौतम बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू. के सिद्धार्थ बुद्ध नहीं) ने वैदिक मार्ग को नष्ट करने के लिये यन्त्र स्थापित किये थे। प्रयाग के धन्वन्तरि ने उन यन्त्रों को हटा कर पुनः वेद मार्ग स्थापित किया तथा आयुर्वेद का उद्धार किया।
(भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय २१-सप्तविंशच्छते भूमौ कलौ सम्वत्सरे गते॥२१॥
शाक्यसिंह गुरुर्गेयो बहु माया प्रवर्तकः॥३॥
स नाम्ना गौतमाचार्यो दैत्य पक्षविवर्धकः। सर्वतीर्थेषु तेनैव यन्त्राणि स्थापितानि वै॥ ३१॥
धन्वन्तरिः प्रयागे च गत्वा तद्यन्त्रमुत्तमम्। विलोमं कृतवांस्तत्र तदधो ये गता नराः॥७०॥
   (ङ) अन्तिम धन्वन्तरि को विक्रमादित्य (८२ ई.पू.-१९ ई तक) के नवरत्नों में कहा गया है। विक्रमादित्य काल में भी शकों से व्यापक युद्ध हुये तथा सभी शास्त्रों का पुनः सम्पादन हुआ। इनका उल्लेख ३०६८ कलि (३४ ई.पू.) में कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण में है-
धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंह शंकु वेतालभट्ट घटखर्पर कालिदासाः॥
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
वर्षः सिन्धुरदर्शनम्बरगुणैः (३०६८) र्याते कलौ सम्मिते।
मासे माधव संज्ञिते च विदितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः॥ (ज्योतिर्विदाभरण, कालिदास)

Tuesday, October 10, 2017

गणित ज्योतिषशास्त्र मे वायु शब्द से 49 का ग्रहण करते है

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  शास्त्रों मे 49 प्रकार के वायु के  नाम पठित किए गए है ।
  : ४९ उनचास वायु देवता :
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१ सत्त्वज्योति, २ आदित्य, ३ सत्यज्योति, ४ तिर्यक् ज्योति,

५ सज्योति, ६ ज्योतिष्मान्, ७ हरित, ८ ऋतजित, ९ सत्यजित, १० सुषेणा,

११ सेनजित, १२ सत्यमित, १३ अभिमित्र, १४ हरिमित्र, १५ कृत, १६ सत्य,

१७ ध्रुव, १८ धर्ता, १९ विधर्ता, २० विधाराय, २१ ध्वन्ति, २२ धुनि, २३ उग्र, २४ भीम,

२५ अभियु, २६ साक्षिप, २७ ईदृक, २८ अन्यादृक, २९ यादृक, ३० प्रतिकृत, ३१ ऋक्,

३२ समिति, ३३ संरम्भ, ३४ ईदृक्ष, ३५ पुरुष, ३६ अन्यादृक्ष, ३७ चेतस, ३८ समिता,

३९ सर्मिदृक्ष, ४० प्रतिदृक्ष, ४१ मारुती, ४२ सरत, ४३ देव, ४४ दिश, ४५ यजुः,

४६ अनुद्रुक, ४७ साम, ४८ मानुष,४९ विश्

Thursday, September 28, 2017

यदि ध्यान से जीवन में शांति हो जाती है, तो फिर ध्यान सारे देश में फैल क्यों नहीं जाता है ?

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*💫यदि ध्यान से जीवन में शांति हो जाती है, तो फिर ध्यान सारे देश में फैल क्यों नहीं जाता है ?*

पहली बात तो यह कि बहुत कम लोग हैं पृथ्वी पर जो शांत होना चाहते हैं। शांत होना बहुत कठिन है। असल में शांति की आकांक्षा को उत्पन्न करना ही बहुत कठिन है। और कठिनाई शांति में नहीं है। कठिनाई इस बात में है कि जब तक कोई आदमी ठीक से अशांत न हो जाये तब तक शांति की आकांक्षा पैदा नहीं होती। पूरी तरह अशांत हुए बिना कोई शांत होने की यात्रा पर नहीं निकलता है। और हम पूरी तरह अशांत नहीं हैं। यदि हम पूरी तरह अशांत हो जायें तो हमें शांत होना ही पड़े। लेकिन हम इतने अधूरे जीते हैं कि शांति तो बहुत दूर,अशांति भी पूरी नहीं हो पाती।

हमारी बीमारी भी इतनी कम है कि हम चिकित्सा की तलाश में भी नहीं निकलते। जब बीमारी बढ़ जाती है तो चिकित्सक की खोज शुरू होती है। लेकिन हम बचपन से ही इस भांति पाले जाते हैं कि हम कुछ भी पूरी तरह नहीं कर पाते। न तो हम क्रोध पूरी तरह कर पाते हैं कि अशांत हो जायें। न ही चिंता पूरी तरह कर पाते हैं कि मन व्यथित हो जाये। न हम द्वेष पूरी तरह कर पाते हैं, न घृणा पूरी तरह कर पाते हैं कि मन में आग लग जाये और नर्क पैदा हो जाये। हम इतने कुनकुने जीते हैं कि कभी आग जल ही नहीं पाती और इसलिए पानी खोजने भी हम नहीं निकलते जो उसे बुझा दे। हमारा कुनकुना जीना ही,ल्यूक-वार्म-लिविंग ही हमारी कठिनाई है।

जब कोई मुझसे पूछता है कि जब शांत होना इतना आसान है तो बहुत लोग शांत क्यों नहीं हो जाते। तो पहली बात तो यह है कि वे अभी ठीक से अशांत ही नहीं हुए हैं। उन्हें अशांत होना पड़ेगा। शांत तो आदमी क्षण-भर में हो जाता है, अशांत होने के लिए जन्म-जन्म लेने पड़ते हैं, लंबी यात्रा है। यह इतने जन्मों की हमारी जो यात्रा है,यह शांति की यात्रा नहीं है, शांति तो क्षण-भर में घटित हो जाती है। यह इतने जन्मों की यात्रा हमारे अशांत होने की यात्रा है जो हम पूरी तरह अशांत हो जाते हैं। जब अशांति की चरम अवस्था आ जाती है,क्लाइमेक्स आ जाता है, तब हम लौटना शुरू करते हैं।

बुद्ध एक गांव में गये--और जो आज मुझसे आपने पूछा है एक आदमी ने उनसे भी आकर पूछा। और उस आदमी ने उनसे कहा था कि चालीस वर्षों से निरंतर आप गांव-गांव घूमते हैं, कितने लोग शांत हुए, कितने लोग मोक्ष गये, कितने लोगों का निर्वाण हो गया? कुछ गिनती है, कुछ हिसाब है? वह आदमी बड़ा हिसाबी रहा होगा। बुद्ध को उसने मुश्किल में डाल दिया होगा क्योंकि बुद्ध जैसे लोग खाता-बही लेकर नहीं चलते हैं कि हिसाब लगाकर रखें कि कौन शांत हो गया, कौन नहीं शांत हो गया। बुद्ध की कोई दुकान तो नहीं है कि हिसाब रखें।

बुद्ध मुश्किल में पड़ गये होंगे। उस आदमी ने कहा, बताइये, चालीस साल से घूम रहे हैं, क्या फायदा घूमने का? बुद्ध ने कहा, एक काम करो, सांझ आ जाना, तब तक मैं भी हिसाब लगा लूं। और एक छोटा-सा काम है, वह भी तुम कर लाना। फिर मैं तुम्हें उत्तर दे दूंगा। उस आदमी ने कहा बड़ी खुशी से, क्या काम है वह मैं कर लाऊंगा। और सांझ आ जाता हूं हिसाब पक्का रखना, मैं जानना ही चाहता हूं कि कितने लोगों को मोक्ष के दर्शन हुए; कितने लोगों ने परमात्मा पा लिया; कितने लोग आनंद को उपलब्ध हो गये। क्योंकि जब तक मुझे यह पता न लग जाये कि कितने लोग हो गये हैं, तब तक मैं निकल भी नहीं सकता यात्रा पर। क्योंकि पक्का पता तो चल जाये कि किसी को हुआ भी है या नहीं हुआ।

बुद्ध ने उससे कहा, कि यह कागज ले जाओ और गांव में एक-एक आदमी से पूछ आओ, उसकी जिंदगी की आकांक्षा क्या है, वह चाहता क्या है? वह आदमी गया। उसने गांव में--एक छोटा सा गांव था, सौ पचास लोगों की छोटी-सी झोपड़ियां थीं, उसने एक-एक घर में जाकर पूछा। किसी ने कहा कि धन की बहुत जरूरत है, और किसी ने कहा कि बेटा नहीं है, बेटा चाहिए। और किसी ने कहा--और सब तो ठीक है लेकिन पत्नी नहीं है, पत्नी चाहिए। किसी ने कहा--और सब ठीक है, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है, बीमारी पकड़े रहती है, इलाज चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए। कोई बूढ़ा था, उसने कहा कि उम्र चुकने के करीब आ गयी, अगर थोड़ी उम्र मिल जाये और तो बस, और सब ठीक है। सारे गांव में घूमकर सांझ को जब वह लौटने लगा तो रास्ते में डरने लगा कि बुद्ध से क्या कहूंगा जाकर। क्योंकि उसे खयाल आ गया कि शायद बुद्ध ने उसके प्रश्न का उत्तर ही दिया है। गांव-भर में एक आदमी नहीं मिला जिसने कहा, शांति चाहिए;जिसने कहा, परमात्मा चाहिए; जिसने कहा आनंद चाहिए। बुद्ध के सामने खड़ा हो गया। सुबह बुद्ध मुश्किल में पड़ गये कि सांझ वह आदमी मुश्किल में पड़ गया।

बुद्ध ने कहा, ले आये हो? उसने कहा, ले तो आया हूं। बुद्ध ने कहा,कितने लोग शांति चाहते हैं? उस आदमी ने कहा, एक भी नहीं मिला गांव में। बुद्ध ने कहा, तू चाहता है शांति? तो रुक जा। उसने कहा,लेकिन अभी तो मैं जवान हूं, अभी शांति लेकर क्या करूंगा? जब उम्र थोड़ी ढल जाये तो मैं आऊंगा आपके चरणों में, अभी तो वक्त नहीं है,अभी तो जीने का समय है। तो बुद्ध ने कहा, फिर पूछता है वही सवाल? कि कितने लोग शांत हो गये? उसने कहा, अब नहीं पूछता हूं।

*कोई किसी को शांत नहीं कर सकता, लेकिन हम शांत हो सकते हैं। पर अशांत हो गये हों तभी।*

जीवन ही है प्रभु (साधना शिविर)
ओशो

Thursday, September 21, 2017

कूबा कुम्हार की कथा

कूबा जी परम भगवद्भक्‍त थे। ये अपनी पत्‍नी ‘पुरी’ के साथ महीने भर में मि‍ट्टी के तीस बर्तन बना लेते और उन्‍हीं को बेचकर पति-पत्‍नी जीवन निर्वाह करते थे। धन का लोभ था नहीं, भगवान के भजन में अधिक-से-अधिक समय लगना चाहिये, इस विचार से कूबा जी अधिक बर्तन नहीं बनाते थे। घर पर आये हुए अतिथियों की सेवा और भगवान का भजन, बस इन्‍हीं दो कामों में उनकी रुचि थी।

अभय सरन हरि के चरन की जिन लई सम्‍हाल।
तिनतें हारयौ सहज ही अति कराल हू काल।।

परिचय

राजपूताने के किसी गाँव में कूबा नाम के कुम्‍हार जाति के एक भगवद्भक्‍त रहते थे। ये अपनी पत्‍नी ‘पुरी’ के साथ महीने भर में मि‍ट्टी के तीस बर्तन बना लेते और उन्‍हीं को बेचकर पति-पत्‍नी जीवन निर्वाह करते थे। धन का लोभ था नहीं, भगवान के भजन में अधिक-से-अधिक समय लगना चाहिये, इस विचार से कूबा जी अधिक बर्तन नहीं बनाते थे। घर पर आये हुए अतिथियों की सेवा और भगवान का भजन, बस इन्‍हीं दो कामों में उनकी रुचि थी।[1]

धन की गतियाँ

धन का सदुपयोग तो कोई बिरले पुण्‍यात्‍मा ही कर पाते हैं। धन की तीन गतियाँ हैं- दान, भोग और नाश। जो न दान करता है और न सुख-भोग में धन लगाता, उसका धन नष्‍ट हो जाता है। चोर-लुटेरे न भी ले जायँ, मुकदमे या रोगियों की चिकित्‍सा में न भी नष्‍ट हो, तो भी कंजूस का धन उसकी सन्‍तान को बुरे मार्ग में ले जाता है और वे उसे नष्‍ट कर डालते हैं। भोग में धन लुटाने से पाप का संचय होता है। अत: धन का एक ही सदुपयोग है- दान। घर आये अतिथि का सत्‍कार।

चमत्कारिक घटनाएँ

एक बार कूबा जी के ग्राम में दो सौ साधु पधारे। साधु भूखे थे। गाँव में सेठ-साहूकार थे, किंतु किसी ने साधुओं का सत्‍कार नहीं किया। सब ने कूबाजी का नाम बता दिया। साधु कूबा जी के घर पहुँचे। घर पर साधुओं की इतनी बड़ी मण्‍डली देखकर कूबा जी को बड़ा आनन्‍द हुआ। उन्‍होंने नम्रतापूर्वक सबको दण्‍डवत प्रणाम किया। बैठने को आसन दिया। परंतु इतने साधुओं को भोजन कैसे दिया जाय? घर में तो एक छटाँक अन्‍न नहीं था। एक महाजन के पास कूबा जी उधार माँगने गये। महाजन इनकी निर्धनता जानता था और यह भी जानता था कि ये टेक के सच्‍चे हैं। उसने यह कहा- "मुझे एक कुआँ खुदवाना है। तुम यदि दूसरे मजदूरों की सहायता के बिना ही कुआँ खोद देने का वचन दो तो मैं पूरी सामग्री देता हूँ।" कूबा जी ने शर्त स्‍वीकार कर ली। महाजन से आटा, दाल, घी आदि ले आये। साधु-मण्‍डली ने भोजन किया और कूबा जी को आशीर्वाद देकर विदा हो गये।

साधुओं के जाते ही कूबा जी अपने वचन के अनुसार महाजन के बताये स्‍थान पर कुआँ खोदने में लग गये। वे कुआँ खोदते और उनकी पतिव्रता स्‍त्री पूरी मिट्टी फेंकती। दोनों ही बराबर हरिनाम-कीर्तन किया करते। बहुत दिनों तक इसी प्रकार लगे रहने से कुएँ में जल निकल आया। परंतु नीचे बालू थी। ऊपर की मिट्टी को सहारा नहीं था। कुआँ बैठ गया। ‘पुरी’ मिट्टी फेंकने दूर चली गयी थी। कूबा जी नीचे कुएँ में थे। वे भीतर ही रह गये। बेचारी पुरी हाहाकार करने लगी।

गाँव के लोग समाचार पाकर एकत्र हो गये। सब ने यह सोचा कि मिट्टी एक दिन में तो निकल नहीं सकती। कूबा जी यदि दबकर न भी मरे होंगे तो श्‍वास रुकने से मर जायँगे। पुरी को वे समझा-बुझाकर घर लौटा लाये। कुछ लोगों ने दयावश उसके पास खाने-पीने का सामान भी पहुँचा दिया। बेचारी स्‍त्री कोई उपाय न देखकर लाचार घर चली आयी। गाँव के लोग इस दुर्घटना को कुछ दिनों में भूल गये। वर्षा होने पर कुएँ के स्‍थान पर जो थोड़ा गड्ढा था, वह भी मिट्टी भरने से बराबर हो गया।

एक बार कुछ यात्री उधर से जा रहे थे। रात्रि में उन्‍होंने उस कुएँ वाले स्‍थान पर ही डेरा डाला। उन्‍हें भूमि के भीतर से करताल, मृदंग आदि के साथ कीर्तन की ध्‍वनि सुनायी पड़ी। उनको बड़ा आश्‍चर्य हुआ। रातभर वे उस ध्‍वनि को सुनते रहे। सबेरा होने पर उन्‍होंने गाँव वालों को रात की घटना बतायी। अब जो जाता, जमीन में कान लगाने पर उसी को वह शब्‍द सुनायी पड़ता। वहाँ दूर-दूर से लोग आने लगे। समाचार पाकर स्‍वयं राजा अपने मंत्रियों के साथ आये। भजन की ध्‍वनि सुनकर और गाँव वालों से पूरा इतिहास जानकर उन्‍होंने धीरे-धीरे मिट्टी हटवाना प्रारम्‍भ किया। बहुत-से लोग लग गये, कुछ घंटों में कुआँ साफ हो गया। लोगों ने देखा कि नीचे निर्मल जल की धारा बह रही है। एक ओर आसन पर शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान विराजमान हैं और उनके सम्‍मुख हाथ में करताल लिये कूबा जी कीर्तन करते, नेत्रों से अश्रुधारा बहाते तन-मन की सुधि भूले नाच रहे हैं। राजा ने यह दिव्‍य दृश्‍य देखकर अपना जीवन कृतार्थ माना।

अचानक वह भगवान की मूर्ति अदृश्‍य हो गयी। राजा ने कूबा जी को कुएँ से बाहर निकलवाया। सब ने उन महाभागवत की चर-धूलि मस्‍तक पर चढ़ायी। कूबा जी घर आये। पत्‍नी ने अपने भगवद्भक्‍त पति को पाकर परमानन्‍द लाभ किया। दूर-दूर से अब लोग कूबा जी के दर्शन करने और उनके उपदेश से लाभ उठाने आने लगे। राजा नियमपूर्वक प्रतिदिन उनके दर्शनार्थ आते थे।

एक बार अकाल के समय कूबा जी की कृपा से लोगों को बहुत-सा अन्‍न प्राप्‍त हुआ था। उनके सत्‍संग से अनेक स्‍त्री-पुरुष भगवान के भजन में लगकर संसार-सागर से पार हो गये।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

↑ 1.0 1.1 पुस्तक- भक्त चरितांक | प्रकाशक- गीता प्रेस, गोरखपुर | विक्रमी संवत- 2071 (वर्ष-2014) |पृष्ठ संख्या- 681