Wednesday, December 2, 2020

एकलव्य का अंगूठा कटवाना धनुर्विद्या से वंचित करना या गुरु द्रोण का वरदान? वास्तविकता पढ़िए 👉

एकलव्य का अंगूठा कटवाना धनुर्विद्या से वंचित करना या गुरु द्रोण का वरदान?

वास्तविकता पढ़िए

श्वेत वस्त्र पहने हुए अनाहत तक पहुंचती श्वेत दाढी कंधे पर जनेऊ और मुख पर अदम्य तेज युक्त द्रोण ने अपने श्वान की ओर गंभीर दृष्टि से देखा, "ले चलो जहां ये बाण मिला तुम्हें "

थोडी ही देर पहले वे जब अपने आश्रम में अपने कुछ शिष्यों को युद्धकला के बारे में समझा रहे थे,उनका श्वान अपने मुंह में एक बाण दबाए आ खडा हुआ था। ढाई पल का बाण और फर के स्थान पर रंगबिरंगे पंख, द्रोण के माथे पर लकीरें खिंच गईं।

इसके लिये कम से कम साढे तीन हाथ का धनुष उपयोग होगा' उन्होंने मन मे ही सोचा 'कौन होगा वो? ' उन्होने अश्वत्थामा को साथ चलने का संकेत किया।

उनकी जानकारी में कम ही ऐसे योद्धा थे जो इस भार के धनुष को चला सकते थे हस्तिनापुर के ऐसे सभी योद्धाओं से वे परिचित थे ये बाण उनमें से किसी का नहीं था और गुरूकुल के इस निषिद्ध क्षेत्र में किसी बाहरी योद्धा की उपस्थिति उनके मन मे संदेह उत्पन्न कर रही थी।

दो घडी वन में चलने के पश्चात थोडे से खुले स्थान पर एक वृक्ष के तने पर चिन्ह बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास करता नवयुवक दिखाई दिया उनके अनुभवी नेत्रों ने तुरंत ही पूरे परिसर को ताड लिया वन के बीच नैसर्गिक कम घना करीब स्थान जिसमें आवश्यकतानुसार झाड़ियों को काट कर उत्तर से दक्षिण की और लगभग 200 गज का लंबोतर मैदान बना लिया गया था जिसकी चौडाई 50 हाथ की थी धनुर्विद्या के अभ्यास के लिए उत्तम स्थान, द्रोण के मन में आया। 

पश्चिम की ओर एक समतल शिला पर पूर्व की ओर मुख किये मिट्टी की अनगढ़ प्रतिमा स्थापित थी जिसका पूजन किया गया था, सामने रखी चौकी पर वन में उत्पन्न होने वाले पुष्प और फलादि दिख रहे थे नवयुवक की पीठ थी उनकी ओर, कुछ श्यामल वर्ण, कमर पर वल्कल,पसीने से भीगे ऊपरी शरीर पर कुछ मालाएं,घने, लंबे जटाओं की तरह बिखरे बाल,कसा हुआ शरीर, नग्न पीठ पर दिखाई देती रीढ की हड्डी की मजबूती कठिन परिश्रम का संकेत दे रही थी।

उसी समय नवयुवक ने संधान किया और प्रत्यंचा खींची बिजली की तेजी से पता भी नहीं चला कब बाण प्रत्यंचा तक पहुंचा कोहनी पीछे आई और धनुष पुनः अपने स्थान पर द्रोणाचार्य के अधरों पर एक हल्की सी हंसी की किरण लहरा कर लुप्त हो गई जिसे अश्वत्थामा नहीं देख पाए हस्तिनापुर के राजपरिवार के युद्ध शिक्षा के आचार्य थे वे,गुरू थे युद्धकला के,विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं में से एक।

पत्तों के चरमराने की ध्वनि सुनकर नवयुवक पलटा,गोल चेहरा,लंबी सुतवां नाक,बडे़ बड़े और काले नेत्र,चौड़ा माथा।माथे पर एक मुकुट की तरह एक ओर पक्षियों के रंगीन पंखों और कौड़ियों से सजा मोटा धागा बंधा था जो केशों को चेहरे के सामने आने से रोक भी रहा था अचानक युवक के नेत्र आश्चर्य से फैले हड़बड़ा कर वो समीप आ कर पृथ्वी पर साष्टांग हो गया।

द्रोण ने सौम्य स्वर में आदेश दिया, उठो पुत्र, कौन हो तुम आचार्य कौन हैं तुम्हारे?

युवक उठा अपने दाहिने हाथ से मुख ढंकते हुए कहा उसने " निषादराज का पुत्र एकलव्य हूं आचार्य, आप ही मेरे आचार्य हैं।"
द्रोण की एक भौंह किंचित् हिली "अर्थात?"

"सात वर्ष पूर्व मेरे पिता मुझे आपके पास धनुर्विद्या सिखाने लाए थे किंतु हस्तिनापुर राजपरिवार के ही कुल को शिक्षा देने की वचन बद्धता के कारण आपने असमर्थता दिखाई थी उसके पश्चात मैने पांच वर्ष तक वन के श्रेष्ठ आचार्यों से शिक्षा ली वहां से सीखकर दो वर्ष पहले एक दिन आपके आश्रम के पास की ही मिट्टी लेकर आपकी प्रतिमा बनाई, आपको दूर से ही देखकर संकल्प लिया और आपको अपना गुरू स्वीकार किया और प्रतिमा यहीं स्थापित कर के आप ही के समक्ष नित्य अभ्यास करता हूँ।"

द्रोण ने एक गहरी सांस ली, कुछ क्षण सोचा और एकलव्य से कहा, "तो परीक्षा दो।"

अश्वत्थामा ये सब देखकर कुछ भी न समझ पा रहे थे केवल मूकदर्शक बने हुए थे पारंपरिक योद्धाओं के समर्पण के ढंग से एक घुटना भूमि पर टिकाकर सिर झुकाते हुए कहा एकलव्य ने "आज्ञा दें"

आचार्य द्रोण ने कहा तुम्हें एक ही स्थान पर सात बाण चलाने हैं "जैसी आज्ञा! " उठ गया एकलव्य।

द्रोण उन दोनों को वहीं रोककर और एकलव्य से खड़िया लेकर आगे बढे और श्वान को अपने साथ आने का संकेत कर दिया करीब सौ कदम आगे जाकर एक मोटे से पेड़ के तने पर निशान बनाया श्वान से कुछ कहा और एक ओर हटते हुए एकलव्य को संधान करने का संकेत किया।

एकलव्य ने बाण निकाला, प्रत्यंचा पर चढा कर प्रक्षेपण कर दिया बाण नहीं पहुंचा चिन्ह तक,एकलव्य ने अचंभित नेत्रों से देखा वो तो श्वान के मुख में दबा है द्रोण का दूसरा संकेत दूसरे बाण का भी वही हुआ सातों बाण अंत में एकसाथ श्वान के मुख में दबे हुए थे।

अश्वत्थामा हतप्रभ अवस्था में थे एकलव्य की अवस्था ऐसी थी जैसे रक्त निचुड़ गया हो द्रोण समीप आ रहे थे उनके नेत्रों में दया,करुणा के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे अश्वत्थामा की ओर देखा उन्होंने "श्वान का मुख बंद हो गया है बाणों से निकाल दो" "अभी कम से कम तीन वर्ष के अभ्यास की और आवश्यकता है तुम्हे पुत्र,हमारा आदेश है अभ्यास बंद नहीं करना।" उन्होने एकलव्य के कंधे पर हाथ रखा।

एकलव्य के नेत्रों से जलप्रवाह हो रहा था उसके मुख से कुछ नहीं निकल पाया।

" एक और आदेश है, ये अभ्यास तुम्हें यहां नहीं विदर्भ देश में जाकर करना होगा किंतु हमारी गुरु दक्षिणा का क्या होगा?"
एकलव्य ने पुनः हाथ से मुख ढंककर भरी हुई वाणी में कहा "कहें आचार्य, प्राण सहित सर्वस्व अर्पण हैं।"

कठोर से भाव ठहर गए द्रोण के नेत्रों में मुख से शब्द निकले जो एकलव्य और अश्वत्थामा के सिर पर बिजली की तरह गिरे "हमें तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए गुरुदक्षिणा में एकलव्य! "

एकलव्य अवाक् द्रोण की ओर देख रहा था "किंतु पिताजी"अश्वत्थामा ने कुछ कहने का प्रयास किया, हाथ के संकेत से रोक दिया द्रोण ने "निर्णय करो एकलव्य " शांत स्वर था द्रोण का।

एकलव्य ने कमर से कटार निकाली और एक ओर बढ गया एक पौधे से कुछ पत्तियां तोडीं पत्थर पर कुचलकर चटनी जैसी बनाकर एक पत्ते पर रख ली फिर वहीं पड़े पत्ते उठाकर एक दोना बनाया तने पर रखा और तीक्ष्ण कटार से एक ही झटके में अपना अंगूठा काट कर डाल दिया उसमें।
दांत भींच रखे थे उसने मुख पर मरणांतक कष्ट के भाव आकर लुप्त हो गए तुरंत पत्ते पर रखी चटनी पत्ते सहित घाव पर रखकर दबा दी बाएं हांथ से दोना उठाया और द्रोणाचार्य के पास लाकर उनके चरणों में रख दिया और स्वयं भी वहीं शीश रख दिया।

द्रोण ने उठाया उसे कंधे से पकड़ कर और बोले "अब विलंब उचित नहीं विदर्भ की ओर प्रस्थान करो।"

एकलव्य ने नतमस्तक होकर प्रणाम किया आश्रम की ओर लौटते हुए मार्ग में इस पूरे घटनाक्रम से उद्विग्न अश्वत्थामा ने पूछ ही लिया "पिताजी ...."

"हम जानते हैं पुत्र तुम जानना चाहते हो कि ये सब क्यों किया हमने" कहा द्रोण ने "तुम स्वयं एक योद्धा हो, जानते हो प्रत्यंचा चढाने के तीन तरीके होते हैं।
पहला निकृष्ट जिसमें अंगूठे और तर्जनी से पकड़ कर तीर चलाया जाता है सही लक्ष्य भेदन के लिये ये उचित है जैसे आखेट के लिये किंतु युद्ध के लिये नहीं,इससे बाण की गति मंद हो जाती है।
वर्षों तक एकलव्य ने वनवासी धनुर्धरों से सीखा है अतः वो इसी का उपयोग करता है दूसरा मध्यम जिसमें तर्जनी और मध्यमा से संधान किया जाता है और अंगुष्ठ को मोड़ कर तर्जनी पर दबाव बनाया जाता है और श्रेष्ठ जहां अंगूठे का बिलकुल उपयोग नहीं होता श्रेष्ठ धनुर्धर इसी का उपयोग करते हैं।

एकलव्य ने मुझे गुरू स्वीकार किया गुरू और इष्ट भाव से बंधे होते हैं हम स्वयं राजकुल से भिन्न किसी अन्य को न सिखाने के लिये वचनबद्ध हैं।
यदि एकलव्य को बता देते कि अंगूठे का उपयोग न करे तो वचन टूटता,न बताते तो गुरू शिष्य की मर्यादा भंग होती तीन वर्ष के अभ्यास से एकलव्य श्रेष्ठ मार्ग से उत्तम संधान कर सकेगा इससे भिन्न कोई मार्ग नहीं था।

उसका यहां वन से दूर जाकर अभ्यास भी उचित है ताकि एकांगी धनुर्विद्या से बहुआयामी की ओर गतिमान हो सके श्रेष्ठ बनने के लिये स्पर्धा चाहिये जो वन में कैसे मिलेगी? "

अश्वत्थामा ने दुःखी होकर द्रोण की ओर डबडबाई दृष्टि से देखा " किंतु इस दक्षिणा के कारण आप का सम्मान?"

"ज्ञात है अश्वत्थामा,संसार के अंत तक लोग हमें क्रूर और निर्दयी गुरू के रूप में स्मरण करेंगे किंतु गुरू होने के नाते स्वयं के सम्मान और शिष्य की भलाई में से हमने द्वितीय को चुना और इस पर हमें कोई दुःख नहीं है।

गुरू को सदैव स्वयं से अधिक शिष्य प्रिय होता है और एकलव्य की गुरू भक्ति सदा के लिये उदाहरण बन गई है धन्य होते हैं वो गुरू जिन्हें ऐसे शिष्य प्राप्त होते हैं।"
#मनुर्भव

Saturday, November 21, 2020

वाहन क्रय करने का शुभ मुहूर्त

वाहन क्रय करने का मुहूर्त -

नक्षत्र - अश्वनी, पुष्य, अभिजीत,हस्त, रेवती, धनिष्ठा, मृर्गशीर्ष, स्वाती, शततारा, पुनर्वसु, नक्षत्रों मे। 
रिक्ता तिथि(४, ९,१४)और मंगलवार, शनिवार,बुधवार, को छोड़कर शेष तिथि वारों में वाहन से सम्बन्धित सभी कार्य ( क्रय-विक्रय) शुभ कहे गये हैं। 
👉
(चर संज्ञक नक्षत्र) स्वाती पुनर्वसु श्रवण, धनिष्ठा, शततारका तथा सोमवार में प्रथम वार वाहन चलाना शुभ होता है। 
- डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Saturday, October 24, 2020

राहुकाल

राहुकाल  दिन में एक मुहूर्त (४८ मिनट) की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है। यह स्थान और तिथि के साथ अलग अलग होता है, अर्थात अलग अलग स्थान के लिए राहुकाल बदलता रहता है। यह अंतर समयक्षेत्र में अंतर के कारण होता है। मान्यता अनुसार किसी भी पवित्र, शुभ या अच्छे कार्य को इस समय आरंभ नहीं करना चाहिए। राहुकाल प्रायः प्रारंभ होने से दो घंटे तक रहता है। पौराणिक कथाओं और वैदिक शास्त्रों के अनुसार इस समय अवधि में शुभ कार्य आरंभ करने से बचना चाहिए |

राहुकाल सप्ताह के सातों दिन में निश्चित समय पर लगभग ९० मिनट तक रहता है। इसे अशुभ समय के रुप मे देखा जाता है और इसी कारण राहु काल की अवधि में शुभ कर्मो को यथा संभव टालने की सलाह दी जाती है। राहु काल अलग-अलग स्थानों के लिये अलग-अलग होता है। इसका कारण यह है की सूर्य के उदय होने का समय विभिन्न स्थानों के अनुसार अलग होता है। इस सूर्य के उदय के समय व अस्त के समय के काल को निश्चित आठ भागों में बांटने से ज्ञात किया जाता है। सप्ताह के प्रथम दिवस अर्थात सोमवार के प्रथम भाग में कोई राहु काल नहीं होता है। यह सोमवार को दूसरे भाग में, शनिवार को तीसरे भाग, शुक्रवा को चौथे भाग, बुधवार को पांचवे भाग, गुरुवार को छठे भाग, मंगलवार को सातवे तथा रविवार को आठवे भाग में होता है। यह प्रत्येक सप्ताह के लिये निश्चित रहता है।
इस गणना में सूर्योदय के समय को प्रात: ०६:०० ( भा.स्टै.टा) बजे का मानकर एवं अस्त का समय भी सांयकाल ०६:०० बजे का माना जाता है। इस प्रकार मिले १२ घंटों को बराबर आठ भागों में बांटा जाता है। इन बारह भागों में प्रत्येक भाग डेढ घण्टे का होता है। हां इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वास्तव में सूर्य के उदय के समय में प्रतिदिन कुछ परिवर्तन होता रहता है और इसी कारण से ये समय कुछ खिसक भी सकता है। अतः इस बारे में एकदम सही गणना करने हेतु सूर्योदय व अस्त के समय को पंचांग से देख आठ भागों में बांट कर समय निकाल लेते हैं जिससे समय निर्धारण में ग़लती होने की संभावना भी नहीं रहती है।
-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Sunday, July 5, 2020

चुनाव

बिहार कि राजनिति
 राजनीति को समझने के लिए एक कहानी बताता हूं।
एक कैदी को दण्ड स्वरूप दो विकल्प दिया गया पहला लगातार 10 किलो कच्चा प्याज खाने का।
 दूसरा 1000 कोड़ा खाने का कैदी ने सोचा 1000 कोड़ा खाने पर तो मैं मर ही जाऊंगा क्यों ना 10 किलो प्याज खा लें, और वह प्याज खाने लगा 1 किलो प्याज खाने के बाद, उसको लगा कि अब एक भी प्याज खाया तो मर जाऊंगा, प्याज का तेज उसको सहन नहीं हो रहा था।
 अतः उसने कोड़ा खाने का सजा चुना और उसको कोड़ा मारा गया 200 कोड़ा खाने के बाद उसको लगा अब एक भी कोडा खाया तो मर जाऊंगा। अत: उसने पुनः प्याज खाना स्वीकार किया और यह सिलसिला चलता रहा वह कभी प्याज तो कभी कोडा खाता। परन्तु दोनो मे से कोई भी लगातार नही खाता। जिसके कारण उसका 1000 कोडा या 10 किलो प्याज का सजा जब तक वह मर नही गया तब तक समाप्त नही हुआ।
बन्धुओं अब आते हैं चुनाव पर -
 बिहार चुनाव का भी यही स्थिति है बिहार का जनता कभी राजद को तो कभी जदयू का चयन करती है और यह सिलसिला 30 वर्षों से चल रहा है और बिहार अपनी दुर्दशा को प्राप्त हो रहा है और इन दोनो पार्टियों के कुकर्मों को झेल रहा है। 
👉 बिहार के लोगों को अब कोई तीसरा विकल्प चुनना चाहिए। बिहार के लोग कब तक कोड़ा और प्याज जदयू और राजद राजद और जदयू करेंगे। अब बिहार के लोगों को इन दोनों पार्टियों को उखाड़ फेंकना चाहिए।
और एक समृद्ध बिहार का निर्माण करना चाहिये।
 जय भारत ! जय बिहार!
- डॉ मुकेश ओझा 
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Saturday, July 4, 2020

गुरु पूजन पद्धति

गुरु पूजन पद्धति

|| ॐ श्री गणेशाय: नमः 
| ॐ श्री सरस्वत्यै नमः 
||ॐ श्री गुरुभ्यो नमः    

जय गुरुदेव

ॐश्री गुरुचरणकमलेभ्यो नमः

ध्यानम्🙏
नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च।
व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम्॥

श्री शंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यम्।
तं त्रोटकं वार्त्तिककारमन्यान् अस्मतगुरून् सन्ततमानतोस्मि॥

श्रुतिस्मृतिपुराणानां आलयं करुणालयं।
नमामि भगवत्पादं शङ्करं लोकशङ्करम्॥

शङ्करं शङ्कराचार्य केशवं बादरायणम्।
सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः॥

|| सदाशिव समारम्भाम् शंकराचार्य मध्यमाम् ।
अस्मद् आचार्य पर्यन्ताम् वंदे गुरु परम्पराम् ||

॥ॐ समस्तजनकल्याणे निरतं करुणामयम् ।
नमामि चिन्मयं देवं सद्गुरुं ब्रह्मविद्वरम् ॥

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

प्रत्यक्ष / मानस पूजा :- 

१ ॐ लं पृथ्व्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामी । 
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।🙏
गुरुदेव! मै पृथ्वी रूपी गंध चन्दन आपको अर्पित करता हूँ। 
२- ॐ हम आकाशात्मकं पुष्पम परिकल्पयामी।
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।🙏
गुरुदेव! मै आकाश रूप पुष्प आपको अर्पितकर्ता हूँ । 

३- ॐ यम वायवातंकम  धूपम  परिकल्पयामी।
 श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।🙏
गरुदेव!  मै वायु रूप में धुप आपको अर्पित करता हूँ । 

४- ॐ रम वह्यतमकम  दीपं दर्शयामि । 
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।🙏

गुरुदेव! मै अग्निदेव रूप मे दीपक आपको प्रदान करता हूँ।

५- ॐ वम अमृतात्मकम  नैवेद्यम निवेदयामि । 
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।🙏

गुरुदेव!  मै  अमृत  के सामान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ  । 

६- ॐ सोम  सर्वात्मकं सर्वोपचारम  समर्पयामि  । 
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।🙏

गुरुदेव! मै सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारो को आपके चरणो में समर्पित करता हूँ। 

इस प्रकार उपरोक्त मंत्रो से गुरुदेव का पूजा करें। 
यदि गुरुदेव पास न हों तो
इस प्रकार उपरोक्त मंत्रो से गुरुदेव का मानस पूजा करें। 
-  डॉ मुकेश ओझा
#ज्योतिष एवं #आध्यात्मिक सलाहकार

Friday, July 3, 2020

आदर्श सरपंच और मुखिया

ये सरपंच भक्ति शर्मा हैं..

अमेरिका से लौटी हैं  अब मध्यप्रदेश में एक ग्राम पंचायत की सरपंच है।  इनके गांव में बहुत सारे खास काम होते हैं, यहां एक सरपंच योजना चलती है.. किसान को मुआवजा मिलता है। हर आदमी का बैंक अकाउंट है और हर खेत का मृदा कार्ड.. कुछ ही वर्षों में इन्होंने अपने गांव की तस्वीर बदल दी है.. पढ़िए इनकी सफलता की कहानी...  
भक्ति शर्मा ने एमए राजनीति शास्त्र से किया है, अभी वकालत की पढ़ाई कर रही हैं। भोपाल जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर बरखेड़ी अब्दुल्ला ग्राम पंचायत है। इस पंचायत में कुल 2700 जनसँख्या है जिसमे 1009 वोटर हैं। ओडीएफ हो चुकी इस पंचायत में आदर्श आंगनबाड़ी से लेकर हर गली में सोलर स्ट्रीट लाइटें हैं।
“सरपंच बनते ही सबसे पहला काम हमने गांव में हर बेटी के जन्म पर 10 पौधे लगाना और उनकी माँ को अपनी दो महीने की तनख्वाह देने का फैसला लेकर किया। पहले साल 12 बेटियां पैदा हुई, माँ अच्छे से अपना खानपान कर सके इसलिए अपनी यानि सरपंच की तनख्वाह ‘सरपंच मानदेय’ के नाम से शुरू की।”

भक्ति ने कहा, “हमारी पहली ऐसी ग्राम पंचायत बनी जहाँ हर किसान को उसका मुआवजा मिला। हर ग्रामीण का राशनकार्ड, बैंक अकाउंट, मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाया। इस समय पंचायत का कोई भी बच्चा कुपोषित नहीं है। महीने में दो से तीन बार फ्री में हेल्थ कैम्प लगता है। 
भक्ति ने कहा, “हमारी पहली ऐसी ग्राम पंचायत बनी जहाँ हर किसान को उसका मुआवजा मिला। हर ग्रामीण का राशनकार्ड, बैंक अकाउंट, मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाया। पहले साल में 113 लोगों को पेंशन दिलानी शुरू की, इस समय पंचायत का कोई भी बच्चा कुपोषित नहीं है। महीने में दो से तीन बार फ्री में हेल्थ कैम्प लगता है, जिससे पंचायत का हर व्यक्ति स्वस्थ्य रहे।”
ग्राम पंचायत का कोई भी काम भक्ति अपनी मर्जी से नहीं करती हैं। वर्ष 2016-17 में 10 ग्राम सभाएं हो चुकी हैं, पंचों की बैठक समय-समय पर अलग से होती रहती है। जब ये सरपंच बनी थीं तो इस पंचायत में महज नौ शौचालय थे अभी ये पंचायत ओडीएफ यानि खुले में शौच से मुक्त हो चुकी है। भक्ति का कहना है, “हमने पंचायत में कोई भी काम अलग से नहीं किया, सिर्फ सरकारी योजनाओं को सही से लागू करवाया है। पंच बैठक में जो भी निर्धारित करते हैं वही काम होता है। ढ़ाई साल में बहुत ज्यादा विकास तो नहीं करवा पाए हैं क्योंकि जब हम प्रधान बने थे उस समय गांव की सड़कें ही पक्की नहीं थी, इसलिए पहले जरूरी काम किए।”
भक्ति ने अपने प्रयासों से अपनी पंचायत को सरकार की मदद से एक बड़ा सामुदायिक भवन पास करा लिया है। भक्ति का कहना है, “आगामी छह महीने में इस भवन में डिजिटल क्लासेज शुरू हो जायेंगी, जो पूरी तरह से सोलर से चलेंगी। इसमें महिलाओं के लिए सिलाई सेंटर, और चरखा केंद्र खुलेगा। किसानों के लिए समय-समय पर बैठकें होंगी, जिससे वो खेती के आधुनिक तरीके सीख सकें। बच्चों के लिए तमाम तरह की गतिविधी होंगी जिससे उन्हें गांव में शहर जैसी सुविधाएँ मिल सकें।”
पंचायत की हर महिला निडर होकर रात के 12 बजे भी अपनी पंचायत में निकल सके भक्ति शर्मा की ऐसी कोशिश है। भक्ति ने कहा, “पंचायत की हर बैठक में महिलाएं ज्यादा शामिल हों ये मैंने पहली बैठक से ही शुरू किया। मिड डे मील समिति में आठ महिलाएं है। महिलाओं की भागीदारी पंचायत के कामों में ज्यादा से ज्यादा रहे जिससे उनकी जानकारी बढ़े और वो अपने आप को सशक्त महसूस करें।”
पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से ग्राम पंचायत में पानी की बहुत समस्या है। पीने के पानी के लिए तो सबमर्सिबल लगा है लेकिन खेती को समय से पानी मिलना थोड़ा मुश्किल होता है। भक्ति का कहना है, “जिनके पास 10-12 एकड़ जमीन है, हमारी कोशिश है वो हर एक किसान कम से कम एक एकड़ में जैविक खेती जरुर करें। बहुत ज्यादा संख्या में तो नहीं लेकिन किसानों ने जैविक खेती करने की शुरुआत कर दी है।”👏🇮🇳🌾

Tuesday, June 16, 2020

21 जून 2020 सूर्य ग्रहण का फल- स्पर्श- मोक्ष

21 जून 2020

सूर्य ग्रहण काशी मे
स्पर्श - 10बजकर 31मिनट पर

मध्य - 12बजकर 18 मिनट पर

मोक्ष - 2बजकर4 मिनट पर दिन मे।

ग्रहण का सुतक 20 जून 2020 को रात्रि 10बजकर 31 मिनट से लग जाएगा।

#ग्रहण_फल

बारह राशियों के लिये ग्रहण देखने पर क्या फल प्राप्त होगा?

यथा-

मेष- श्रीप्राप्ति

वृष- क्षति

मिथुन - घात

कर्क - हानि

सिंह - लाभ

कन्या - सुख

तुला - माननाश

वृश्चिक - मृत्युतुल्यकष्ट

धनु - स्त्रीपीडा

मकर - सौख्य

कुम्भ - चिंता

मीन - व्यथा
🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺

ग्रहण काल मे सभी लोगों को भगवन नाम संकिर्तन करना चाहिये या किसी मंत्र का जप करना चाहिये।

ग्रहणकाल का समय काशी के अनुसार है। आप अपने स्थान का संसोधन कर सकते हैं।

-डाॅ. मुकेश ओझा

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार