Wednesday, June 1, 2022

श्रीरामनाम रामायण

बाल काण्डम्

शुद्ध ब्रह्म परात्पर राम
कालात्मक परमेश्वर राम

शेष तल्प सुख निद्रित राम
ब्रह्माध्यमर प्रार्थित राम

चण्डकिरण कुल मण्डन राम
श्रीमद्  दशरथ नन्दन राम

कौसल्या सुख वर्धन राम
विश्वामित्र प्रियधन राम

घोर ताटक धातक राम
मारीचादि निपातक राम

कौशिकमख संरक्षक राम
श्रीमदहल्योद्धारक राम

गौतममुनि संपूजिता राम
सुर मुनि वर गण संस्तुत राम

नाविक धाविक मृदुपद राम
मिथिलापुरजन मोहक राम

विदेहमानस रञ्जक राम
त्रयम्बक कार्मुख भञ्जक राम

सीतार्पित वरमालिक राम
कृत वैवाहिक कौतुक राम

भार्गवदर्प विनाशक राम
श्रीमदयोध्या पालक राम

राम राम जय राजाराम
राम राम जर सीताराम


अयोध्या काण्डम् 

अगणित गुणगण भूषित राम
अवनीतनया कामित राम 

राका चन्द्र समानन राम 
पितृ वाक्यश्रित कानन राम 

प्रियगुह विनिवेदितपद राम 
तक्षलित निज मृदुपद राम 

भारद्वाज मुखाननक राम 
चित्रकूटाद्रि निकेतन राम 

दशरथ संतत चिन्तित राम 
कैकेयी तनयार्पित राम 

 विरचित निज पितृकर्मक राम 
भरतार्पित निज पादुका राम

राम राम जय राजाराम
राम राम जय सीताराम

किष्किन्धा काण्डम् 

हनुमत्सेवित निजपद राम 
नत सुग्रीवाभीष्टद राम 
गर्वित वाली संहारक राम
वानर दूत प्रेषक राम 
हितकर लक्ष्मण संयुत राम 
 
राम राम जय राजाराम
राम राम जय सीताराम

सुन्दर काण्डम् 

कपिवर संतत संस्मृत राम
तद्गति विघ्न ध्वंस्कर राम

सीता प्राणाधारक राम
दुष्ट दशानन दूषित राम

शिष्ट हनुमद्भूषित राम
सीता वेदित काकावन राम

कृत चूडामणि दर्शन राम
कपिवर वचनाशवासित राम

राम राम जयराजाराम
राम राम जय सीताराम

युद्ध काण्डम् 

रावण निधन प्रस्थित राम 
वानर सैन्य समावृत राम 

शोषित शरदीशार्थित राम 
विभीषणाभय दायक राम 

पर्वतसेतु निभन्धक राम 
कुम्भकर्ण शिरश्छेदक राम 

राक्षस संघ विमर्धक राम 
अहिमहिरावण चारण राम 

संहृत दशमुखरावण राम 
विधिभव मुखसुर संस्तुत राम 

खःस्थित दशरथ वीक्षित राम 
सीता दर्शन मोहित राम 

अभिषिक्त विभीषणनत   राम 
पुष्पकयान रोहित राम 

भारद्वाजादिनिषेवण राम 
भरत प्राण प्रियकर राम 

साकेतपुरी भूषण राम 
सकल स्वीयसमानस राम 

रत्नलसत्पीठास्थित राम 
पट्टाभिषेकालङ्कृत  राम 

पार्थिव कुल सम्मानित राम
विभीषणार्पितरङ्कर  राम

कीश कुलानुग्रहकर राम
सकल जीव संरक्षक राम
समस्त लोकाधारक राम

राम राम जय राजाराम 
राम राम जय सीताराम

उत्तर काण्डम्

आगत मुनिगण संस्तुता राम
विश्रुत दशकण्ठोद्भव राम

सीतालिङ्गन निर्वृत राम
नीति सुरक्षित जनपद राम

विपिन त्याजित जनकज राम
कृत लवणासुर वध राम

सवर्गत शम्भुक संस्तुत राम
स्वतनय कुशलव नन्दित राम

अश्वमेध क्रतु दीक्षित राम
कालावेदित सुरपदा राम

अयोध्यकजनमुक्तित राम
विधिमुख विविधानन्दक राम

तेजोमय निजरूपक राम
संसृति बन्ध विमोचक राम


धर्म स्थापन तत्पर राम
भक्ति परायण मुक्तिद राम

सर्व चराचर पालक राम
सर्व भवामयवारक राम

वैकुण्ठालय संस्थित राम
नित्यानन्दपदस्थित राम

राम राम जय राजा राम
राम राम जय सीता राम

राम राम जय राजाराम
राम राम जय सीताराम

इति राम नाम रामायण

Wednesday, February 2, 2022

पूजन सामग्री

पूजन सामग्री

धूप बत्ती
कपूर
केसर
चंदन
यज्ञोपवीत 5
कुंकुम
अक्षत
अबीर
गुलाल, अभ्रक
हल्दी
आभूषण
नाड़ा
रुई
रोली, सिंदूर
सुपारी, पान के पत्ते (7)
पुष्पमाला, कमलगट्टा
सप्तमृत्तिका
सप्तधान्य
कुशा व दूर्वा
पंच मेवा
गंगाजल
शहद (मधु)
शकर
घृत (शुद्ध गाय का घी)
दही
दूध
ऋतुफल
नैवेद्य या मिष्ठान्न ( पेड़ा, मालपुए इत्यादि)
इलायची (छोटी)
लौंग 
मौली
इत्र
सिंहासन (चौकी, आसन)
पंच पल्लव(बड़, गूलर, पीपल, आम और पाकर के पत्ते)
पंचामृत
तुलसी दल
केले के पत्ते(यदि उपलब्ध हों तो खंभे सहित)
औषधि
( जटामॉसी, शिलाजीत आदि)

( प्रधान देवता की मूर्ति)
गणेशजी की मूर्ति
अम्बिका की मूर्ति
देवता के लिये वस्त्र
गणेशजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र
अम्बिका को अर्पित करने हेतु वस्त्र
जल कलश (तांबे या मिट्टी का)
सफेद कपड़ा (आधा मीटर)
लाल कपड़ा (आधा मीटर)
पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार)
दीपक
बड़े दीपक के लिए तेल
श्रीफल (नारियल)
धान्य (चावल, गेहूँ)
पुष्प (श्वेत,पीला, लाल)
दोना 20
कसोरा छोटा 10
एक बडा पात्र पुजन सामग्री रखने के लिये।
हवन सामग्री एवं लकडी,उपला, कपूर,घी एवं पात्र

Tuesday, January 4, 2022

मन्त्र

धन लाभ के लिये और शत्रु नाश के लिये इस मंत्र का विधि पूर्वक जप करें। ✍

बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। 
नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥

निर्मल मति प्राप्त करने के लिए परिवार में शांति के लिए इस मंत्र का प्रतिदिन 21 बार जप करें
✍जनकसुता जग जननि जानकी।
 अतिसय प्रिय करुना निधान की।। 
ताके जुग पद कमल मनाऊँ।
 जासु कृपा निर्मल मति पावऊँ।।

Monday, November 29, 2021

हिन्दु समाज के विवाह संस्कार में पति-पत्नी की प्रतिज्ञाएँ।

हिन्दु समाज के विवाह संस्कार में पति-पत्नी की प्रतिज्ञाएँ।
किसी भी महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण के साथ शपथ ग्रहण समारोह भी अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। हिन्दु समाज के विवाह संस्कार में कन्यादान, पाणिग्रहण एवं ग्रन्थि-बन्धन हो जाने के साथ वर-वधू द्वारा और समाज द्वारा दाम्पत्य सूत्र में बँधने की स्वीकारोक्ति हो जाती है। इसके पश्चात् अग्नि एवं देव-शक्तियों की साक्षी में दोनों को एक संयुक्त इकाई के रूप में ढालने का क्रम चलता है। इस बीच उन्हें अपने कर्त्तव्यधर्म का महत्त्व भली प्रकार समझना और उसके पालन का संकल्प लेना चाहिए। इस दिशा में पहला उत्तरदायित्व वर का होता है। अस्तु, पहले वर तथा बाद में वधू को प्रतिज्ञाएँ करायीं जाती हैं।

क्रिया और भावना- वर-वधू स्वयं प्रतिज्ञाएँ पढ़ें, यदि सम्भव न हो, तो आचार्य एक-एक करके ये प्रतिज्ञाएँ व्याख्या सहित समझाएँ।

वर की प्रतिज्ञाएँ

धर्मपत्नीं मिलित्वैव ह्येकं जीवनामावयोः। 
अद्यारम्भ यतो मे त्वमर्द्धांगिनीति घोषिता।।१॥ 

आज से धर्मपत्नी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ। अपने शरीर के अंगों की तरह धर्मपत्नी का ध्यान रखूँगा। 

स्वीकरोमि सुखेन त्वां गृहलक्ष्मीमहन्ततः। 
मन्त्रयित्वा विधास्यामि सुकार्याणि त्वया सह॥२॥ 

मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें गृहलक्ष्मी का महान अधिकार सौंपता हूँ और जीवन के सत्कार्यों को तुम्हारे साथ परामर्श करके करूँगा। 

रूप-स्वास्थ्य-स्वभावान्तु गुणदोषादीन् सर्वत:। रोगाज्ञान-विकारांश्च तव विस्मृत्य चेतसः॥३॥
 
मैं तुम्हारे रूप, स्वास्थ्य, स्वभावगत गुणदोष एवं अज्ञानजनित विकारों को चित्त में नहीं रखूँगा, उनके कारण असन्तोष व्यक्त नहीं करूँगा। स्नेहपूर्वक सुधारने या सहन करते हुए आत्मीयता बनाये रखूँगा। 

सहचरो भविष्यामि पूर्णस्नेहः प्रदास्यते। 
सत्यता मम निष्ठा च यस्याधारं भविष्यति॥४॥ 

पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और पूरा-पूरा स्नेह देता रहूँगा। इस वचन का पालन मेरी पूरी निष्ठा और सत्य के आधार पर करूँगा। 

यथा पवित्रचित्तेन पातिव्रत्य त्वया धृतम्। 
तथैव पालयिष्यामि पत्नीव्रतमहं ध्रुवम्॥५॥ 

जिस प्रकार तुमने पवित्र चित्त से पतिव्रत धर्म को धारण किया है, उसी दृढ़ता से स्वयं पत्नीव्रत धर्म का पालन करूँगा। 

गृहस्यार्थव्यवस्थायां मन्त्रयित्वा त्वया सह। 
सञ्चालनं करिष्यामि गृहस्थोचित-जीवनम्॥६॥ 

गृह की अर्थव्यवस्था में तुम्हारे साथ सलाह करके गृहस्थोचित जीवन का सञ्चालन करूँगा। अर्थात् आय और व्यय का क्रम तुम्हारी सहमति से करने की गृहस्थोचित जीवनचर्या अपनाऊँगा। 

समृद्धि-सुख-शान्तीनां रक्षणाय तथा तव। 
व्यवस्थां वै करिष्यामि स्वशक्तिवैभवादिभि:॥७॥ 

तुम्हारी सुख-शान्ति तथा समृद्धि-सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी शक्ति, वैभव और साधन आदि को लगाकर व्यवस्था करता रहूँगा। 

यत्नशीलो भविष्यामि सन्मार्गं सेवितुं सदा। 
आवयोर्मतभेदांश्च दोषान्संशोध्य शान्तितः॥८॥ 

अपनी ओर से मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयतन करूँगा। हम दोनों के मतभेदों और दोषों का सुधार शान्ति के साथ करूँगा। 

भवत्यामसमर्थायां विमुखायां च कर्मणि।
विश्वासं सहयोगं च मम प्राप्स्यसि त्वं सदा॥९॥ 

आप के असमर्थ या अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाने पर भी तुम मेरे विश्वास और सहयोग को  सदा प्राप्त करती रहोगी।

कन्या की प्रतिज्ञाएँ

स्वजीवनं मेलयित्वा भवतः खलु जीवने। 
भूत्वा चार्धाङ्गिनी नित्यं निवत्स्यामि गृहे सदा॥१॥ 

अपने जीवन को आपके के साथ संयुक्त करके नये जीवन की सृष्टि करूँगी। इस प्रकार घर में सदा, सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी बनकर रहूँगी। 

‍शिष्टतापूवर्कं सर्वै: परिवारजनैः सह। 
औदार्येण विधास्यामि व्यवहारं च कोमलम्॥२॥ 

पति के परिवार के सभी परिजनों के साथ शिष्टता बरतूँगी। उनकी उदारतापूवर्क सेवा करूँगी और मधुर व्यवहार करूँगी। 

त्यक्त्वालस्यं करिष्यामि गृहकार्ये परिश्रमम्। 
भतुर्हर्षं हि ज्ञास्यामि स्वीयामेव प्रसन्नताम्॥३॥ 

आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूवर्क गृह कार्य करूँगी। इस प्रकार अपनी प्रसन्नता से पति के हर्ष के लिए समुचित योगदान करूँगी। 

श्रद्धया पालयिष्यामि धर्मं पातिव्रतं परम्।
सर्वदैवानुकूल्येन पत्युरादेशपालिका॥४॥ 

श्रद्धापूर्वक पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी, पति के आदेश का सदैव उनके अनूकूल रहकर पालन करूँगी। 

सुश्रूषणपरा स्वच्छा मधुर-प्रियभाषिणी। 
प्रतिजाने भविष्यामि सततं सुखदायिनी॥५॥ 

मैं प्रतिज्ञापूर्वक सेवापरायणा, स्वच्छ तथा मधुर और प्रियभाषणी का अभ्यास बनाये रखूँगी। निरन्तर सुख देने वाली बनकर रहूँगी। ‍

मितव्ययेन गाहर्स्थ्य-सञ्चालने हि नित्यदा। 
प्रयतिष्ये च सोत्साहं तवाहमनुगामिनी॥६॥ 

गृहस्थी का सञ्चालन करने के लिए सदा मितव्ययी बनकर व्यर्थ व्यय न करके  आचरण करूँगी। मैं उत्साहपूर्वक आपके अनुशासन का पालन का प्रयत्न करूँगी। ‍

देवस्वरूपो नारीणां भर्त्ता भवति मानवः। 
मत्वेति त्वां भजिष्यामि नियता जीवनावधिम्॥७॥ 

नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है- यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन की सम्पूर्ण अवधि में भर सक्रिय रहूँगी। 

पूज्यास्तव पितरो ये श्रद्धया परमा हि मे।
सेवया तोषयिष्यामि तान्सदा विनयेन च॥८॥ 

जो आपके पूज्य और श्रद्धा पात्र हैं, उन्हें परम श्रद्धा और सेवा द्वारा और विनय द्वारा सदैव सन्तुष्ट रखूँगी। 

विकासाय सुसंस्कारैः सूत्रैः सद्भाववर्द्धिभि:।
परिवारसदस्यानां कौशलं विकसाम्यहम्॥९॥ 

परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों के विकास तथा उन्हें सद्भावना के सूत्रों में बाँधे रहने का कौशल अपने अन्दर विकसित करूँगी।

Friday, October 29, 2021

आवेदन पत्र 10

श्रीमन्‍त: प्राचार्यमहोदया:

शासकीय उच्च विद्यालय: लछवारः

थावें, बिहार:


विषय:- अवकाशार्थं प्रार्थनापत्रम् ।

श्रीमन्‍त:

सेवायां सविनयं निवेदनम् अस्ति यद अहम् अघ अकस्‍माद् ज्‍वरपीडित: अस्मि।  अत एव विद्यालयम् आगन्‍तु सर्वथा असमर्थ: अस्मि। कृपया 29-10-2021 दिनांकात् 2-11-2021 दिनांकपर्यन्‍तं पच्‍चदिवसानाम् अवकाशं दत्वा उपकुर्वन्तु इति। सविनियं प्रार्थयामि।

   भवदीय: शिष्‍या:

      (अ, ब, स)

कक्षा दशमी ‘ब” वर्ग:

दिनांक: (28-10-2021)                                 

Friday, July 16, 2021

ब्राह्मणत्वकी_दुर्लभताके_सन्दर्भमें_मातंगोपाख्यान

#ब्राह्मणत्वकी_दुर्लभताके_सन्दर्भमें_मातंगोपाख्यान*

(श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व/ दानधर्मपर्व  / इन्द्रमतङ्गसंवाद  अध्यायः २७ ॥ 
युधिष्ठिर प्रश्न

युधिष्ठिरने पूछा—धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर ! आप बुद्धि, विद्या, सदाचार, शील और विभिन्न प्रकार के सम्पूर्ण सद्गुणों से सम्पन्न हैं । आपकी अवस्था भी सबसे बड़ी है। आप बुद्धि, प्रज्ञा और तपस्या से विशिष्ट हैं; अतः मैं आपसे धर्म की बात पूछता हूँ । संसारमें आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जिससे सब प्रकारके प्रश्न पूछे जा सकें ॥१-२॥ नृपश्रेष्ठ ! यदि क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणत्व प्राप्त करना चाहे तो वह किस उपाय से उसे पा सकता है ? यह मुझे बताइये ॥ ३ ॥ पितामह ! यदि कोई ब्राह्मणत्व पाने की इच्छा करे तो वह उसे तपस्या, महान् कर्म अथवा वेदों के स्वाध्याय आदि किस उपाय से प्राप्त कर सकता है ? ॥ ४ ॥ 

*पितामह उत्तर*

भीष्म जी ने कहा-तात युधिष्ठिर ! क्षत्रिय आदि तीन वर्णो के लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि यह समस्त प्राणियों के लिये सर्वोत्तम स्थान है ॥ ५ ॥ तात ! बहुत-सी योनियों में बारंबार जन्म लेते-लेते कभी किसी समय संसारी जीव ब्राह्मण की योनि में जन्म लेता है॥६॥ युधिष्ठिर ! इस विषयमें जानकार मनुष्य मतङ्ग और गर्दभी के संवादरूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं ॥ ७ ॥ तात ! पूर्वकालमें किसी ब्राह्मण के एक मतङ्ग नामक पुत्र हुआ, जो (अन्य वर्णके पुरुष से उत्पन्न होने पर भी ब्राह्मणोचित संस्कारों के प्रभाव से) उनके समान वर्ण का ही समझा जाता था, वह समस्त सद्गुणों से सम्पन्न था ॥ ८ ॥ शत्रुओं को संताप देने वाले कुन्तीकुमार ! एक दिन अपने पिता के भेजने पर मतङ्ग किसी यजमान का यज्ञ कराने के लिये गधौ से जुते हुए शीघ्रगामी रथपर बैठकर चला ॥ ९ ॥ राजन् ! रथ का बोझ ढोते हुए एक छोटी अवस्था के गधे को उसकी माता के निकट ही मतङ्ग ने बारंबार चाबुक से मारकर उसकी नाक में घाव कर दिया ॥ १० ॥पुत्र का भला चाहने वाली गधी उस गधे की नाक में दुस्सह घाव हुआ देख उसे समझाती हुई बोली-बेटा ! शोक न करो । तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण नहीं, चाण्डाल सवार है ॥ ब्राह्मण में इतनी क्रूरता नहीं होती। ब्राह्मण सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला बताया जाता है। जो समस्त प्राणियों को उपदेश देनेवाला आचार्य है, वह कैसे किसी पर करेगा ? ।। १२ ।। यह स्वभाव से ही पापात्मा है; इसीलिये दूसरे के बच्चे पर दया नहीं करता है। यह अपने इस कुकृत्य द्वारा अपनी चाण्डाल योनि का ही सम्मान बढ़ा रहा है। जातिगत स्वभाव ह्री मनोभाव पर नियन्त्रण करता है ॥ १३ ॥ गधी का यह दारुण वचन सुनकर मतङ्ग तुरंत रथ से उतर पड़ा और गधी से इस प्रकार बोला-॥ १४ ॥ “कल्याणमयी गर्दभी ! बता, मेरी माता किससे कलङ्कित हुई है ? तू मुझे चाण्डाल कैसे समझती है ? शीघ्र मुझसे सारी बात बता ॥ १५ ॥ गधी ! तुझे कैसे मालूम हुआ कि मैं चाण्डाल हूँ । किस कर्म से मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ है ? तू बड़ी समझदार है; अतः ये सारी बातें मुझे ठीक-ठीक बता ॥ १६ ॥ गदही बोली-मतङ्ग ! तू यौवन के मद से मतवाली हुई एक ब्राह्मणी के पेट से शूद्रजातीय नाई द्वारा पैदा किया गया, इसीलिये तू चाण्डाल है और तेरी माता के इसी व्यभिचार कर्म से तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है ॥ १७ ॥ गदहीके ऐसा कहने पर मतङ्ग फिर अपने घर को लौट गया। उसे लौटकर आया देख पिता ने इस प्रकार कहा-॥ १८॥ बेटा ! मैंने तो तुम्हें यज्ञ कराने के भारी कार्य पर लगा रखा था, फिर तुम लौट कैसे आये ? तुम कुशल से तो हो न ? ।। १९ ।। मतङ्ग ने कहा-पिताजी ! जो चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुआ है अथवा उससे भी नीच योनि में पैदा हुआ है, वह कैसे सकुशल रह सकता है । जिसे ऐसी माता मिली हो, उसे कहाँ से कुशल प्राप्त होगी ॥ २० ॥ पिताजी ! यह मानवेतर योनि में उत्पन्न हुई गदही मुझे ब्राह्मणी के गर्भ से शूद्र द्वारा पैदा हुआ बता रही है; इसलिये अब मैं महान् तप में लग जाऊँगा ॥ २१ ॥ पिता से ऐसा कहकर मतङ्ग तपस्या के लिये दृढ़ निश्चय करके घर से निकल पड़ा और एक महान् वन में जाकर वहाँ बडी भारी तपस्या करने लगा ॥ २२ ॥ तपस्या में संलग्न हो मतङ्ग ने देवताओं को संतप्त कर दिया । वह भलीभाँति तपस्या करके सुख से ही ब्राह्मणत्वरूपी अभीष्ट स्थान को प्राप्त करना चाहता था ॥ २३ ॥ उसे इस प्रकार तपस्या में संलग्न देख इन्द्र ने कहा -- मतङ्ग ! तुम क्यों मानवीय भोगों का परित्याग करके तपस्या कर रहे हो ? ॥ २४ ॥ मैं तुम्हें वर देता हूँ । तुम जो चाहते हो, उसे प्रसन्नतापूर्वक माँग लो । तुम्हारे हृदय में जो कुछ पाने की अभिलाषा है, वह् सब शीघ्र बताओ’ ।। २५ ।। मतङ्ग ने कहा-मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की इच्छा से यह तपस्या प्रारम्भ की है। उसे पा करके ही यहाँ से जाऊँ, मैं यही वर चाह्ता हूँ ॥ २६ ॥ भीष्म जी कहते हैं-भारत ! मतङ्ग की यह बात सुनकर इन्द्रदेव ने कहा–“मतङ्ग ! तुम जो ब्राह्मणत्व माँग रहे हो, यह तुम्हारे लिये दुर्लभ है ॥ २७ ॥ जिनका अन्त:करण शुद्ध नहीं है अथवा जो पुण्यात्मा नहीं हैं, उनके लिये ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असम्भव है। दुर्बुद्धे ! तुम ब्राह्मणत्व माँगते-माँगते मर जाओगे तो भी वह नहीं मिलेगा; अतः इस दुराग्रह से जितना शीघ्र सम्भव हो निवृत्त हो जाओ ॥ २८ ॥ सम्पूर्ण भूतों में श्रेष्ठता ही ब्राह्मणत्व है और यही तुम्हारा अभीष्ट प्रयोजन है, परंतु यह तप उस प्रयोजन को सिद्ध नहीं कर सकता; अतः इस श्रेष्ठ पद की अभिलाषा रखते हुए तुम शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ॥ २९ ॥ देवताओं, असुरों और मनुष्यों में भी जो परम पवित्र माना गया है, उस ब्राह्मणत्व को चाण्डालयोनि में उत्पन्न हुआ मनुष्य किसी तरह नहीं पा सकता ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वण दानधर्मपर्व इन्द्रमतङ्गसंवादे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

भीष्मजी कहते हैं-राजन्! इन्द्र के ऐसा कहने पर मतङ्ग का मन और भी दृढ़ हो गया । वह संयमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने लगा। अपने धैर्य से च्युत न होनेवाला मतङ्ग सौ वर्षों तक एक पैर से खड़ा रहा ॥ १ ॥ तब महायशस्वी इन्द्र ने पुनः आकर उससे कहा- तात ! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है । उसे माँगने पर भी पा न सकोगे ॥ २ ॥ मतङ्ग ! तुम इस उत्तम स्थान को माँगते-मोंगते मर जाओगे । बेटा ! दु:साहस न करो । तुम्हारे लिये यह धर्म का मार्ग नहीं है ॥ ३ ॥ दुर्मते ! तुम इस जीवन में ब्राह्मणत्व नहीं पा सकते । उस अप्राप्य वस्तु के लिये प्रार्थना करते-करते शीघ्र ही काल के गाल में चले जाओगे ॥ ४ ॥ मतङ्ग ! मैं तुम्हें बार-बार मना करता हूँ तो भी उस उत्कृष्ट स्थान को तुम तपस्या द्वारा प्राप्त करने की अभिलाषा करते ही जाते हो । ऐसा करने से सर्वथा तुम्हारी सत्ता मिट जायगी ॥ ५ ॥ पशु-पक्षी की योनि में पड़े हुए सभी प्राणी यदि कभी मनुष्ययोनि में जाते हैं तो पहले पुल्कस या चाण्डाल के रूप में जन्म लेते हैं-इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥ मतङ्ग ! पुल्कस या जो कोई भी पापयोनि पुरुष यहाँ दिखायी देता है, वह सुदीर्घकाल तक अपनी उसी योनि में चक्कर लगाता रहता है ॥ ७ ॥ तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतने पर वह चाण्डाल या पुल्कस शूद्र योनि में जन्म लेता है और उसमें भी अनेक जन्मों तक चक्कर लगाता रहता है ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् तीस गुना समय बीतने पर वह वैश्य योनि में आता है और चिरकाल तक उसी में चक्कर काटता रहता है ॥ ९ ॥ इसके बाद साठ  गुना समय बीतने पर वह क्षत्रिय की योनि में जन्म लेता है। फिर उससे भी साठ गुना समय बीतने पर वह गिरे हुए ब्राह्मण के घर में जन्म लेता है ॥ १० ॥दीर्घकाल तक ब्राह्मणाधम रहकर जब उसकी अवस्था परिवर्तित होती है, तब वह अस्त्र-शस्त्रों से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेता है॥ ११ ॥ फिर चिरकाल तक वह उसी योनि में पड़ा रहता है। तदनन्तर तीन सौ वर्ष का समय व्यतीत होने पर वह गायत्री  मात्र का जप करने वाले ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेता है ॥ १२ ॥ उस जन्म को पाकर वह चिरकाल तक उसी योनि में जन्मता-मरता रहता है। फिर चार सौ वर्षों का समय व्यतीत होनेपर वह श्रोत्रिय ( वेदवेत्ता ) ब्राह्मण के कुल में जन्म लेता है और उसी कुल में चिरकाल तक उसका आवागमन होता रहता है ॥ १३ ॥ बेटा ! इस प्रकार शोक-हर्ष, राग-द्वेष, अतिमान और अतिवाद आदि दोषों का अधम द्विजके भीतर प्रवेश होता है॥ १४ ॥ यदि वह इन शत्रुओंको जीत लेता है तो सद्गति को प्राप्त होता है और यदि वे शत्रु ही उसे जीत लेते हैं तो ताड़ के वृक्षके ऊपर से गिरने वाले फल की भाँति वह नीचे गिरा दिया जाता है ॥ १५ ॥ मतङ्ग ! यही सोचकर मैंने तुमसे कहा था कि तुम कोई दूसरी अभीष्ट वस्तु माँग लो; क्योंकि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १६ ॥ 

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि  इन्द्रमतङ्गसंवादे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

भीष्म जी कहते हैं-युधिष्ठिर ! इन्द्र के ऐसा कहने पर मतङ्ग अपने मन को और भी दृढ़ और संयमशील बनाकर एक हजार वर्षों तक एक पैर से ध्यान लगाये खड़ा रहा ॥ १ ॥ जब एक हजार वर्ष पूरे होने में कुछ ही काल बाकी था, उस समय बल और वृत्रासुर के शत्रु देवराज इन्द्र फिर मतङ्ग को देखने के लिये आये और पुनः उससे उन्होंने पहले की कही डुई बात ही दुहरायी ॥ २ ॥ मतङ्ग ने कहा-देवराज ! मैंने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक एकाग्रचित हो एक हजार वर्षों तक एक पैर से खड़ा होकर तप किया है। फिर मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं प्राप्त हो सकता?॥ इन्द्रने कहा--मतङ्ग ! चाण्डाल की योनि में जन्म लेने वाले को किसी तरह ब्राह्मणत्व नहीं मिल सकता; इसलिये तुम दूसरी कोई अभीष्ट वस्तु माँग लो  जिससे तुम्हारा यह _काम व्यर्थ न जाय ।। ४ ।। उनके ऐसा कहने पर मतङ्ग अत्यन्त शोकमग्न हो गया में जाकर अंगूठे के बलपर सौ वर्षों तक खड़ा रहा ॥ ५ ॥ उसने दुर्धर योग का अनुष्ठान किया । उसका सारा शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया । नस-नाड़ियाँ उघड़ आयीं । धर्मात्मा मतङ्ग का शरीर चमड़े से ढकी हुई हड्डियों का ढाँचामात्र रह गया । उस अवस्था में अपने को न संभाल सकने के कारण वह गिर पड़ा, यह बात हमारे सुनने में आयी है॥६॥ उसे गिरते देख सम्पूर्ण भूतों के हित में तत्पर रहनेवाले वर देने में समर्थ इन्द्र ने दौड़कर पकड़ लिया ॥ ७ ॥ इन्द्र ने कहा-मतङ्ग ! इस जन्म में तुम्हारे लिये ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असम्भव दिखायी देती है । ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है; साथ ही वह कामक्रोध आदि लुटेरों से घिरा हुआ है ॥ ८ ॥ जो ब्राह्मण का आदर करता है, वह सुख पाता है और जो अनादर करता है, वह दु:ख पाता है । ब्राह्मण समस्त प्राणियों को योगक्षेम की प्राप्ति कराने वाला है ॥ ९ ॥ मतङ्ग ! ब्राह्मणों के तृप्त होने से ही देवता और पितर भी तृप्त होते हैं। ब्राह्मण को समस्त प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। ब्राह्मण जो-जो जिस प्रकार करना चाहता है, अपने तप के प्रभाव से वैसा ही कर सकता है। तात ! जीव इस जगत् के भीतर अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ बारंबार जन्म लेता है । इसी तरह जन्म लेते-लेते कभी किसी समय में वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥ अतः जिनका मन अपने वश में नहीं है, ऐसे लोगों के लिये सर्वथा दुष्प्राप्य ब्राह्मणत्व को पाने का आग्रह छोड़कर तुम कोई दूसरा ही वर माँगो । यह वर तो तुम्हारे लिये दुर्लभ ही है ॥ १२ ॥ मतङ्ग ने कहा-देवराज ! मैं तो यों ही दुःख से आतुर हो रहा हूँ, फिर तुम भी क्यों मुझे पीड़ा दे रहे हो ? मुझ मरे हुए को क्यों मारते हो ? मैं तो तुम्हारे लिये शोक करता हूँ, जो जन्म से ही ब्राह्मणत्व को पाकर भी तुम उसे अपना नहीं रहे हो ॥ १३ ॥शतक्रतो । यदि क्षत्रिय आादि तीन वर्णो के लिये ब्राह्मणत्व दुर्लभ है तो उस परम दुर्लभ ब्राह्मणत्व को पाकर भी मनुष्य ब्राह्मणोचित शम-दम का अनुष्ठान नहीं करते हैं । यह कितने दुःख की बात है ! ॥ १४ ॥ वह पापियों से भी बढ़कर अत्यन्त पापी और उनमें भी अधम ही है, जो दुर्लभ धन की भाँति ब्राह्मणत्व को पाकर भी उसके महत्त्व को नहीं समझता है॥ १५ ॥ पहले तो ब्राह्मणत्व का प्राप्त होना ही कठिन है । यदि वह प्राप्त हो जाय तो उसका पालन करना और भी कठिन हो जाता है; किंतु बहुत से मनुष्य इस दुर्लभ वस्तु को पाकर भी तदनुकूल आचरण नहीं करते हैं ॥ १६॥ शक्र ! मैं एकान्त में आनन्दपूर्वक रहता हूँ तथा द्वन्द्वों और परिग्रहों से दूर हूँ। अहिंसा और दम का पालन किया करता हूँ। ऐसी दशा में मैं ब्राह्मणत्व पाने योग्य क्यों नहीं हूँ ? ॥ पुरंदर ! मैं धर्मज्ञ होकर भी केवल माता के दोष से इस अवस्था में आ पहुँचा हूँ। यह मेरा कैसा दुर्भाग्य है ? प्रभो ! निश्चय ही पुरुषार्थ के द्वारा दैव का उल्लङ्घन्  नहीं किया जा सकता; क्योंकि मैं जिसके लिये ऐसा प्रयत्नशील हूँ, उस ब्राह्मणत्व को नहीं उपलब्ध कर पाता हूँ । धर्मज्ञ देवराज ! यदि ऐसी अवस्था में मैं आपका कृपापात्र हूँ अथवा यदि मेरा कुछ भी पुण्य शेष हो तो आप मुझे वर प्रदान कीजिये ॥ २० ॥ 
वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय ! तब बल और वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्र ने मतङ्क से कहा-तुम मुझसे वर माँगो। महेन्द्र से प्रेरित होकर मतङ्ग ने इस प्रकार कहा-॥२१ ।। देव पुरंदर ! आप ऐसी कृपा करें, जिससे मैं इच्छानुसार विचरने वाला तथा अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाला आकाशचारी देवता होऊँ । ब्राह्मण और क्षत्रियों के विरोध से रहित हो मैं सर्वत्र पूजा एवं सत्कार प्राप्त करूँ तथा मेरी अक्षय कीर्ति का विस्तार हो । मैं आपके चरणों में मस्तक रखकर आपकी प्रसन्नता चाहता हूँ । आप मेरी इस प्रार्थना सफल बनाईये। इन्द्र ने कहा- वत्स ! तुम स्त्रियों के पूजनीय होओगे । । छन्दोदेव के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी और तीनों लोकों में  तुम्हारी अनुपम कीर्ति का विस्तार होगा ॥ २४ ॥ इस प्रकार उसे वर देकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये। मतङ्ग भी अपने प्राणों  का परित्याग करके उत्तम स्थान ( ब्रह्म लोक) को प्राप्त हुआ ॥ २५ ॥ भारत ! इस तरह यह ब्राह्मणत्व परम उत्तम स्थान है। जैसा कि इन्द्र का कथन है, उसके अनुसार यह इस जीवन में दूसरे वर्ण के लोगों के लिये दुर्लभ है ॥ २६ ॥ 

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

Friday, June 25, 2021

सत्यनारायण व्रत कथा

प्रथम अध्याय 
सत्यनारायण व्रत कथा का पूरा सन्दर्भ यह है कि पुराकालमें शौनकादिऋषि नैमिषारण्य स्थित महर्षि सूत के आश्रम पर पहुँचे। ऋषिगण महर्षि सूत से प्रश्न करते हैं कि लौकिक कष्टमुक्ति, सांसारिक सुख समृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य की सिद्धि के लिए सरल उपाय क्या है? महर्षि सूत शौनकादिऋषियों को बताते हैं कि ऐसा ही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से किया था। भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि लौकिक क्लेशमुक्ति, सांसारिक सुखसमृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य सिद्धि के लिए एक ही राजमार्ग है, वह है सत्यनारायण व्रत। सत्यनारायण का अर्थ है सत्याचरण, सत्याग्रह, सत्यनिष्ठा। संसार में सुखसमृद्धि की प्राप्ति सत्याचरणद्वारा ही संभव है। सत्य ही ईश्वर है। सत्याचरण का अर्थ है ईश्वराराधन, भगवत्पूजा।

कथा का प्रारम्भ सूत जी द्वारा कथा सुनाने से होता है। नारद जी भगवान श्रीविष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति करते हैं। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउँगा।

नारद जी बोले - भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। उसे बतायें।

श्री भगवान ने कहा - हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूँ, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूँ। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्री भगवान ने कहा - यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और सन्तान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूँ का चूर्ण अथवा गेहूँ के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ - यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।

दूसरा अध्याय 
श्रीसूतजी बोले - हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भली भाँति विस्तारपूर्वक कहूँगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा - हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं।

ब्राह्मण बोला - प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूँ और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूँ। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये।

वृद्ध ब्राह्मण बोला - हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूँगा’ - यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी।

अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया।

हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं?

हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।

श्री सूत जी बोले - मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहाँ आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला - प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये।

विप्र ने कहा - यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूँगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहाँ धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया।

इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूँ का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।

तीसरा अध्याय 
श्री सूतजी बोले - श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहाँ आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा।

साधु ने कहा - राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूँ।

राजा बोले - हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूँ।

राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा - राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूँगा। मुझे भी सन्तति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही सन्तति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से सन्तति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा - ‘जब मुझे सन्तति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा’ - इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा।

एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रम की भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा - आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं?

साधु बोला - ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भाँति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ - ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ सन्तुष्ट चित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया।

उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और पअने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोों राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ - यह शाप दे दिया।

एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहाँ आ गये जहां वह साधु वणिक था। वहाँ राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बाँधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले - ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बाँधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया।

भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी।

माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा - पुत्री ! रात में तू कहाँ रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा - माँ! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की - ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें। वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायें।’ इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः सन्तुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा - ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।’

राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा - ‘दोनों बन्दी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’ राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले - ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके।

राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को सन्तुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया। पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा - ‘साधो! अब आप अपने घर को जायें।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ - ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

चौथा अध्याय 
श्रीसूत जी बोले - साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई - ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हँसते हुए कहा - ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर - ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ - ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये।

दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा - ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहाँ दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा - आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें - ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया।

दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा - ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा।

साधु ने कहा - ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये।

भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ - ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा - ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत कोअपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा।

उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’ माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया।

इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा - यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी।

कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा - या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूँगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा - ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं।

कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा - ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र सन्तुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।

पाँचवाँ अध्याय 
श्रीसूत जी बोले - श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बाद वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ।

उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ।

श्रीसूत जी कहते हैं - जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है - यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें।

महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे सेचीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया।

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा पूर्ण हुई 
बोलो श्री सत्यनारायण भगवान की जय