Tuesday, January 21, 2020

शिक्षक के गुण

कोई राष्ट्र समृद्ध और समुन्नत तभी हो सकता है जब उस राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति समृद्ध हो।
राष्ट्र सभ्य और आदर्श तभी हो सकता है जब राष्ट्र का प्रत्येक नागरीक सभ्य और आदर्श हो।
राष्ट्र को सभ्य और सुसंस्कृत राष्ट्र के नागरीक बनाते हैं। और राष्ट्र के नागरीकों को सभ्य और सुसंकृत अध्यापक बनाते हैं।
आज हमारे देश के अध्यापक अपना आदर्श भूल गये हैं। जिसके कारण राष्ट्र मे असंतोष दुख भ्रष्टाचार, और हींसा व्याप्त हो गया है। 
आज पुनः अध्यापको कों अपने आदर्शों को अपनाने की आवश्यकता है।
यदि अध्यापको मे अध्यापक का गुण आ जाय तो देश पुनः अपने गौरव को प्राप्त करेगा। देश समुन्नत और समृद्ध होगा।

शिक्षक के गुण
 आचार्य के लिए अधोलिखित निम्न गुणों को अनिवार्य माना गया है-

अहिंसा सुनृता वाणी सत्यं शौचं दया क्षमा
कुलं शीलं दया दानं धर्मः सत्यं कृतज्ञता।
अद्रोह इति येष्वेतदाचार्योस्तान्प्रचक्षते॥
- कामन्दकीय नीतिसार 
अर्थात् हिंसा न करना, सत्य और प्रिय वाणी का प्रयोग करना, प्रत्येक कार्य में सत्यता, मन और कर्म से पवित्राता, दयावान, क्षमाशील, श्रेष्ठ शीलवान, दानशील, धर्मात्मा, कृतज्ञता, अद्रोह यह नैतिक गुण जिसमें विद्यमान हों, वे सभी आचार्य हैं। 

-डॉ मुकेश ओझा
*ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार*

Wednesday, January 15, 2020

श्रेष्ठ पुजन विधि

मानस पूजा :- 

१ ॐ लं    पृथ्व्यात्मकं  गन्धं परिकल्पयामी । 
प्रभु मै   पृथ्वी रूप गंध चन्दन आपको अर्पित करता हूँ । 
२- ॐ हम आकाशात्मकं  पुष्पम परिकल्पयामी  । 
प्रभु  आकाश रूप समस्त पुष्प आपको अर्पितकर्ता हूँ । 

३- ॐ यम वायवातंकम  धूपम  परिकल्पयामी । 
पर्भु मै  वायु रूप में धुप आपको अर्पित करता हूँ । 

४- ॐ रम वह्यतमकम   दर्शयामि । 

प्रभु अग्निदेव के रूप दीपक आपको प्रदान करता हूँ । 

५- ॐ वम अमृतात्मकम  नैवेद्यम निवेदयामि । 

प्रभु  मै  अमृत  के सामान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ  । 

६- ॐ सोम  सर्वात्मकं सर्वोपचारम  समर्पयामि  ।  

प्रभु  सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारो को आपके चरणो में समर्पित करताहूँ  । 

इस प्रकार उपरोक्त मंत्रो से परमात्मा की  मानस पूजा करें। 

Tuesday, January 7, 2020

नागरिक प्रतिज्ञा पत्र

मैं, विद्यावारिधी मुकेश कुमार ओझा , ईश्वर की शपथ लेता हूं / सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा, मैं... देश के सच्चे नागरीक के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंत:करण से निर्वहन करूंगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार कार्य करूंगा. ’  

  ‘मैं,  ...... ...., ईश्वर की शपथ लेता हूं / सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूं कि देश के सच्चे नागरीक के रूप में
अपने देश की लोकतांत्रिक परंपराओं की मर्यादा को बनाए रखेंगे और स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण रखने मे हर संभव प्रयास करूंगा, देश की गरिमा को अक्षुण रखते हुए, निर्भीक होकर, धर्म, वर्ग, जाति, समुदाय, भाषा अथवा अन्य किसी भी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना भारतीयता का परीचय देते हूये किसी भी जीव जन्तु, वनस्पति, या मानव का अहित नही करूंगा। देश के सच्चे नागरीक के रूप मे कार्य करूंगा।

Saturday, January 4, 2020

अर्द्धनारीश्वर -जीवन का सत्य

जो लोग भी जीवन के परम रहस्य को जानना चाहते हैं, उन्हें शिव के व्यक्तित्व को ठीक से समझना ही पड़ेगा।
🌱🌱🌱
शिवलिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतिमा पृथ्वी पर कभी नहीं खोजी गई। उसमें आपकी आत्मा का पूरा आकार छिपा है। और आपकी आत्मा की ऊर्जा एक वर्तुल में घूम सकती है, यह रहस्य भी छिपा है।
शिवलिंग इस बात को बताता है कि जिस दिन आपकी ऊर्जा आपके ही भीतर घूमती है और आप में ही लीन हो जाती है, उस दिन शक्ति भी नहीं खोती और आनंद भी उपलब्ध होता है। और फिर जितनी ज्यादा शक्ति संगृहीत होती जाती है, उतना ही आनंद बढ़ता जाता है।हमने शंकर की प्रतिमा को, शिव की प्रतिमा को अर्धनारीश्वर बनाया है। शंकर की आधी प्रतिमा पुरुष की और आधी स्त्री की- यह अनूठी घटना है। जो लोग भी जीवन के परम रहस्य में जाना चाहते हैं, उन्हें शिव के व्यक्तित्व को ठीक से समझना ही पड़ेगा। और देवताओं को हमने देवता कहा है, शिव को महादेव कहा है। उनसे ऊंचाई पर हमने किसी को रखा नहीं। उसके कुछ कारण हैं। उनकी कल्पना में हमने सारा जीवन का सार और कुंजियां छिपा दी हैं।अर्धनारीश्वर का अर्थ यह हुआ कि जिस दिन परम घटना शुरू होता है, आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी और आपका ही आधा व्यक्तित्व आपका पति हो जाता है। आपकी ही आधी ऊर्जा स्त्रैण और आधी पुरुष हो जाती है। और इन दोनों के भीतर जो रस और जो लीनता पैदा होती है, फिर शक्ति का कहीं कोई विसर्जन नहीं होता।अगर आप बायोलॉजिस्ट से पूछें आज, वे कहते हैं- हर व्यक्ति दोनों है, बाई-सेक्सुअल है। वह आधा पुरुष है, आधा स्त्री है। होना भी चाहिए, क्योंकि आप पैदा एक स्त्री और एक पुरुष के मिलन से हुए हैं। तो आधा पुरूष और आधा स्त्री होना ही चाहिए।
अगर आप सिर्फ मां से पैदा हुए होते, तो स्त्री होते। सिर्फ पिता से पैदा हुए होते, तो पुरुष होते। लेकिन आप में पचास प्रतिशत आपके पिता और पचास प्रतिशत आपकी मां मौजूद है। आप न तो पुरुष हो सकते हैं, न स्त्री हो सकते हैं- आप अर्धनारीश्वर हैं।बायोलॉजी ने तो अब खोजा है, लेकिन हमने अर्धनारीश्वर की प्रतिमा में आज से पचास हजार साल पहले इस धारणा को स्थापित कर दिया। यह हमने खोजी योगी के अनुभव के आधार पर।क्योंकि जब योगी अपने भीतर लीन होता है, तब वह पाता है कि मैं दोनों हूं।और मुझमें दोनों मिल रहे हैं। मेरा पुरुष मेरी प्रकृति में लीन हो रहा है; मेरी प्रकृति मेरे पुरुष से मिल रही है। और उनका आलिंगन अबाध चल रहा है; एक वर्तुल पूरा हो गया है। मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं, कि आप आधे पुरुष हैं और आधे स्त्री। आपका चेतन पुरुष है, आपका अचेतन स्त्री है। और अगर आपका चेतन स्त्री का है, तो आपका अचेतन पुरुष है। उन दोनों में एक मिलन चल रहा है।
- डाॅ. मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Tuesday, December 31, 2019

उत्सव कैसे मनाएँ

उत्सव प्रतिपल होना चाहिये यदि आप वर्ष में कुछ दिन ही उत्सव मनाते हैं अर्थात अन्य दिनों में आप बेहोश होते है। उत्सव का अर्थ है पूर्ण होश में रहना।
और पूर्ण होश में रहने का एक मात्र उपाय है - ध्यान।
और मैं कहता हूँ उत्सव ध्यान में घटित होने वाली घटना है। आप अपने बेहोशी को उत्सव मत समझ लेना।उत्सव में सत्य प्रकट होता है। प्रेम अंकुरित होता है। करुणा का प्रस्फुरण होता है। आप जहाँ हैं यदि वही उसी अवस्था में ध्यान घटित हो गया तो आप उत्सव मनाया सकते है। अन्यथा आप सृष्टि में कहीं भी जाएँगे उत्सव के स्थान पर दुःख और खेद ही प्राप्त होगा।
👉यदि आप नये वर्ष का उत्सव मना रहे हैं तो सावधान! ध्यान को साध कर रखिए कही आपके नकली उत्सव में आपका होश न खो जाय।
- डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार
  ।। मनुर्भव ।।

ईसा मसीह का भारत आगमन - ओशो

ओशो का वह प्रवचन, जि‍सपर ति‍लमि‍ला उठी थी अमेरि‍की सरकार और दे दि‍या जहर 
Nothing you will get to read here , just one more religious hypocrisy, and if you read with balanced heart and mind , you may find the religion is stand also upon wavy Ocean like human lives . those did in excellence for community (its for entire human not limited ) their vision was broad not restricted . and in their whole life is just great struggle .. after them whatever religion take place in the name of those souls.. is fully selfish , centralized and Money Oriented . Apart of these quality application-forces have another qualification to apply forcefully their practices on common minds , that is type of mental and physical treatments most cos of religious conflicts and wars plus living is " Under Fear " .... so just read wisely ..

so just read wisely ..and explore Ocean of reality  by own . 

ओशो का अपना अध्ययन  गहरा था , अनेक पुस्तको  के मंथन और स्वयं अपने  बौद्धिक मापदंड के आधार पर  उन्होंने समस्त शास्त्रो की विवेचना की , जो अनेको को  समझ आया (अपने अपने बौद्धिक मापदंड  के आधार पे  ग्राह्य भी हुए  जो कभी सही और कभी गलत समझे गए ) ओशो बिना किसी तथ्य या प्रमाण कि बात नहीं करते | ये ऊपर दिया गया पोस्ट तो मात्र निचोड़ हैं उस प्रवचन का ....जब आप इसको पूरा पढेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि ओशो ने लेखको का भी रेफरेंस दिया हैं | उसमे उन्होंने " ’दि सर्पेंट ऑफ पैराडाइंज’’ पुस्तक का भी जिक्र किया हैं , बौद्ध शास्त्रों का रेफरेंस दिया हैं , निकोलस नाटोविच नामक लेखक का जिक्र किया हैं , फ़्रांसिसी इतिहासकार बर्नियर जो कि औरंगजेब के शासन काल में भारत आया था , ओशो ने उसका भी रेफरेंस दिया हैं मित्र  और सबसे बड़ी बात आप स्वयं भी वहा जाके देख सकते हैं क्योकि इस्लाम में कब्रों कि एक दिशा निर्धारित हैं और यह कब्र इस्लाम कि कसौटी पर खरा नहीं उतरती , कब्र पर यहूदी भाषा में ईसा का नाम भी अंकित हैं ..जब आप स्वयं जायेंगे और देखेंगे तो आपको किसी अन्य के रेफरेंस कि जरुरत नहीं पड़ेगी ..आप खुद एक रेफरेंस हो जायेंगे  वैसे ओशो ने ये बात करीब 30 - 35 साल पहले कही थी ...अब तो बहुत से शोधकर्ताओ ने प्रूफ दे दिया हैं कि श्रीनगर में ही ईसा कि कब्र हैं |

वैसे  अंततोगत्वा स्वयं के शोध  और स्वयं के आत्ममंथन से  मिला अमृत  अतुलनीय है।  तो पढ़े और स्वयं विचार करें।   

ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर में बेडि़यां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थेलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां बसे रजनीशपुरम को तबाह कर दिया गया था और पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि न तो ओशो को कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को ही लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी। ओशो से प्रवचनों की वह श्रृंखला आज भी मार्केट से गायब हैं। पढिए वह चौंकाने वाला सच
ओशो:
जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे। ईसामसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइाबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं।
यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है।
पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बारा-बार कहते हैं- ' अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।' यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।
ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था।
जीसस कहते हैं कि अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था। कौन हैं ये पुराने पैगंबर? वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं। पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं। और ईसा मसीह कहते हैं, मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है। यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं !
सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।
यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी। पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।
तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।
जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए। कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, जोशुआ- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। जीसस जोशुआ का ग्रीक रुपांतरण है। जोशुआ यहां आए- समय, तारीख वगैरह सब दी है। एक महान सदगुरू, जो स्‍वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्‍यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे। इसी वजह से वह स्‍थान भेड़ों के चरवाहे का गांव कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-पहलगाम, उसका काश्‍मीरी में वही अर्थ है- गड़रिए का गांव
जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्‍य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्‍यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्‍होंने मरना भी यहीं चाहा, क्‍योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्‍यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्‍यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्‍तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।
यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्‍यागी थी | इससे भी अधिक आश्‍चर्यजनक तथ्‍य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्‍यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्‍थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्‍थान स्‍वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्‍यों कश्‍मीर में आकर मृत्‍यु में प्रवेश किया?
मूसा ईश्‍वर के देश इजराइल की खोज में यहूदियों को इजिप्‍त के बाहर ले गए थे। उन्‍हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्‍होंने घोषणा की कि, यही वह जमीन है, परमात्‍मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्‍हालो!
मूसा ने जब इजिप्‍त से यात्रा प्रारंभ की थी तब की पीढ़ी लगभग समाप्‍त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्‍चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्‍होंने युवा लोगों शासन और व्‍यवस्‍था का कार्यभारा सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए। यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्‍त्रों में भी, उनकी मृत्‍यु के संबंध में , उनका क्‍या हुआ इस बारे में कोई उल्‍लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्‍मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।
मूसा भारत क्‍यों आना चाहते थे ? केवल मृत्‍यु के लिए ? हां, कई रहस्‍यों में से एक रहस्‍य यह भी है कि यदि तुम्‍हारी मृत्‍यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्‍ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु भी एक उत्‍सव और निर्वाण बन जाती है।
सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।


वैसे इस विषय पर सबसे पहला शोध प्रबंधात्मक पुस्तक कर्नल नोटोविच ने लिखा था (आधुनिक विश्व हेतु) अथक परिश्रम के बाद। सम्पूर्ण विश्व को इसके बारे में उन्होंने बताया। बाद में अनेक व्यक्तियों ने इस पर पुस्तके लिखी होल्जर कर्स्टन परमहंस योगानंद जी मुस्लिम पंथ के कुछ मुस्लिम विद्वानों ने भी पुस्तके लिखी है परन्तु उनकी विश्लेषणात्मक धारा से मैं सहमत नहीं हूँ । 

बाइबिल की या कहे कि Jesus: The Christ की मूल शिक्षाएं क्या हैं तो निम्न पुस्तकों का अध्ययन अवश्य करे , और मुझे लगता है की इसकी प्रमाणिकता पर भी किसी को संदेह नहीं होगा। 
जीसस और भारतीय शास्त्रों की शिक्षाओ में कितना अद्भुत ऐक्य है यह इससे परिलक्षित होता है।

1. The Second Coming of Christ,vol 1 & 2 : Sri Paramahansa Yogananda ji.

2. The Yoga of Jesus: Sri Paramahansa Yogananda ji.

3. The Holy Science : Sri Yukteshvar Giri ji (Spiritual Guru of Sri Paramahansa Yogananda ji)

4. The God Talks to Arjuna: Commentary on Sri Bhagavadgita : Sri Paramahansa Yogananda ji,Vol. 1 & 2. 

5. Jesus Lived in India : Holger Kersten

और भी अन्य पुस्तके है जिनका अध्ययन इस सन्दर्भ में किया जा सकता है।
काफी शोध के बाद इसे भारत सरकार के फिल्म डिवीज़न के सहयोग से बनाया गया हैं ...सभी रेफरेंस आपको इसमें मिल जायेंगे

ज्योतिष ग्रन्थ और लेखक

गणित तथा ज्योतिष

• वेदांग ज्योतिष -- लगध
• बौधायन शुल्बसूत्र -- बौधायन
• मानव शुल्बसूत्र -- मानव
• आपस्तम्ब शुल्बसूत्र -- आपस्तम्ब
• सूर्यप्रज्ञप्ति --
• चन्द्रप्रज्ञप्ति --
• स्थानांग सूत्र --
• भगवती सूत्र --
• अनुयोगद्वार सूत्र
• बख्शाली पाण्डुलिपि
• छन्दशास्त्र -- पिंगल
• लोकविभाग -- सर्वनन्दी
• आर्यभटीय -- आर्यभट प्रथम
• आर्यभट्ट सिद्धांत -- आर्यभट प्रथम
• दशगीतिका -- आर्यभट प्रथम
• पंचसिद्धान्तिका -- वाराहमिहिर
• महाभास्करीय -- भास्कर प्रथम
• आर्यभटीय भाष्य -- भास्कर प्रथम
• लघुभास्करीय -- भास्कर प्रथम
• लघुभास्करीयविवरण -- शंकरनारायण
• यवनजातक -- स्फुजिध्वज
• ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त -- ब्रह्मगुप्त
• करणपद्धति -- पुदुमन सोम्याजिन्
• करणतिलक -- विजय नन्दी
• गणिततिलक -- श्रीपति
• सिद्धान्तशेखर -- श्रीपति
• ध्रुवमानस -- श्रीपति
• महासिद्धान्त -- आर्यभट द्वितीय
• अज्ञात रचना -- जयदेव (गणितज्ञ), उदयदिवाकर की सुन्दरी नामक टीका में इनकी विधि का उल्लेख है।
• पौलिसा सिद्धान्त --
• पितामह सिद्धान्त --
• रोमक सिद्धान्त --
• सिद्धान्त शिरोमणि -- भास्कर द्वितीय
• ग्रहगणित -- भास्कर द्वितीय
• करणकौतूहल -- भास्कर द्वितीय
• बीजपल्लवम् -- कृष्ण दैवज्ञ -- भास्कराचार्य के 'बीजगणित' की टीका
• बुद्धिविलासिनी -- गणेश दैवज्ञ -- भास्कराचार्य के 'लीलावती' की टीका
• गणितसारसंग्रह -- महावीराचार्य
• सारसंग्रह गणितमु (तेलुगु) -- पावुलूरी मल्लन (गणितसारसंग्रह का अनुवाद)
• वासनाभाष्य -- पृथूदक स्वामी -- ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त का भाष्य (८६४ ई)
• पाटीगणित -- श्रीधराचार्य
• पाटीगणितसार या त्रिशतिका -- श्रीधराचार्य
• गणितपञ्चविंशिका -- श्रीधराचार्य
• गणितसार -- श्रीधराचार्य
• नवशतिका -- श्रीधराचार्य
• क्षेत्रसमास -- जयशेखर सूरि (भूगोल/ज्यामिति विषयक जैन ग्रन्थ)
• सद्रत्नमाला -- शंकर वर्मन ; पहले रचित अनेकानेक गणित-ग्रन्थों का सार
• सूर्य सिद्धान्त -- रचनाकार अज्ञात ; वाराहमिहिर ने इस ग्रन्थ का उल्लेख किया है।
• तन्त्रसंग्रह -- नीलकण्ठ सोमयाजिन्
• वशिष्ठ सिद्धान्त --
• वेण्वारोह -- संगमग्राम के माधव
• युक्तिभाषा या 'गणितन्यायसंग्रह' (मलयालम भाषा में) -- ज्येष्ठदेव
• गणितयुक्तिभाषा (संस्कृत में) -- रचनाकार अज्ञात
• युक्तिदीपिका -- शंकर वारियर
• लघुविवृति -- शंकर वारियर
• क्रियाक्रमकरी (लीलावती की टीका) -- शंकर वारियर और नारायण पण्डित ने सम्मिलित रूप से रची है।
• भटदीपिका -- परमेश्वर (गणितज्ञ) -- आर्यभटीय की टीका
• कर्मदीपिका -- परमेश्वर -- महाभास्करीय की टीका
• परमेश्वरी -- परमेश्वर -- लघुभास्करीय की टिका
• विवरण -- परमेश्वर -- सूर्यसिद्धान्त और लीलावती की टीका
• दिग्गणित -- परमेश्वर -- दृक-पद्धति का वर्णन (१४३१ में रचित)
• गोलदीपिका -- परमेश्वर -- गोलीय ज्यामिति एवं खगोल (१४४३ में रचित)
• वाक्यकरण -- परमेश्वर -- अनेकों खगोलीय सारणियों के परिकलन की विधियाँ दी गयी हैं।
• गणितकौमुदी -- नारायण पंडित
• तगिकानि कान्ति -- नीलकान्त
• यंत्रचिंतामणि -- कृपाराम
• मुहर्ततत्व -- कृपाराम
• भारतीय ज्योतिष (मराठी में) -- शंकर बालकृष्ण दीक्षित
• दीर्घवृत्तलक्षण -- सुधाकर द्विवेदी
• गोलीय रेखागणित -- सुधाकर द्विवेदी
• समीकरण मीमांसा -- सुधाकर द्विवेदी
• चलन कलन -- सुधाकर द्विवेदी
• वैदिक गणित -- स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ
• सिद्धान्ततत्वविवेक -- कमलाकर
• रेखागणित -- जगन्नाथ सम्राट
• सिद्धान्तसारकौस्तुभ -- जगन्नाथ सम्राट
• सिद्धान्तसम्राट -- जगन्नाथ सम्राट
• करणकौस्तुभ -- कृष्ण दैवज्ञ छतत

व्याकरण तथा भाषाविज्ञान

• संग्रह -- व्याडि ( दार्शनिक विवेचन का आदि-ग्रन्थ)
• अष्टाध्यायी -- पाणिनि
• महाभाष्य -- पतञ्जलि
• वाक्यपदीय -- भर्तृहरि (लगभग ई. 500, व्याकरणदर्शन का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ)
• त्रिपादी (या, महाभाष्यदीपिका) -- भर्तृहरि (महाभाष्य की टीका)
• काशिकावृत्ति -- जयादित्य तथा वामन (छठी शती)
• वार्तिक -- कात्यायन
• प्रदीप -- कैयट
• सूक्तिरत्नाकर -- शेषनारायण
• भट्टिकाव्य (या, रावणवध) -- भट्टि (सातवीं शती)
• चांद्रव्याकरण -- चंद्रगोमिन्
• कच्चान व्याकरण -- कच्चान (पालि का प्राचीनतम उपलब्ध व्याकरण)
• मुखमत्तदीपनी -- विमलबुद्धि (कच्चान व्याकरण की टीका तथा न्यास, 11वीं सदी)
• काशिकाविवरणपंजिका (या, न्यास) -- जिनेंद्रबुद्धि (लगभग 650 ई., काशिकावृत्ति की टीका)
• शब्दानुशासन -- हेमचन्द्राचार्य
• पदमंजरी -- हरदत्त (ई. 1200, काशिकावृत्ति की टीका)
• सारस्वतप्रक्रिया -- स्वरूपाचार्य अनुभूति
• भागवृत्ति (अनुपलब्ध, काशिका की पद्धति पर लिखित)
• भाषावृत्ति -- पुरुषोत्तमदेव (ग्यारहवीं शताब्दी)
• सिद्धान्तकौमुदी -- भट्टोजि दीक्षित (प्रक्रियाकौमुदी पर आधारित)
• प्रौढमनोरमा -- भट्टोजि दीक्षित (स्वरचित सिद्धान्तकौमुदी की टीका)
• वैयाकरणभूषणकारिका -- भट्टोजि दीक्षित
• शब्दकौस्तुभ -- भट्टोजि दीक्षित (ई. 1600, पाणिनीय सूत्रों की अष्टाध्यायी क्रम से एक अपूर्ण व्याख्या)
• बालमनोरोरमा -- वासुदेव दीक्षित (सिद्धान्तकौमुदी की टीका)
• रूपावतार -- धर्मकीर्ति (ग्यारहवीं शताब्दी)
• मुग्धबोध -- वोपदेव
• प्रक्रियाकौमुदी -- रामचंद्र (ई. 1400)
• मध्यसिद्धान्तकौमुदी -- वरदराज
• लघुसिद्धान्तकौमुदी -- वरदराज
• सारसिद्धान्तकौमुदी -- वरदराज
• प्रक्रियासर्वस्व -- नारायण भट्ट (सोलहवीं शताब्दी)
• प्रसाद -- विट्ठल
• प्रक्रियाप्रकाश -- शेषकृष्ण
• तत्वबोधिनी -- ज्ञानेन्द्र सरस्वती (सिद्धांतकौमुदी की टीका)
• शब्दरत्न -- हरि दीक्षित (प्रौढमनोरमा की टीका)
• मनोरमाकुचमर्दन -- जगन्नाथ पण्डितराज (भट्टोजि दीक्षित के "प्रौढ़मनोरमा" नामक व्याकरण के टीकाग्रंथ का खंडन)
• स्वोपज्ञवृत्ति -- (वाक्यपदीय की टीका)
• वैयाकरणभूषणसार -- कौण्डभट्ट (ई. 1600)
• वैयाकरणसिद्धान्तमंजूषा -- नागेश भट्ट (व्याकरणदर्शनग्रंथ)
• परिभाषेन्दुशेखर -- नागेश भट्ट (इस यशस्वी ग्रंथ पर अनेक टीकाएँ उपलब्ध हैं।)
• लघुशब्देन्दुशेखर -- नागेश भट्ट (सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्या)
• बृहच्छब्देन्दुशेखर -- नागेश भट्ट (सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्या)
• शब्देन्दुशेखर -- नागेश भट्ट
• वैयाकरणसिद्धान्तलघुमंजूषा -- नागेश भट्ट
• वैयाकरणसिद्धान्तपरमलघुमंजूषा -- नागेश भट्ट
• महाभाष्य-प्रत्याख्यान-संग्रह -- नागेश भट्ट
• उद्योत -- नागेश भट्ट (पतंजलिकृत महाभाष्य पर टीकाग्रंथ)
• स्फोटवाद -- नागेश भट्ट
• स्फोटचंद्रिका -- कृष्णभट्टमौनि
• स्फोटसिद्धि -- भरतमिश्र
• परिभाषावृत्ति -- सीरदेव
• परिभाषावृत्ति -- पुरुषोत्तमदेव
• परिभाषाप्रकाश -- विष्णुशेष
• गदा -- परिभाषेंदुशेखर की टीका
• भैरवी -- परिभाषेंदुशेखर की टीका
• भावार्थदीपिका -- परिभाषेंदुशेखर की टीका
• हरिनामामृतव्याकरण -- जीव गोस्वामी
• परिमल -- अमरचन्द

शब्दकोश

• निघण्टु -- यास्क -- वैदिक शब्दकोश
• निरुक्त -- यास्क -- निघण्टु पर शब्दार्थ कोश
• अमरकोश ('नामलिंगानुशासन' या 'त्रिकांड') -- अमरसिंह
• विश्वप्रकाश
• मेदिनी
• नानार्थार्णवसंक्षेप
• वर्णदेशना
• षडर्थनिर्णयकोश -- 'राक्षस' कवि
• षड्मुखकोश
• लघुशब्देंदुशेखर
• बृहतच्छब्देंदुशेखर
• बालमनोरमा
• प्रौढ़मनोरमा
• बृहत अमरकोश -- राजमुकुट कृत अमरकोश टीका
• बृहानंद अमरकोश -- सर्वदानन्द
• बृहत् हारावली -- भानुदीक्षित
• हारवली
• शब्दार्णवसंक्षेप
• कल्पद्रुकोश
• निघण्टु -- यास्क
• निरुक्त -- यास्क
• धातुपाठ -- पाणिनी
• गणपाठ -- पाणिनी
• अमरकोश -- अमरसिंह
• धन्वन्तरिनिघण्टु -- धन्वन्तरि
• अनेकार्थसमुच्चय -- शाश्वत -- इसी को 'शाश्वतकोश' भी कहते हैं
• अभिधानरत्नमाला -- भट्ठ हलायुध (समय लगभग १० वीं० शताब्धी ई०)
• वैजयंती कोश -- यादवप्रकाश (समय १०५५ से १३३७ के मध्य)
• पाइयलच्छी नाममाला --
• देशीनाममाला -- हेमचंद्र -- (प्राकृत—अपभ्रंश—कोश)
• अभिधानचिंतामणि या 'अभिधानचिंतामणिनाममाला' -- हेमचंद्र -- प्रसिद्ध पर्यायवाची कोश
• लिंगानुशासन -- हेमचंद्र
• यशोविजय -- हेमचंद्र -- 'अभिधानचिंतामणि' पर उनकी स्वविरचित टीका
• व्युत्पत्तिरत्नाकर (देवसागकरणि) --हेमचंद्र -- टीकाग्रन्थ
• सारोद्धार' (वल्लभगणि) -- प्रसिद्ध टीका
• अनेकार्थसंग्रह -- हेमचंद्र
• विश्वप्रकाश - महेश्वर (११११ ई०) -- इसे 'विश्वकोश' भी अधिकतः कहा जाता है।
• शब्दभेदप्रकाश -- महेश्वर -- वस्तुतः विश्वप्रकाश का परिशिष्ट है।
• अनेकार्थ -- मंख पंडित (१२ वीं शती ई०)
• नानार्थसंग्रह -- अजयपाल (लगभग १२ वीं—१३ वी शती के बीच)
• नाममाला -- धनंजय (ई० १२ वी० शताब्दी उत्तरार्ध के आसपास अनुमानित)
• हारावली -- पुरुषोत्तमदेव (समय ११५९ ई० के पूर्व)
• त्रिकांडकोश -- पुरुषोत्तमदेव -- यह अमरसिंह के त्रिकाण्डकोश से अलग है।
• वर्णदेशन -- पुरुषोत्तमदेव
• एकाक्षरकोश -- पुरुषोत्तमदेव
• द्विरूपकोश -- पुरुषोत्तमदेव
• वर्णदेशना -- पुरुषोत्तमदेव
• त्रिकांडकोष -- पुरुषोत्तमदेव
• हारावली -- पुरुषोत्तमदेव
• द्विरूपकोश -- श्रीहर्ष (उपरोक्त ग्रन्थ से अलग ग्रन्थ)
• नानार्थार्णव -- केशवस्वामी (समय १२ वीं या १३ वीं शताब्दी)
• नानार्थशब्दकोश -- मेदिनि -- (लगभग १४ वी शताब्दी के आसापास) ; यह 'मेदिनिकोष' नाम से अधिक विख्यात है।
• अपवर्गनाममाला -- जिनभद्र सुरि -- इसको 'पंचवर्गपरिहारनाममाला भी कहते है।
• शब्दरत्नप्रदीप -- कल्याणमल्ल (समय लगभग १२९५ ई०)
• शब्दरत्नाकर -- महीप (लगभग १३७४ ई०)
• भूरिकप्रयोग -- पद्यगदत्त
• शब्दमाला -- रामेश्वर शर्मा
• नानार्थरत्नमाला -- भास्कर अथवा दंडाधिनाथ (१४ वी शताब्दी के विजयनगर के राजा हरिहरगिरि की राजसभा में थे)
• अभिधानतंत्र -- जटाधर
• अनेकार्थ या नानार्थकमंजरी -- नामांगदसिंह का लघु नानार्थकारी है।
• रूपमंजरीनाममाला -- रूपचंद्र (१६वीं शती)
• शारदीय नाममाला -- हर्षकीर्ति
• शब्दरत्नाकर -- वर्मानभट्ट वाण
• नामसंग्रहमाला -- अप्पय दीक्षित
• नामकोश -- सहजकीर्ति (१६२७)
• पंचचत्व प्रकाश -- सहजकीर्ति (१६४४)
• कल्पद्रुमकोश -- केशव -- 'केशवस्वामी' से ये भिन्न हैं।
• नानार्थर्णव -- केशवस्वामी
• शब्दरत्नावली -- मथुरेश (समय १७वी शताब्दी)
• कोशकल्पतरु -- विश्वनाथ
• नानार्थपदपीठिका -- सुजन
• शब्दलिंगार्थचंद्रिका -- सुजन
• पर्यायपदमंजरी --
• शब्दार्थमंजूषा --
• पर्यायरत्नमाला -- महेश्वर (संभवतः पर्यायवाची कोश 'विश्वप्रकाश' के निर्माता महेश्वर से भिन्न हैं।
• पर्यांयशब्दरत्नाकर -- धनंजय भट्टाचार्य
• विश्विमेदिनी -- सारस्वत भिन्न
• विश्वनिघंटु -- विश्वकवि
• लोकप्रकाश -- क्षेमेंद्र
• अनेकार्थमाला -- महीप
• पर्यामुक्तावली -- हरिचरणसेन
• पंचनत्वप्रकाश -- वेणीप्रसाद
• राघव खांड़ेकर -- केशावतंस
• अनेकार्थध्वनिमंजरी -- महाक्षपणक
• आख्यातचीन्द्रिक -- भट्टमल्ल (क्रियाकोश)
• लिंगानुशासन -- हर्ष
• शब्दभेदप्रकाश -- अनिरुद्ध
• शिवकोश (वैद्यक) -- शिवदत्त वैद्य
• गणितार्थ नाममाला --
• नक्षत्रकोश --
• लैकिकन्यायसाहस्री -- भुवनेश (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
• लौकिक न्यायसंग्रह -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
• लौकिक न्याय मुक्तावली -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
• लौकिकन्यायकोश -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
• शब्दकल्पद्रुम -- राधाकान्त देव (१८८६-९४)
• वाचस्पत्यम् --

रसविद्या

• आनन्दकन्द
• भावप्रकाश -- भावमिश्र
• कैयदेवनिघण्टु
• मदनपालनिघण्टु
• रसहृदयतन्त्र -- गोविन्द भगवतपाद
• रसकामधेनु
• रसमञ्जरी -- शालिनाथ
• रसप्रकाशसुधाकर
• रसरत्नसमुच्चय -- वाग्भट
• रसरत्नाकर -- नागार्जुन
• रससंकेतकलिका
• रसाध्याय
• रसार्णव -- गोविन्दाचार्य
• रसेन्द्रचिन्तामणि -- सुधाकर रामचन्द्र
• रसेन्द्रचूड़ामणि -- सोमदेव
• राजनिघण्टु
• सार्ङ्गधरसंहिता -- सार्ङ्गधर
• अष्टांगहृदय -- वाग्भट
• अष्टांगसंग्रह -- वाग्भट
• रसेन्द्रमंगल -- नागार्जुन
• रसकौमुदी --
• रससार --
• रसप्रकाश -- यशोधर

आयुर्वेद
• वृहत्त्रयी :
• चरकसंहिता --- चरक
• सुश्रुतसंहिता --- सुश्रुत
• अष्टांगहृदय --- वाग्भट
• लघुत्रयी :
• माधव निदान --- माधवकर
• शार्ङ्गधर संहिता --- शार्ङ्गधर (१३०० ई)
• भावप्रकाश --- भाव मिश्र
• अन्य:
अष्टांगसंग्रह (४०० ई)
कश्यपसंहिता (इसमें कौमारभृत्य (बालचिकित्सा) की विशेष रूप से चर्चा है।)
वंगसेनसंहिता (या चिकित्सासारसंग्रह)--- वंगसेन
निबन्धसंग्रह -- दल्हण (इसमें दल्हण के पूर्व के अनेक आयुर्वेदाचार्यों के मत संकत्लित हैं )
बोवर पाण्डुलिपि (Bower Manuscript)
________________________________________
:* आरोग्य कल्पद्रुम

• अर्क प्रकाशन
• आर्य भिशक
• अष्टांग हृदय
• अष्टांगसंग्रह
• आयुर्वेद कल्पद्रुम
• आयुर्वेद प्रकाश
• आयुर्वेद संग्रह
• भैषज्य रत्नावली
• भारत भैषज्य रत्नाकर
• भाव प्रकाश
• वृहत निघण्टु रत्नाकर
• चरक संहिता
• चरक दत्त
• गद निग्रह
• कुपि पक्व रसायन
• निघण्टु रत्नाकर
• रस चन्दांशु
• रस रज सुन्दर
• रसरत्न समुच्चय
• रसतन्त्रसार व सिद्धप्रयोगसंग्रह
• रसतरंगिणी
• रस योग रत्नाकर
• रस योग संग्रह
• रस प्रदीपिका
• रसेन्द्र सार संग्रह
• रस प्रदिपिका
• सहस्रयोग
• सर्वरोग चिकित्सा रत्न
• सर्वयोग चिकित्सा रत्न
• शार्ङ्गधर संहिता
• सिद्ध भैषज्यमणिमाला
• सिद्ध योग संग्रह
• सुश्रुत संहिता
• वैद्य चिंतामणि
• वैद्यक शब्द सिन्धु
• वैद्यक चिकित्सा सार
• वैद्य जीवन
• बसव रजीयं
• योग रत्नाकर
• योग तरंगिणी
• योग चिंतामणि
• कश्यप संहिता
• भेल संहिता
• विश्वनाथ चिकित्सा
• वृन्द चिकित्सा
• आयुर्वेद चिंतामणि
• आभिनव चिंतामणि
• आयुर्वेद रत्नाकर
• योगरत्न संग्रह
• रसामृत
• द्रव्यगुण निघण्टु
• रसमञ्जरी
• वंगसेनसंहिता
• आयुर्वेदिक सार संग्रह

काव्यशास्त्र
नाट्यशास्त्र -- भरतमुनि
काव्यप्रकाश -- मम्मट
टीकाएँ:

• अलंकारसर्वस्व -- रुय्यक
• संकेत टीका -- माणिक्यचंद्र सूरि (रचनाकाल ११६० ई.)
• दीपिका -- चंडीदास (१३वीं शती)
• काव्यप्रदीप -- गोविंद ठक्कुर (१४वीं शती का अंतभाग)
• सुधासागर या सुबोधिनी -- भीमसेन दीक्षित (रचनाकाल १७२३ ई.)
• दीपिका -- जयंतभट्ट (र.का. १२९४ ई.)
• काव्यप्रकाशदर्पण -- विश्वनाथ कविराज (१४वीं शती)
• विस्तारिका -- परमानंद चक्रवर्ती (१४वीं शती)
• साहित्यदर्पण – विश्वनाथ
• काव्यादर्श – दण्डी
• काव्यमीमांसा -- कविराज राजशेखर (८८०-९२० ई.)
• दशरूपक – धनिक
• ध्वन्यालोक – आनन्दवर्धन
• लोचन -- अभिनव गुप्तपाद (ध्वन्यालोक की टीका)
• काव्यप्रकाशसंकेत -- माणिक्यचंद्र (११५९ ई)
• अलंकारसर्वस्व -- राजानक रुय्यक
• चंद्रालोक –
• अलंकारशेखर -- केशव मिश्र

संगीत

नाट्यशास्त्र -- भरत मुनि
बृहद्देशीय -- मतंग मुनि
नारदीय शिक्षा –
संगीत मकरंद –
सरस्वती हृदयालंकार -- मिथिला के राजा नान्यदेव (11वीं शती)
अभिलषितार्थ चिंतामणि -- सोमेश्वर (12वीं शती)
संगीतचूड़ामणि -- सोमेश्वर के पुत्र प्रतापचक्रवर्ती या जगदेकमल्ल (12वीं शती)
संगीतसुधाकर -- चालुक्यवंशीय सौराष्ट्रनरेश महाराज हरिपाल (1175 ई.)
संगीतरत्नावली -- सोमराज देव या सोमभूपाल (1180)
गीतगोविन्द -- जयदेव (12वीं शती ई.)
पंडिताराध्यचरितम् -- पाल्कुरिकि सोमनाथ (तेलगु में, 1270 ई.)
संगीतरत्नाकर -- शार्ङ्गदेव (तेरहवीं शती)
शृंगारहार -- शाकंभरि के राजा हम्मीर (लगभग 1300 ई.)
संगीत-समय-सार -- जैन आचार्य पार्श्वदेव (लगभग 1300)
संगीतसार -- विद्यारण्य (चौदहवीं शताब्दी)
रागतरंगिणी -- लोचन कवि (पन्द्रहवीं शताब्दी)
संगीतशिरोमणि -- अनेक पण्डितों का योगदान (मलिक सुलतान के आह्वान पर, पन्द्रहवीं शताब्दी)
रसिकप्रिया -- मेवाड़ के महाराणा कुंभ (गीतगोविन्द की टीका, 1431-1469 ई.)
संगीतराज -- महाराणा कुम्भ
मानकुतूहल -- ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (हिन्दी में, 15वीं शती)
षड्रागचंद्रोदय -- पुण्डरीक विट्ठल (सोलहवीं शताब्दी)
रागमाला -- पुण्डरीक विट्ठल
रागमंजरी -- पुण्डरीक विट्ठल
नर्तननिर्णय -- पुण्डरीक विट्ठल
स्वरमेलकलानिधि -- कर्णाटक संगीत के विद्वान् रामामाला (1550 ई.)
स्वरमेल कलानिधि -- रामामात्य (सोलहवीं शताब्दी)
रागविबोध -- सोमनाथ (1609 ई.)
संगीतसुधा -- तंजोर के राजा रघुनाथ (अपने मंत्री गोविंद दीक्षित की सहायता से 1620 ई. में)
चतुर्दंडीप्रकाशिका -- व्यंकटमखी (सन् 1630 ई.)
संगीतदर्पण -- दामोदर मिश्र (लगभग सन् 1630 ई.)
हृदय प्रकाश -- हृदयनारायण देव (सत्रहवीं शताब्दी)
हृदय कौतुकम् -- हृदयनारायण देव (सत्रहवीं शताब्दी)
संग्रहचूड़ामणि -- गोविंद (1680-1700)
संगीत पारिजात -- अहोबल (१७वीं शती)
संगीत दर्पण -- दामोदर पण्डित
अनूपविलास -- भावभट्ट
अनूपसंगीतरत्नाकार --भावभट्ट
अनुपांकुश --भावभट्ट
संगीतसार -- जयपुर के महाराज प्रतापसिंह (1779-1804 ई.)
अष्टोत्तरशतताललक्षणाम् -- सोमनाथ
रागतत्वविबोध -- श्रीनिवास (18वीं शती)
रागतत्वविबोध: -- श्रीनिवास पण्डित (अठारहवीं शताब्दी)
संगीतसारामृतम् -- तंजोर के मराठा राजा तुलजेन्द्र भोंसले (18वीं शती)
रागलक्षमण् -- तुलजेन्द्र भोंसले
लक्ष्यसंगीतम् -- विष्णु नारायण भातखंडे (संस्कृत ; 1910, १९३४)
अभिनवरागमंजरी -- विष्णु नारायण भातखंडे (संस्कृत ; 1910, १९३४)
हिंदुस्तानी संगीत पद्धति -- विष्णु नारायण भातखंडे (मराठी में)
हिंदुस्तानी संगीत क्रमीक (छह भागों में) -- विष्णु नारायण भातखंडे
संगीत तत्त्वदर्शक -- विष्णु दिगंबर पलुस्कर (20वीं शती)

वास्तुशास्त्र
३५० से भी अधिक ग्रन्थों में स्थापत्य की चर्चा मिलती है। इनमें से प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं-

अपराजितपृच्छा (रचयिता : भुवनदेवाचार्य ; विश्वकर्मा और उनके पुत्र अपराजित के बीच वार्तालाप)
ईशान-गुरुदेवपद्धति
कामिकागम
कर्णागम (इसमें वास्तु पर लगभग ४० अध्याय हैं। इसमें तालमान का बहुत ही वैज्ञानिक एवं पारिभाषिक विवेचन है।)
मनुष्यालयचंद्रिका (कुल ७ अध्याय, २१० से अधिक श्लोक)
प्रासादमण्डन (कुल ८ अध्याय)
राजवल्लभ (कुल १४ अध्याय)
तंत्रसमुच्चय
वास्तुसौख्यम् (कुल ९ अध्याय)
विश्वकर्मा प्रकाश (कुल १३ अध्याय, लगभग १३७४ श्लोक)
विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र (कुल ८४ अध्याय)
सनत्कुमारवास्तुशास्त्र
वास्तुमण्डन
मयशास्त्र (भित्ति सजाना)
बिम्बमान (चित्रकला)
शुक्रनीति (प्रतिमा, मूर्ति या विग्रह निर्माण)
सुप्रभेदगान Suprabhedagana
विष्णुधर्मोत्तर पुराण
आगम (इनमें भी शिल्प की चर्चा है।)
अग्निपुराण
ब्रह्मपुराण (मुख्यतः वास्तुशास्त्र, कुछ अध्याय कला पर भी)
वास्तुविद्या
प्रतिमालक्षणविधानम्
गार्गेयम्
मानसार शिल्पशास्त्र (कुल ७० अध्याय; ५१०० से अधिक श्लोक; कास्टिंग, मोल्डिंग, कार्विंग, पॉलिशिंग, तथा कला एवं हस्तशिल्प निर्माण के अनेकों अध्याय)
अत्रियम्
प्रतिमा मान लक्षणम् (इसमें टूटीई हुई मूर्तियों को सुधारने आदि पर अध्याय है।)
दशतल न्याग्रोध परिमण्डल
शम्भुद्भाषित प्रतिमालक्षण विवरणम्
मयमतम् (मयासुर द्वारा रचित, कुल ३६ अध्याय, ३३०० से अधिक श्लोक)
बृहत्संहिता (अध्याय ५३-६०, ७७, ७९, ८६)
शिल्परत्नम् (इसके पूर्वभाग में 46 अध्याय कला तथा भवन/नगर-निर्माण पर हैं। उत्तरभाग में ३५ अध्याय मूर्तिकला आदि पर हैं।)
युक्तिकल्पतरु (आभूषण-कला सहित विविध कलाएँ)
शिल्पकलादर्शनम्
समरांगण सूत्रधार (रचयिता ; राजा भोज ; कुल ८४ अध्याय, ८००० से अधिक श्लोक)
वास्तुकर्मप्रकाशम्
मत्स्यपुराणम्
गरुणपुराण
कश्यपशिल्प (कुल ८४ अध्याय तथा ३३०० से अधिक श्लोक)
भविष्यपुराण (मुख्यतः वास्तुशिल्प, कुछ अध्याय कला पर भी)
अलंकारशास्त्र
अर्थशास्त्र (खिडकी एवं दरवाजा आदि सामान्य शिल्प, इसके अलावा सार्वजनिक उपयोग की सुविधाएँ)
चित्रकल्प (आभूषण)
चित्रकर्मशास्त्र
मयशिल्पशास्त्र (तमिल में)
विश्वकर्मा शिल्प (स्तम्भों पर कलाकारी, काष्ठकला)
अगत्स्य (काष्ठ आधारित कलाएँ एवं शिल्प)
मण्डन शिल्पशास्त्र (दीपक आदि)
रत्नशास्त्र (मोती, आभूषण आदि)
रत्नपरीक्षा (आभूषण)
रत्नसंग्रह (आभूषण)
लघुरत्नपरीक्षा (आभूषण आदि)
मणिमहात्म्य (lapidary)
अगस्तिमत (lapidary crafts)
अनंगरंग (काम कलाएँ)
कामसूत्र
रतिरहस्य (कामकलाएँ)
कन्दर्पचूणामणि (कामकलाएँ)
नाट्यशास्त्र (फैशन तथा नाट्यकलाएँ)
नृतरत्नावली (फैशन तथा नाट्यकलाएँ)
संगीतरत्नाकर]] ((फैशन, नृत्य तथा नाट्यकलाएँ)
नलपाक (भोजन, पात्र कलाएँ)
पाकदर्पण (भोजन, पात्र कलाएँ)
पाकविज्ञान (भोजन, पात्र कलाएँ)
पाकार्नव (भोजन, पात्र कलाएँ)
कुट्टनीमतम् (वस्त्र कलाएँ)
कादम्बरी (वस्त्र कला तथा शिल्प पर अध्याय हैं)
समयमात्रिका (वस्त्रकलाएँ)
यन्त्रकोश (संगीत के यंत्र Overview in Bengali Language)
संगीतरत्नाकर (संगीत से सम्बन्धित शिल्प)
चिलपटिकारम् (Cilappatikaaram ; दूसरी शताब्दी में रचित तमिल ग्रन्थ जिसमें संगीत यंत्रों पर अध्याय हैं)
मानसोल्लास (संगीत यन्त्रों से सम्बन्धित कला एवं शिल्प, पाकशास्त्र, वस्त्र, सज्जा आदि)
वास्तुविद्या (मूर्तिकला, चित्रकला, तथा शिल्प)
उपवन विनोद (उद्यान, उपवन भवन निर्माण, घर में लगाये जाने वाले पादप आदि से सम्बन्धित शिल्प)
वास्तुसूत्र (संस्कृत में शिल्पशास्त्र का सबसे प्राचीन ग्रन्थ; ६ अध्याय; छबि रचाना; इसमें बताया गया है कि छबि कलाएँ किस प्रकार हाव-भाव एवं आध्यात्मिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के साधन हैं।)

कृषि

• कृषि पराशर (पराशर)
• कृषि संग्रह
• पराशर तंत्र
• वृक्षायुर्वेद (सुरपाल)
• कश्यपीयकृषिसूक्ति (कश्यप)
• विश्ववल्लभ (चक्रपाणि मिश्र)
• उपवनविनोद (सारंगधर)

नीतिशास्त्र

• कामन्दकीय नीतिसार
• शुक्रनीति
• अर्थशास्त्र (चाणक्य)
• नीतिशतक

सुभाषित संग्रह
रचना संग्रहकर्ता काल
सुभाषितरत्नकोश विद्याकर १२वीं शताब्दी
सुभाषितावली कश्मीर के वल्लभदेव प्रायः ५वीं शताब्दी
सदुक्तिकामृत श्रीधरदास १२०५
सूक्तिमुक्तावली जल्हण १३वीं शताब्दी
सार्ङ्गधर पद्धति सार्ङ्गधर १३६३ ई
पद्यावली अज्ञात -
सूक्तिरत्नहार सूर्यकलिंगारय १४वीं शताब्दी
पद्यवेणी वेणीदत्त -
सुभाषितानिवि वेदान्त देशिक १५वीं शताब्दी
पद्यरचना लक्ष्मण भट्ट १७वीं शताब्दी के आरम्भ में
पद्य अमृत तरंगिणी हरिभास्कर १७वीं शताब्दी का उत्तरार्ध
सूक्तिसौन्दर्य सुन्दरदेव १७वीं शताब्दी का उत्तरार्ध
इतिहास

• महावंश
• दीपवंश (द्वीपवंश)
• राजतरंगिणी -- कल्हण
• द्वितीय राजतरंगिणी - जोनराज
• हर्षचरित -- बाणभट
• विक्रमांकदेवचरित -- बिल्हण -- चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठम के  राज्य के बारे में पर्याप्त सूचना
• कुमारपालचरित -- जयसिंह --
• रामचरित -- सन्ध्याकर नन्दी
• पृथ्वीराजचरित चन्द वरदाई

यांत्रिकी
• यन्त्रसर्वस्व -- ऋषि भारद्वाज
• वैमानिकशास्त्र -- ऋषि भारद्वाज
• समरांगणसूत्रधार -- राजा भोज -- इसके 'यंत्रविधान' नामक ३१वें अध्याय में यंत्रों के बारे में बहुत सारी जानकारी दी गयी है। विमान पर भी जानकारी है।
• यन्त्रार्णव --
• वैशेषिक सूत्रों पर प्रशस्तिपाद भाष्य -- प्रशस्तिपाद -- 'वेग संस्कार' न्यूटन के गति के नियमों जैसे हैं।
भारद्वाज मुनि उनसे पूर्व हुए विमान शास्त्र के आचार्य तथा उनके ग्रंथों के बारे में लिखते हैं-
( १ ) नारायण कृत - विमान चन्द्रिका
( २ ) शौनक कृत न् व्योमयान तंत्र
( ३ ) गर्ग - यन्त्रकल्प
( ४ ) वायस्पतिकृत - यान बिन्दु
( ५ ) चाक्रायणीकृत खेटयान प्रदीपिका
( ६ ) धुण्डीनाथ - व्योमयानार्क प्रकाश
• यंत्रराज
• यंत्रशिरोमणि
कामशास्त्र
• कामसूत्र -- वात्स्यायन
इसकी तीन टीकाएँ प्रसिद्ध हैं-
• (1) जयमंगला प्रणेता का नाम यथार्थत: यशोधर है जिन्होंने HQ (1243-61) के राज्यकाल में इसका निर्माण किया।
• (2) कंदर्पचूडामणि बघेलवंशी राजा रामचंद्र के पुत्र वीरसिंहदेव रचित पद्यबद्ध टीका (रचनाकाल सं. 1633; 1577 ई.)।
• (3) कामसूत्रव्याख्या — भास्कर नरसिंह नामक काशीस्थ विद्वान् द्वारा 1788 ई. में निर्मित टीका। इनमें प्रथम दोनों प्रकाशित और प्रसिद्ध हैं, परंतु अंतिम टीका अभी तक अप्रकाशित है।
पश्चाद्वात्स्यायन काल में रचित ग्रन्थ
• (क) नागरसर्वस्व पद्मश्रीज्ञान कृत :- कलामर्मज्ञ ब्राह्मण विद्वान वासुदेव से संप्रेरित होकर बौद्धभिक्षु पद्मश्रीज्ञान इस ग्रन्थ का प्रणयन किया था। यह ग्रन्थ ३१३ श्लोकों एवं ३८ परिच्छेदों में निबद्ध है। यह ग्रन्थ दामोदर गुप्त के "कुट्टनीमत" का निर्देश करता है और "नाटकलक्षणरत्नकोश" एवं "शार्ङ्गधरपद्धति" में स्वयंनिर्दिष्ट है। इसलिए इनका समय १०वीं शताब्दी का अंत में स्वीकृत है।
• (ख) अंनंगरंग कल्याणमल्ल कृत:- मुस्लिम शासक लोदीवंशावतंश अहमदखान के पुत्र लाडखान के कुतूहलार्थ भूपमुनि के रूप में प्रसिद्ध कलाविदग्ध कल्याणमल्ल ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया था। यह ग्रन्थ ४२० श्लोकों एवं १० स्थलरूप अध्यायों में निबद्ध है।
• (ग) रतिरहस्य कोक्कोक कृत :- यह ग्रन्थ कामसूत्र के पश्चात दूसरा ख्यातिलब्ध ग्रन्थ है। परम्परा कोक्कोक को कश्मीरी स्वीकारती है। कामसूत्र के सांप्रयोगिक, कन्यासंप्ररुक्तक, भार्याधिकारिक, पारदारिक एवं औपनिषदिक अधिकरणों के आधार पर पारिभद्र के पौत्र तथा तेजोक के पुत्र कोक्कोक द्वारा रचित यह ग्रन्थ ५५५ श्लोकों एवं १५ परिच्छेदों में निबद्ध है। इनके समय के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि कोक्कोक ७वीं से १०वीं शताब्दी के मध्य हुए थे। यह कृति जनमानस में इतनी प्रसिद्ध हुई सर्वसाधारण कामशास्त्र के पर्याय के रूप में "कोकशास्त्र" नाम प्रख्यात हो गया।
• (घ) पंचसायक कविशेखर ज्योतिरीश्वर कृत  :- मिथिलानरेश हरिसिंहदेव के सभापण्डित कविशेखर ज्योतिरीश्वर ने प्राचीन कामशास्त्रीय ग्रंथों के आधार ग्रहणकर इस ग्रंथ का प्रणयन किया। ३९६ श्लोकों एवं ७ सायकरूप अध्यायों में निबद्ध यह ग्रन्थ आलोचकों में पर्याप्त लोकप्रिय रहा है। आचार्य ज्योतिरीश्वर का समय चतुर्दश शतक के पूर्वार्ध में स्वीकृत है।
• (ड) रतिमंजरी जयदेव कृत  :- अपने लघुकाय रूप में निर्मित यह ग्रंथ आलोचकों में पर्याप्त लोकप्रिय रहा है। रतिमंजरीकार जयदेव, गीतगोविन्दकार जयदेव से पूर्णतः भिन्न हैं। यह ग्रन्थ डॉ॰ संकर्षण त्रिपाठी द्वारा हिन्दी भाष्य सहित चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी से प्रकाशित है।
• (च) स्मरदीपिका मीननाथ कृत  :- २१६ श्लोकों में निबद्ध यह ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित चौखंबा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी से प्रकाशित है।
• (छ) रतिकल्लोलिनी सामराज दीक्षित कृत  :- दाक्षिणात्य बिन्दुपुरन्दरकुलीन ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न एवं बुन्देलखण्डनरेश श्रीमदानन्दराय के सभापण्डित आचार्य सामराज दीक्षित द्वारा १९३ श्लोकों में निबद्ध इस ग्रन्थ का प्रणयन संवत १७३८ अर्थात १६८१ ई० में हुआ था। यह ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित चौखंबा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी से प्रकाशित है।
• (ज) पौरूरवसमनसिजसूत्र राजर्षि पुरुरवा कृत  :-यह ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित चौखंबा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी से प्रकाशित है।
• (झ) कादम्बरस्वीकरणसूत्र राजर्षि पुरुरवा कृत  :-यह ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित चौखंबा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी से प्रकाशित है।
• (ट) शृंगारदीपिका या शृंगाररसप्रबन्धदीपिका हरिहर कृत :- २९४ श्लोकों एवं ४ परिच्छेदों में निबद्ध यह ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित चौखंबा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी से प्रकाशित है।
• (ठ) रतिरत्नदीपिका प्रौढदेवराय कृत :- विजयनगर के महाराजा श्री इम्मादी प्रौढदेवराय (1422-48 ई.) प्रणीत ४७६ श्लोकों एवं ७ अध्यायों में निबद्ध यह ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित चौखंबा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी से प्रकाशित है। श्री इम्मादी प्रौढदेवराय का समय पंचदश शतक के पूर्वार्ध में स्वीकृत है।
• (ड) केलिकुतूहलम् पं० मथुराप्रसाद दीक्षित कृत  :- आधुनिक विद्वान् पं० मथुराप्रसाद दीक्षित द्वारा ९४८ श्लोकों एवं १६ तरंगरूप अध्यायों में निबद्ध यह ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित कृष्णदास अकादमी, वाराणसी से प्रकाशित है।
अन्य
इन बहुश: प्रकाशित ग्रंथों के अतिरिक्त कामशास्त्र की अनेक अप्रकाशित रचनाएँ उपलब्ध हैं -

• तंजोर के राजा शाहजी (1664-1710) की शृंगारमंजरी;
• नित्यानन्दनाथ प्रणीत कामकौतुकम्,
• रतिनाथ चक्रवर्तिन् प्रणीत कामकौमुदी,
• जनार्दनव्यास प्रणीत कामप्रबोध,
• केशव प्रणीत कामप्राभ्ऋत,
• कुम्भकर्णमहीन्द्र (राणा कुम्भा) प्रणीत कामराजरतिसार,
• वरदार्य प्रणीत कामानन्द,
• बुक्क शर्मा प्रणीत कामिनीकलाकोलाहल,
• सबलसिंह प्रणीत कामोल्लास,
• अनंत की कामसमूह,
• माधवसिंहदेव प्रणीत कामोद्दीपनकौमुदी,
• विद्याधर प्रणीत केलिरहस्य,
• कामराज प्रणीत मदनोदयसारसंग्रह,
• दुर्लभकवि प्रणीत मोहनामृत,
• कृष्णदासविप्र प्रणीत योनिमंजरी,
• हरिहरचन्द्रसूनु प्रणीत रतिदर्पण,
• माधवदेवनरेन्द्र प्रणीत रतिसार,
• आचार्य जगद्धर प्रणीत रसिकसर्वस्व

विविध विषय
रचना संग्रहकर्ता विषय
धनुर्वेद - सैन्यविज्ञान
नीतिप्रकाश वैशम्पायन -
अश्वविद्या जयदत्त -
हस्त्रायुर्वेद (हस्ति आयुर्वेद्) पालकण्य हस्तिचिकित्सा
शालिहोत्र संहिता शालिहोत्र
विष्णु धर्महोत्र - -
वैमानिकशास्त्र - वायुयान शास्त्र