Saturday, May 22, 2021

विवाहमें_भांवर_फेरे_कितने_होने_चाहिए_३_या_४_अथवा_७

#विवाहमें_भांवर_फेरे_कितने_होने_चाहिए_३_या_४_अथवा_७

(आचार्य सियाराम दास नैयायिक द्वारा)

आज कल विवाह में कहीं तो 7 फेरों का प्रचलन है तो कहीं 4 का ,  इस विषय पर बहुत विवाद सुनने में आ रहा है । राजस्थान, गुजरात और मिथिला आदि प्रान्तों में कई स्थानों में 4 फेरों की परम्परा है और उत्तर प्रदेश आदि कुछ प्रान्तों के कतिपय स्थलों में 7 फेरों की परम्परा | कई  कुछ वैश्य परिवारों में मात्र ३ फेरे ही पंडितों पर दबाव डालकर कराये जाते हैं |

*हम यहां सप्रमाण यह तथ्य प्रस्तुत करेंगे कि “फेरे कितने होने चाहिए ।*

यहां एक बात ध्यान में अवश्य रखनी है कि सभी बातें शास्त्रों में ही उपलब्ध नहीं होती हैं ।

 जैसे — वर वधू का मंगलसूत्र पहनाना,गले में माला धारण करवाना, वर वधू के वस्त्रों में ग्रन्थि लगाना ( गांठ बांधना ),वर के हृदय पर दही आदि का लेपन, ऐसे बहुत से कार्य हैं जो गृह्यसूत्रों में उपलब्ध नही हैं । इन सब कार्यों में कौन प्रमाण है ?

इसका उत्तर है –”अपने अपने कुल की वृद्ध महिलायें ;क्योंकि वे अपने पूर्वजों से किये गये सदाचारों का स्मरण रखती हैं । इसलिए विवाहादि कार्यों में इनकी बात मानने का विधान शास्त्रों ने किया है ।

देखें —शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन और काण्व शाखा इन दोनों का प्रतिनिधित्व करता है |महर्षि पारस्कर प्रणीत ” पारस्करगृह्यसूत्र” में महर्षि कहते हैं –

“ग्रामवचनं च कुर्युः”-।। 11।।

“विवाहश्मशानयोर्ग्रामं प्राविशतादिति वचनात् ‘।।12।। “तस्मात्तयोर्ग्रामः प्रमाणमिति श्रुतेः ।।13।।–प्रथमकाण्ड, अष्टमी कण्डिका ।

 यहां 11वें सूत्र का अर्थ “हरिहरभाष्य” में किया गया है कि “विवाह और श्मशान सम्बन्धी कार्यों में ( ग्रामवचनं = स्वकुलवृद्धानां स्त्रीणां वाक्यं कुर्युः ) अपने कुल की वृद्ध महिलाओं की बात मानकर कार्य करना चाहिए ।

“गदाधरभाष्यकार”भी यही अर्थ किये हैं । इनमें कुछ बातें जैसे “मंगलसूत्र आदि” इनका उल्लेख इसी भाष्य के आधार पर मैने किया है ।

 सूत्र11 में ” च ” शब्द आया है । उससे “देशाचार, कुलाचार और जात्याचार ” का ग्रहण है ।

 “चकारोऽनुक्तसमुच्चयार्थकः –च शब्द जो बातें नहीं कहीं गयी हैं -उनका संकेतक माना जाता है । अत एव ” च शब्दाद्देशाचारोऽपि ” –ऐसा भाष्य श्रीगदाधर जी ने लिखा ।

 यहां “अपि” शब्द कैमुत्यन्याय से कुलाचार और जात्याचार का बोधक है ;क्योंकि विवाहादि कार्यों मेंजाति और कुल के अनुसार भी आचार में भिन्नता कहीं कहीं देखने को मिलती है ।

ग्रामवचन का अर्थ “भर्तृयज्ञ ” जो कात्यायन श्रौतसूत्र के व्याख्याता हैं उन्होने लोकवचन किया है –

ऐसा गदाधर जी ने अपने भाष्य में संकेत किया है । इसे लोकमत या शिष्टाचार — सदाचार कहते हैं । यह भी हमारे यहां प्रमाणरूप से अंगीकृत है ।

पूर्वमीमांसा में सर्वप्रथम प्रमाणों की ही विशद चर्चा हुई है । इसलिए उस अध्याय का नाम ही” प्रमाणाध्याय” रख दिया गया है । इसमें शिष्टाचार को प्रमाण माना गया है । शिष्ट का लक्षण वहां निरूपित है ।

“वेदः स्मृतिः सदाचारः” –मनुस्मृति,2/12,

तथा “श्रुतिःस्मृतिः सदाचारः “–याज्ञवल्क्य स्मृति-आचाराध्याय,7, इन दोनों में सदाचार को धर्म में प्रमाण माना है ।

किन्तु धर्म में परम प्रमाण भगवान् वेद ही हैं । उनसे विरुद्ध समृति या सदाचार प्रमाण नही हैं । पूर्वमीमांसा में वेदैकप्रमाणगम्य धर्म को बतलाया गया –जैमिनिसूत्र-1/1/2/2,

पुनः ” स्मृत्यधिकरण “-1/3/1/2, से वेदमूलक स्मृतियों को धर्म में प्रमाण माना गया ।

यदि कोई स्मृति वेद से विरुद्ध है तो वह धर्म में प्रमाण नही हो सकती –यह सिद्धान्त “विरोधाधिकरण”-1/3//2/3-4, से स्थापित किया गया ।

इसी अधिकरण में सदाचार की प्रामाणिकता को लेकर यह निश्चित किया गया कि सदाचार स्मृति से विरुद्ध होने पर प्रमाण नही है । ( इस बात का ध्यान आप सब सुधी  जन वाल्मीकि रामायण का प्रमाण पढ़ते समय अवश्य ध्यान में रखियेगा |)

 जैसे दक्षिण भारत में मामा की लड़की के साथ भांजे का विवाह आदि ;क्योंकि यह सदाचार

“मातुलस्य सुतामूढ्वा मातृगोत्रां तथैव च । समानप्रवरां चैव त्यक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् । ।”

इस शातातप स्मृति से विरुद्ध है । भागवत के 10/61/23-25 श्लोकों द्वारा इस विवाहरूपी कार्य को अधर्म बतलाया गया है ।। अस्तु।।

 तात्पर्य यह कि सदाचार से उसकी ज्ञापक स्मृति का अनुमान किया जाता है और उस स्मृति से तद्बोधक श्रुति का अनुमान । जब आचार की विरोधिनी स्मृति बैठी है तो उससे वह बाधित हो जायेगा । इसी प्रकार स्मृति भी स्वतः धर्म में प्रमाण नही है अपितु वेदमूलकत्वेन ही प्रमाण है ।

  स्मृति से श्रुति का अनुमान किया जाता है । जब स्मृति विरोधिनी श्रुति प्रत्यक्ष उपलब्ध है तो उससे स्मृति बाधित हो जायेगी –

 ”विरोधे त्वनुपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्”–पूर्वमीमांसा,1/3/2/3,

सदाचार से स्मृति और स्मृति से श्रुति का अनुमान होता है । इन तीनों में श्रुति से स्मृति और स्मृति से सदाचार रूपी प्रमाण दुर्बल है । निष्कर्ष यह कि स्मृति या वेदविरुद्ध आचार प्रमाण नही है ।

 अब हम यह देखेंगे कि विवाह में जो फेरे पड़ते हैं – ३-4 या 7, इनमें किसको स्मृति या वेद का समर्थन प्राप्त है और कौन इनसे विरुद्ध है ?

यहां यह बात ध्यान में रखनी है कि स्मृति का अर्थ केवल मनु या याज्ञवल्क्य आदि महर्षियों से प्रणीत स्मृतियां ही नहीं अपितु सम्पूर्ण धर्मशास्त्र है —

“श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः “–2/10,

धर्मशास्त्र के अन्तर्गत स्मृतियां ,पुराण,इतिहास,कल्पसूत्र आदि आते हैं –यह मीमांसकों का सिद्धान्त है — स्मृत्यधिकरण,1/3/1/1-2,

इसी से ३ या  4 अथवा  7 फेरों का निश्चय हो जायेगा ।

 विवाह में 4 कर्म ऐसे हैं जिनसे फेरों का सम्बन्ध है । अर्थात् उन चारों का क्रमशः सम्पादन करने के बाद फेरे( परिक्रमा या भांवर ) का क्रम आता है । वे निम्नलिखित हैं —

1-लाजा होम—

इसमें कन्या को उसका भाई शमी के पल्लवों से मिश्रित धान के लावों को अपनी अञ्जलि से कन्या के अञ्जलि में डालता है । कन्या उस समय खड़ी रहती है ।

यदि कन्या के भाई न हो तो यह कार्य उसके चाचा ,मामा का लड़का ,मौसी का पुत्र या फुआ( बुआ -फूफू अर्थात् पिता की बहन ) का पुत्र आदि भी कर सकते हैं–

 यह तथ्य श्रीगदाधर जी ने बहवृचकारिका को उद्धृत करके अपने भाष्य में दर्शाया है ।

पारस्करगृह्यसूत्र के प्रथम काण्ड की छठी कण्डिका में “कुमार्या भ्राता –”–1 में इसका कथन है ।

 कन्या के अञ्जलि में लावा है । वर भी खड़ा होकर उसके दोनों हाथों से अपने हाथ लगाये रहता है और कन्या खड़ी होकर ही उन लावों को मिली हुइ अञ्जलि से होम करती है –अर्यमणं देवं –इत्यादि मन्त्रों से ।

 ये तीनों मन्त्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । अतः इनका अर्थ प्रस्तुत किया जा रहा है –

1-अर्यमणं देवं– सूर्य देव, जो ,अग्निं –अग्निस्वरूप हैं ,उनकी वरप्राप्ति के लिए, अयक्षत –पूजा की है,स–वे,अर्यमा देवः–भगवान् सूर्य, नो–हमें,इतः–इस पितृकुल से , प्रमुञ्चतु –छुड़ायें, किन्तु ,पत्युः –पति से ,मा –न छुड़ायें , स्वाहा — इतना बोलकर कन्या होम करती है ।

आज इस पद्धति का विधिवत् आचरण न करने का परिणाम इतना भयंकर दिख रहा है कि पति या तो पत्नी को छोड़ देता है अथवा पत्नी पति को ।

 2-मन्त्र –” आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा।

अर्थ– मे पतिः –मेरे पति, आयुष्मानस्तु –दीर्घायु हों,और मम– मेरे ,ज्ञातयो– बन्धु बान्धव,एधन्तां –बढ़ें ,स्वाहा बोलकर पुनः होम ।

विवाह में इस मन्त्र के छूट जाने का पहला परिणाम “पति असमय ही किसी भी कारण से अकालमृत्यु को प्राप्त होता है । या मृत्यु जैसे कष्टकारी रोगों से आक्रान्त हो जाता है । और पत्नी के पतिगृह पहुंचने के कुछ समय बाद ही बंटवारे की नौबत भी आ जाती है । जो आजकल का तथाकथित सभ्य समाज भुगत रहा है ।

 3 मन्त्र –” इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ समृद्धिकरणं तव । मम तुभ्य च संवननं तदग्निरनुमन्यतामियं

स्वाहा ।

हे स्वामिन् ! , तव –तुम्हारी , समृद्धिकरणं –समृद्धि करने के लिए, इमाँल्लाजान् –इन लावों को ,अग्नौ –अग्नि में , आवपामि –मैं डाल रही हूं । मम तुभ्य च — हमारा और तुम्हारा , जो, संवननं –पारस्परिक प्रेम है , तत् –उसका , ये, अग्निः–अग्नि देव, अनुमन्यन्ताम्—अनुमोदन करें अर्थात् सदृढ करें , और, इयं –अग्नि की पत्नी स्वाहा भी , स्वाहा –बोलकर पुनः होम । इस मन्त्र से होम किया जाता है कि दाम्पत्य जीवन सदा प्रेम से संसिक्त रहे ।

पर आज जो पण्डित आधे घण्टे में विवाह करा दे उसे कई शहरों में बहुत अच्छा मानते हैं । इस मन्त्र से होम न करने का परिणाम है –दाम्पत्य जीवन का कलहमय होना ।

अतः विवाहोपरान्त भविष्य में आने वाले इन सभी संकटों को रोकने के लिए हमारे ऋषियों ने हमें जो कुछ दिया । उसकी अवहेलना का परिणाम आज घर घर में किसी न किसी रूप में दिख रहा है ।

अतः वेदों के इन पद्धतियों की वैज्ञानिकता और आदर्श समाज की रचना के इन अद्भुत प्रयोगों को हमें पुनः अपनाना होगा ।

 2-सांगुष्ठग्रहण–यह कर्म लाजा होम के बाद वर द्वारा किया जाता है । वह वधू का दांया हाथ अंगूठे सहित पकड़ता है । और ” गृभ्णामि से शरदः शतम् ” तक मन्त्र पढ़ता है ।

 इस मन्त्र से वर वधू में देवत्व का आधान होता है । तथा बहुत से पुत्रों के प्राप्ति की प्रार्थना की गयी है ।

 पुत्र वही है जो पुत् नामक नरक से तार दे -पुत् नामकात् नरकात् त्रायते इति पुत्रः ।

 इस मन्त्र के छूटने का परिणाम यह है कि आज कल लड़के अपने माता पिता का जीवन नरकमय बना रहे है । तारना तो दूर की बात है ।

3-अश्मारोहण– अग्निकुण्ड के उत्तर की ओर रखे हुए ” पत्थर ” ( लोढ़ा आदि) के समीप जाकर वर वधू के दायें पैर को पकड़कर उस पर रखता है ।

श्रीगदाधर ने अपने भाष्य मे सप्रमाण इसका उल्लेख किया है । और मिथिला मे यह आज भी वर द्वारा किया जाता है |

इस समय वर स्वयं मन्त्र पढ़ता है–”आरोहे से लेकर पृतनायत ” तक ।

 इस मन्त्र का अर्थ है कि कन्ये !तुम इस पत्थर पर आरूढ होकर इस प्रस्तर की भांति दृढ़ हो जाओ । और कलह चाहने वालों को दबाकर स्थिर रहो । और उन शत्रुओं को दूर हटा दो ।

 यह कर्म कन्या द्वारा आज भी U.P आदि में देखा जाता है । कन्या उस लोढ़े को पैर के अंगूठे से प्रहार करके  फेंक देती है ।

यह कर्म अद्भुत भाव से ओतप्रोत है । यह कन्या को हर विषम परिस्थितियों में अविचल भाव देने के साथ ही शत्रुदमन की अदम्य ऊर्जा भी प्रदान करता है ।

4-गाथागान — इसमें एक मन्त्र का गान वर करता है जिसमें नारी के उदात्त व्यक्तित्व की सुन्दर झलक है ।

 5- परिक्रमा या फेरे — अब वर वधू अग्नि की परिक्रमा करते हैं । इस समय वर –

 ”तुभ्यमग्रे से लेकर प्रजया सह ” तक 1 मन्त्र बोलता है ।

 1 परिक्रमा (फेरा ) अब पूर्ण हुई |

 इसी प्रकार पुनः पूर्ववत् लाजाहोम, सांगुष्ठग्रहण, अश्मारोहण, गाथागान और 1 परिक्रमा करनी है ।

 तत्पश्चात् पुनः वही लाजाहोम से लेकर 1 परिक्रमा तक पूर्वकी भांति सभी कर्म करना है ।

इसका संकेत प्रथम काण्ड की सप्तमी कण्डिका में शुक्लयजुर्वेद के सूत्रकार महर्षि पारस्कर अपने गृह्यसूत्र में करते हैं —

“एवं द्विरपरं लाजादि ” इसका अर्थ ” हरिहरभाष्य और गदा धरभाष्य ” दोनो में यही किया गया कि

“कुमार्या भ्राता —-” –जहां से लाजाहोम आरम्भ है वहां से परिक्रमा पर्यन्त कर्म होता है ।

 अब यहां हमारे समक्ष लाजा होम से लेकर परिक्रमा पर्यन्त सभी कर्मों का ३ बार अनुष्ठान सम्पन्न हुआ ।

 जिनमें 9 बार लावों की आहुति पड़ी ;क्योंकि १ -१ लाजाहोम में ३ –३ बार कन्या ने पूर्वोक्त मन्त्रों से आहुति दिया है ।

 3 बार सांगुष्ठग्रहण, 3 बार अश्मारोहण, 3 बार गाथागान और 3परिक्रमा (फेरे ) सम्पन्न हो चुकी है ।

 अब चौथी बार केवल लाजा होम  ही करना  है। पर इस चौथे क्रम में पहले से कुछ भिन्नता है ।

 क्या भिन्नता ?

 इसे महर्षि पारस्कर स्वयं सूत्र द्वारा दिखाते हैं —

 ” चतुर्थं शूर्पकुष्ठया सर्वाँल्लाजानावपति–भगाय स्वाहेति। “

 —-पारस्करगृह्यसूत्र,प्रथमकाण्ड,सप्तमीकण्डिका,5,

 कन्या का भाई शूर्प में जो भी लावा बचा है वह सब सूप के कोने वाले भाग से कन्या के अञ्जलि में दे दे और कन्या सम्पूर्ण लावों को ” भगाय स्वाहा “बोलकर अग्नि में होम कर दे ।

 इसके बाद मौन होकर वर और वधु अग्नि की परिक्रमा करते हैं –इसमें “सदाचार “ही प्रमाण है | अर्थात् शास्त्र प्रमाण इसमें नहीं मिलता –

 देखें हरिहरभाष्यकार लिखते है –

 ” ततः समाचारात्तूष्णीं चतुर्थं परिक्रमणं वधूवरौ कुरुतः “|

 इसे सर्वसम्मत पक्ष बतलाते हुए गदाधर भाष्य में “वासुदेव ,गंगाधर ,हरिहर और रेणु दीक्षित जैसे भाष्यकारों के नाम का उल्लेख श्रद्धापूर्वक किया गया है |–प्रथम काण्ड ,सप्तमी कण्डिका,६

किन्तु सदाचार तभी तक प्रमाण है जब तक उसके विरुद्ध कोई स्मृति या श्रुति न हो । और  इस सदाचार के विरुद्ध प्रमाण है ” परम आर्ष ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण”–

” त्रिरग्निं ते परिक्रम्य ऊहुर्भार्या महौजसः”-बालकाण्ड–७३/३९,

महातेजस्वी उन तीनों भाइयों ने तीन बार अग्नि की परिक्रमा करके विवाह किया | अतः इसके विरुद्ध ४ बार भांवर को प्रमाण कैसे माना जाय ?

महर्षि पारस्कर  स्वयं भी चौथी परिक्रमा का नाम नहीं लिए |उन्होंने तो केवल चौथी बार लाजा होम का ही नाम लिया है, परिक्रमा का नहीं–

” चतुर्थं शूर्पकुष्ठया सर्वाँल्लाजानावपति–भगाय स्वाहेति। “

—-पारस्करगृह्यसूत्र,प्रथमकाण्ड,सप्तमीकण्डिका,5,

कन्या का भाई शूर्प में जो भी लावा बचा है वह सब सूप के कोने वाले भाग से कन्या के

अञ्जलि में दे दे और कन्या सम्पूर्ण लावों को ” भगाय स्वाहा “बोलकर अग्नि में होम कर दे ।

आश्चर्य है कि इन विद्वान भाष्यकारों ने शास्त्रविरुद्ध आचार को प्रमाण कैसे मान लिया ? क्योंकि स्मृतिविरुद्ध आचार प्रमाणकोटि में नहीं आता |

अतः पारस्कर गृह्यसूत्र और रामायण के प्रमाण से विवाह में तीन भांवर ( परिक्रमा ) ही सिद्ध होती है |

यह विषय विद्वानों के लिए सुचिन्त्य है |

इस प्रकार शुक्लयजुर्वेद के महर्षि पारस्कररचित ” पारस्करगृह्यसूत्र” और “रामायण” के अनुसार विवाह में ३  फेरे (परिक्रमा )ही प्रमाणसिद्ध है । ४ या 7 फेरे केवल भ्रममात्र हैं । अतः यही मान्य और शास्त्रसम्मत है ।

 यदि कोई कहे कि ४ या  7 फेरों का सदाचार हमारी परम्परा में चला आ रहा है और सदाचार का प्रामाण्य सभी ने स्वीकार किया है । अतः यह ठीक है ।तो मैं उस व्यक्ति से यही कहूंगा कि सदाचार तभी तक प्रमाण है जब तक उसके विरुद्ध कोई स्मृति या श्रुति न हो । अतः इसके विपरीत ४ या 7 फेरों वाला सदाचार प्रमाण नही है ।

Monday, February 8, 2021

बिहार के विद्यालयों मे होने वाला प्रार्थना

बिहार के विद्यालयों मे होने वाला प्रार्थना -
प्रार्थना

तू ही राम है तू रहीम है,
तू करीम,कृष्ण,खुदा हुआ,
तू ही वाहे गुरु,तू ईशू मसीह,
हर नाम में,तू समा रहा ।
तू ही राम है तू रहीम है....

तेरी जात पाक कुरान में,
तेरा दर्श वेद पुराण में,
गुरु ग्रन्थ जी के बखान में,
तू प्रकाश अपना दिखा रहा ।
तू ही राम है तू रहीम है..

अरदास है,कहीं कीर्तन, 

कहीं राम धुन,कहीं आव्हन,
विधि वेद का है ये सब रचन,
तेरा भक्त तुझको बुला रहा ।
तू ही राम है तू रहीम है..

विधि वेश जाति के भेद से हमे मुक्त कर दो परम्पिता

तुझे देख पायें सभी मे हम तुझे ध्या सकें हम सभी जगह।।

तू ही राम है तू रहीम है..

Monday, January 4, 2021

समानता मूलक शासन की स्थापना

एक बार जंगल में मीटिंग हुई जिसमें सवर्मत से निर्णय लिया गया कि समता और समानता मूलक शासन की स्थापना हो, सभी को अवसर मिले और रोटेशन प्रणाली को लागू किया जाय। अर्थात शेर के बाद घोड़ा, हाथी, भेड़, बकरी, सुअर, सियार, लोमड़ी आदि भी राजा बन सकें।

सब में बड़ी खुशी थी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी और अपनी जाति वाला राजा बन सकेगा। कुछ दिन बाद देखा क्या गया कि जब लोमड़ी राजा बना तो सभी महत्वपूर्ण पद लोमड़ी को दिया, जब सियार राजा हुआ तो महत्वपूर्ण पद सियार को मिला। योग्यता को दरकिनार कर दिया गया। वैमनस्यता आधारित शासन हो गया। जब जिसका राजा बनता अपने जाति वाले को ला कर बसा देता।

लोग सामान्य कार्य के लिए भी भष्ट्राचार का सहारा और आगे अपनी जाति के शासक बनने का हवाला देने लगे। धीरे – धीरे जंगल में घुसपैठियों की समस्या बढ़ती गयी। लेकिन अब बहुमत के आधार पर शासक का निर्णय होना भी बीच में तय कर लिया गया। सबसे कम जनसंख्या शेर की थी इसलिए वह स्वयं लोकतंत्र के चक्कर में शासन से दूर हो गया किन्तु उससे अराजकता नहीं देखी जाती, वह जंगल को लेकर चिंतित रहता था।

एक दिन जब वोट के आधार पर लोमड़ी का शासन चल रहा था उसी समय जंगल पर जंगली भैसों का आक्रमण हुआ लोमड़ी के शासन में चौथी पीढ़ी थी। इस समय जो लोमड़ी थी वह बिल्कुल अयोग्य थी किन्तु उसके शासन की आदत और संख्या में अधिक होने के कारण वह सत्ता में थी।

लोमड़ी ने अपने कुनबे को बचाने के एवज में सत्ता भैसों को सौंपने का निर्णय किया। इस समय जंगल में अवैध जानवरों की संख्या काफी बढ़ गयी थी। जो वोट के समय एक बड़े फैक्टर का काम करती थी। उन्होंने नव आयातित भैसों की तरफ झुकाव किया जिससें उनकी स्वीकार्यता बढ़े और शासन में पद भी मिल सके।

धीरे – धीरे वहाँ के कानून परिवर्तित होने लगे। लोभ और लालच चरम पर पहुँच गया, अनुशासन जाता रहा। अब लोकतंत्र था जिसकी संख्या बढ़ती वह सत्ता ले लेता। बड़ी जातियों में भी संख्या बढ़ाने की होड़ मच गई। योग्य सिर्फ चिंता करते और चुप रहते क्योंकि गधों को न्याय व्यवस्था, भेड़िए के हिस्से पुलिस व्यवस्था थी। सत्ता, जनसंख्या और जाति निर्धारित करने लगी थी।

शेर और उसका प्रधानमंत्री हाथी तीर्थ यात्रा के बहाने उस जंगल को छोड़ कर चले गये। अब तो सुना है कौवे को रक्षा मंत्री और उल्लू को संचार का पद मिला है। लोकतंत्र में शेर और हाथी का क्या काम जब गधा हुआ पहलवान।

जंगल में आपराधिक गतिविधियों के साथ जानवरों के गायब होने का सिलसिला शुरू है। रोज मुकदमें होते हैं, न्याय की ढकोसलेबाजी चलती है। पीड़ित के पास धन नहीं है तो न्याय वहीं दम तोड़ देता है। लोकतंत्र का भेड़चाल जातिवाद और राजनीतिक वंशवाद का रूप धर अपने को ठग रहा है किन्तु अयोग्यता को बढ़ाने की जिम्मेदारी सब पर है, विचार का अभाव अराजकता में फंसा देता है।

आज, एक तरफ हम CAA की बात कर रहे हैं, 377 हटा रहे हैं, विवाहेत्तर सम्बन्ध को वैध करके लैस्बियन, ट्रांसजेंडर को अधिकार दे रहे हैं तो दूसरी तरफ निर्भया और हैदराबाद रेप और मर्डर की जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा रहे हैं। जंगल का कानून, मैंने चूड़ियां नहीं पहनी है और समाज की नपुंसकता जैसे स्लोगन ओछे हैं। सिर्फ भेड़चाल है, सत्ता मिलने की और पद कुनबे को देने की, बाकी चलता आया है और चलता रहेगा।
बच्चे मरेंगे, किसान आत्महत्या करेंगे, नारी का रेप होगा, संगठित अपराध जारी रहेगा और सबसे बड़ी बात देश को गाली दीजाएगी, तिरंगे और राष्ट्रगान का अपमान होगा क्योंकि यही शासन है, जहां संवेदना से अधिक वोट और सत्ता महत्वपूर्ण है।
***
इस पोस्ट के लेखक :
Dhananjay Gangay

Saturday, January 2, 2021

विविध देवों के गायत्री मंत्र

॥ गायत्रीमन्त्राः ॥ 
         सर्व गायत्री 145 देवो के गायत्री मंत्र

1 सूर्य ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
 2 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात् ॥
 3 ॐ प्रभाकराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 
4 ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 
5 ॐ भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि तन्न आदित्यः प्रचोदयात् ॥ 
6 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 
7 ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 
8 ॐ भास्कराय विद्महे महाद्द्युतिकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 
9 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 
10 ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 
11 ॐ निशाकराय विद्महे कलानाथाय धीमहि तन्नः सोमः प्रचोदयात् ॥ 
12 अङ्गारक, भौम, मङ्गल, कुज ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥ 
13 ॐ अङ्गारकाय विद्महे भूमिपालाय धीमहि तन्नः कुजः प्रचोदयात् ॥
 14 ॐ चित्रिपुत्राय विद्महे लोहिताङ्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥
15 ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥
 16 बुध ॐ गजध्वजाय विद्महे सुखहस्ताय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥
 17 ॐ चन्द्रपुत्राय विद्महे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः 
प्रचोदयात् ॥
18 ॐ सौम्यरूपाय विद्महे वाणेशाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥ 
19 गुरु ॐ वृषभध्वजाय विद्महे क्रुनिहस्ताय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
 20 ॐ सुराचार्याय विद्महे सुरश्रेष्ठाय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
 21 शुक्र ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥
22 ॐ रजदाभाय विद्महे भृगुसुताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥ 
23 ॐ भृगुसुताय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥
 24 शनीश्वर, शनैश्चर, शनी ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥ 
25 ॐ शनैश्चराय विद्महे सूर्यपुत्राय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥
 26 ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नः सौरिः प्रचोदयात् ॥
27 राहु ॐ नाकध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥
28 ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥
29 केतु ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥
30 ॐ चित्रवर्णाय विद्महे सर्परूपाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥
31 ॐ गदाहस्ताय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥
32 पृथ्वी ॐ पृथ्वी देव्यै विद्महे सहस्रमर्त्यै च धीमहि तन्नः पृथ्वी प्रचोदयात् ॥
33 ब्रह्मा ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारूढाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
34 ॐ वेदात्मनाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
35 ॐ चतुर्मुखाय विद्महे कमण्डलुधराय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
36 ॐ परमेश्वराय विद्महे परमतत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
37 विष्णु ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
38 नारायण ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
39 वेङ्कटेश्वर ॐ निरञ्जनाय विद्महे निरपाशाय धीमहि तन्नः श्रीनिवासः प्रचोदयात् ॥
40 राम ॐ रघुवंश्याय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
41 ॐ दाशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
42 ॐ भरताग्रजाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
43 ॐ भरताग्रजाय विद्महे रघुनन्दनाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
44 कृष्ण ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
45 ॐ दामोदराय विद्महे रुक्मिणीवल्लभाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
46 ॐ गोविन्दाय विद्महे गोपीवल्लभाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ।
47 गोपाल ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजनवल्लभाय धीमहि तन्नो गोपालः प्रचोदयात् ॥
48 पाण्डुरङ्ग ॐ भक्तवरदाय विद्महे पाण्डुरङ्गाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
49 नृसिंह ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नारसिꣳहः प्रचोदयात् ॥
50 ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नः सिंहः प्रचोदयात् ॥
51 परशुराम ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नः परशुरामः प्रचोदयात् ॥
52 इन्द्र ॐ सहस्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥
53 हनुमान ॐ आञ्जनेयाय विद्महे महाबलाय धीमहि तन्नो हनूमान् प्रचोदयात् 
54 ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनूमान् प्रचोदयात् ॥
55 मारुती ॐ मरुत्पुत्राय विद्महे आञ्जनेयाय धीमहि तन्नो मारुतिः प्रचोदयात् ॥
56 दुर्गा ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारी च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥
57 ॐ महाशूलिन्यै विद्महे महादुर्गायै धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् ॥
58 ॐ गिरिजायै च विद्महे शिवप्रियायै च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥
59 शक्ति ॐ सर्वसंमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै च धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥
60 काली ॐ कालिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै च धीमहि तन्न अघोरा प्रचोदयात् ॥
61 ॐ आद्यायै च विद्महे परमेश्वर्यै च धीमहि तन्नः कालीः प्रचोदयात् ॥
62 देवी ॐ महाशूलिन्यै च विद्महे महादुर्गायै धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् ॥
63 ॐ वाग्देव्यै च विद्महे कामराज्ञै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
64 गौरी ॐ सुभगायै च विद्महे काममालिन्यै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
65 लक्ष्मी ॐ महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नीश्च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
66 ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
67 सरस्वती ॐ वाग्देव्यै च विद्महे विरिञ्चिपत्न्यै च धीमहि तन्नो वाणी प्रचोदयात् ॥
68 सीता ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै च धीमहि तन्नः सीता प्रचोदयात् ॥
69 राधा ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात् ॥
70 अन्नपूर्णा ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि तन्न अन्नपूर्णा प्रचोदयात् ॥
71 तुलसी ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे विष्णुप्रियायै च धीमहि तन्नो बृन्दः प्रचोदयात् ॥
72 महादेव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
73 रुद्र ॐ पुरुषस्य विद्महे सहस्राक्षस्य धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
74 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
75 शङ्कर ॐ सदाशिवाय विद्महे सहस्राक्ष्याय धीमहि तन्नः साम्बः प्रचोदयात् ॥
76 नन्दिकेश्वर ॐ तत्पुरुषाय विद्महे नन्दिकेश्वराय धीमहि तन्नो वृषभः प्रचोदयात् ॥
77 गणेश ॐ तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
78 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
79 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
80 ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
81 ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
82 षण्मुख ॐ षण्मुखाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात्॥
83 ॐ षण्मुखाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नः षष्ठः प्रचोदयात् ॥
84 सुब्रह्मण्य ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नः षण्मुखः प्रचोदयात् ॥
85 ॐ ॐ ॐकाराय विद्महे डमरुजातस्य धीमहि! तन्नः प्रणवः प्रचोदयात् ॥
86 अजपा ॐ हंस हंसाय विद्महे सोऽहं हंसाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
87 दक्षिणामूर्ति ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीशः प्रचोदयात् ॥
88 गुरु ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्मणे धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
89 हयग्रीव ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
90 अग्नि ॐ सप्तजिह्वाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्न अग्निः प्रचोदयात् ॥
91 ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि तन्न अग्निः प्रचोदयात् ॥
92 ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नो अग्निः प्रचोदयात् ॥
93 यम ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यमः प्रचोदयात् ॥
94 वरुण ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो वरुणः प्रचोदयात् ॥
95 वैश्वानर ॐ पावकाय विद्महे सप्तजिह्वाय धीमहि तन्नो वैश्वानरः प्रचोदयात् ॥
96 मन्मथ ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पवनाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात् ॥
97 हंस ॐ हंस हंसाय विद्महे परमहंसाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
98 ॐ परमहंसाय विद्महे महत्तत्त्वाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
99 नन्दी ॐ तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो नन्दिः प्रचोदयात् ॥
100 गरुड ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
101 सर्प ॐ नवकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नः सर्पः प्रचोदयात् ॥
102 पाञ्चजन्य ॐ पाञ्चजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि तन्नः शङ्खः प्रचोदयात् ॥
103 सुदर्शन ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥
104 अग्नि ॐ रुद्रनेत्राय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो वह्निः प्रचोदयात् ॥
105 ॐ वैश्वानराय विद्महे लाललीलाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥
106 ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निमथनाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥
107 आकाश ॐ आकाशाय च विद्महे नभोदेवाय धीमहि तन्नो गगनं प्रचोदयात् ॥
108 अन्नपूर्णा ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि तन्नोऽन्नपूर्णा प्रचोदयात् ॥
109 बगलामुखी ॐ बगलामुख्यै च विद्महे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
110 बटुकभैरव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे आपदुद्धारणाय धीमहि तन्नो बटुकः प्रचोदयात् ॥
111 भैरवी ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
112 भुवनेश्वरी ॐ नारायण्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
113 ब्रह्मा ॐ पद्मोद्भवाय विद्महे देववक्त्राय धीमहि तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात् ॥
114 ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
115 ॐ परमेश्वराय विद्महे परतत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
116 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥
117 छिन्नमस्ता ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
118 दक्षिणामूर्ति ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीशः प्रचोदयात् ॥
119 देवी ॐ देव्यैब्रह्माण्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
120 धूमावती ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिण्यै च धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात् ॥
121 दुर्गा ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥
122 ॐ महादेव्यै च विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
123 गणेश ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
124 ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
125 गरुड ॐ वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
126 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपर्णाय (सुवर्णपक्षाय) धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
127 गौरी ॐ गणाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्ध्यै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
128 ॐ सुभगायै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
129 गोपाल ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजनवल्लभाय धीमहि तन्नो गोपालः प्रचोदयात् ॥
130 गुरु ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
131 हनुमत् ॐ रामदूताय विद्महे कपिराजाय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥
132 ॐ अञ्जनीजाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥
133 हयग्रीव ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
134 इन्द्र, शक्र ॐ देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नः शक्रः प्रचोदयात् ॥
135 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहस्राक्षाय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥
136 जल ॐ ह्रीं जलबिम्बाय विद्महे मीनपुरुषाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
137 ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नस्त्वम्बु प्रचोदयात् ॥
138 जानकी ॐ जनकजायै विद्महे रामप्रियायै धीमहि तन्नः सीता प्रचोदयात् ॥
139 जयदुर्गा ॐ नारायण्यै विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
140 काली ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात् ॥
141 काम ॐ मनोभवाय विद्महे कन्दर्पाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात् ॥
142 ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
143 ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
144ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
145ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्ण: प्रचोदयात्:

Wednesday, December 2, 2020

एकलव्य का अंगूठा कटवाना धनुर्विद्या से वंचित करना या गुरु द्रोण का वरदान? वास्तविकता पढ़िए 👉

एकलव्य का अंगूठा कटवाना धनुर्विद्या से वंचित करना या गुरु द्रोण का वरदान?

वास्तविकता पढ़िए

श्वेत वस्त्र पहने हुए अनाहत तक पहुंचती श्वेत दाढी कंधे पर जनेऊ और मुख पर अदम्य तेज युक्त द्रोण ने अपने श्वान की ओर गंभीर दृष्टि से देखा, "ले चलो जहां ये बाण मिला तुम्हें "

थोडी ही देर पहले वे जब अपने आश्रम में अपने कुछ शिष्यों को युद्धकला के बारे में समझा रहे थे,उनका श्वान अपने मुंह में एक बाण दबाए आ खडा हुआ था। ढाई पल का बाण और फर के स्थान पर रंगबिरंगे पंख, द्रोण के माथे पर लकीरें खिंच गईं।

इसके लिये कम से कम साढे तीन हाथ का धनुष उपयोग होगा' उन्होंने मन मे ही सोचा 'कौन होगा वो? ' उन्होने अश्वत्थामा को साथ चलने का संकेत किया।

उनकी जानकारी में कम ही ऐसे योद्धा थे जो इस भार के धनुष को चला सकते थे हस्तिनापुर के ऐसे सभी योद्धाओं से वे परिचित थे ये बाण उनमें से किसी का नहीं था और गुरूकुल के इस निषिद्ध क्षेत्र में किसी बाहरी योद्धा की उपस्थिति उनके मन मे संदेह उत्पन्न कर रही थी।

दो घडी वन में चलने के पश्चात थोडे से खुले स्थान पर एक वृक्ष के तने पर चिन्ह बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास करता नवयुवक दिखाई दिया उनके अनुभवी नेत्रों ने तुरंत ही पूरे परिसर को ताड लिया वन के बीच नैसर्गिक कम घना करीब स्थान जिसमें आवश्यकतानुसार झाड़ियों को काट कर उत्तर से दक्षिण की और लगभग 200 गज का लंबोतर मैदान बना लिया गया था जिसकी चौडाई 50 हाथ की थी धनुर्विद्या के अभ्यास के लिए उत्तम स्थान, द्रोण के मन में आया। 

पश्चिम की ओर एक समतल शिला पर पूर्व की ओर मुख किये मिट्टी की अनगढ़ प्रतिमा स्थापित थी जिसका पूजन किया गया था, सामने रखी चौकी पर वन में उत्पन्न होने वाले पुष्प और फलादि दिख रहे थे नवयुवक की पीठ थी उनकी ओर, कुछ श्यामल वर्ण, कमर पर वल्कल,पसीने से भीगे ऊपरी शरीर पर कुछ मालाएं,घने, लंबे जटाओं की तरह बिखरे बाल,कसा हुआ शरीर, नग्न पीठ पर दिखाई देती रीढ की हड्डी की मजबूती कठिन परिश्रम का संकेत दे रही थी।

उसी समय नवयुवक ने संधान किया और प्रत्यंचा खींची बिजली की तेजी से पता भी नहीं चला कब बाण प्रत्यंचा तक पहुंचा कोहनी पीछे आई और धनुष पुनः अपने स्थान पर द्रोणाचार्य के अधरों पर एक हल्की सी हंसी की किरण लहरा कर लुप्त हो गई जिसे अश्वत्थामा नहीं देख पाए हस्तिनापुर के राजपरिवार के युद्ध शिक्षा के आचार्य थे वे,गुरू थे युद्धकला के,विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं में से एक।

पत्तों के चरमराने की ध्वनि सुनकर नवयुवक पलटा,गोल चेहरा,लंबी सुतवां नाक,बडे़ बड़े और काले नेत्र,चौड़ा माथा।माथे पर एक मुकुट की तरह एक ओर पक्षियों के रंगीन पंखों और कौड़ियों से सजा मोटा धागा बंधा था जो केशों को चेहरे के सामने आने से रोक भी रहा था अचानक युवक के नेत्र आश्चर्य से फैले हड़बड़ा कर वो समीप आ कर पृथ्वी पर साष्टांग हो गया।

द्रोण ने सौम्य स्वर में आदेश दिया, उठो पुत्र, कौन हो तुम आचार्य कौन हैं तुम्हारे?

युवक उठा अपने दाहिने हाथ से मुख ढंकते हुए कहा उसने " निषादराज का पुत्र एकलव्य हूं आचार्य, आप ही मेरे आचार्य हैं।"
द्रोण की एक भौंह किंचित् हिली "अर्थात?"

"सात वर्ष पूर्व मेरे पिता मुझे आपके पास धनुर्विद्या सिखाने लाए थे किंतु हस्तिनापुर राजपरिवार के ही कुल को शिक्षा देने की वचन बद्धता के कारण आपने असमर्थता दिखाई थी उसके पश्चात मैने पांच वर्ष तक वन के श्रेष्ठ आचार्यों से शिक्षा ली वहां से सीखकर दो वर्ष पहले एक दिन आपके आश्रम के पास की ही मिट्टी लेकर आपकी प्रतिमा बनाई, आपको दूर से ही देखकर संकल्प लिया और आपको अपना गुरू स्वीकार किया और प्रतिमा यहीं स्थापित कर के आप ही के समक्ष नित्य अभ्यास करता हूँ।"

द्रोण ने एक गहरी सांस ली, कुछ क्षण सोचा और एकलव्य से कहा, "तो परीक्षा दो।"

अश्वत्थामा ये सब देखकर कुछ भी न समझ पा रहे थे केवल मूकदर्शक बने हुए थे पारंपरिक योद्धाओं के समर्पण के ढंग से एक घुटना भूमि पर टिकाकर सिर झुकाते हुए कहा एकलव्य ने "आज्ञा दें"

आचार्य द्रोण ने कहा तुम्हें एक ही स्थान पर सात बाण चलाने हैं "जैसी आज्ञा! " उठ गया एकलव्य।

द्रोण उन दोनों को वहीं रोककर और एकलव्य से खड़िया लेकर आगे बढे और श्वान को अपने साथ आने का संकेत कर दिया करीब सौ कदम आगे जाकर एक मोटे से पेड़ के तने पर निशान बनाया श्वान से कुछ कहा और एक ओर हटते हुए एकलव्य को संधान करने का संकेत किया।

एकलव्य ने बाण निकाला, प्रत्यंचा पर चढा कर प्रक्षेपण कर दिया बाण नहीं पहुंचा चिन्ह तक,एकलव्य ने अचंभित नेत्रों से देखा वो तो श्वान के मुख में दबा है द्रोण का दूसरा संकेत दूसरे बाण का भी वही हुआ सातों बाण अंत में एकसाथ श्वान के मुख में दबे हुए थे।

अश्वत्थामा हतप्रभ अवस्था में थे एकलव्य की अवस्था ऐसी थी जैसे रक्त निचुड़ गया हो द्रोण समीप आ रहे थे उनके नेत्रों में दया,करुणा के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे अश्वत्थामा की ओर देखा उन्होंने "श्वान का मुख बंद हो गया है बाणों से निकाल दो" "अभी कम से कम तीन वर्ष के अभ्यास की और आवश्यकता है तुम्हे पुत्र,हमारा आदेश है अभ्यास बंद नहीं करना।" उन्होने एकलव्य के कंधे पर हाथ रखा।

एकलव्य के नेत्रों से जलप्रवाह हो रहा था उसके मुख से कुछ नहीं निकल पाया।

" एक और आदेश है, ये अभ्यास तुम्हें यहां नहीं विदर्भ देश में जाकर करना होगा किंतु हमारी गुरु दक्षिणा का क्या होगा?"
एकलव्य ने पुनः हाथ से मुख ढंककर भरी हुई वाणी में कहा "कहें आचार्य, प्राण सहित सर्वस्व अर्पण हैं।"

कठोर से भाव ठहर गए द्रोण के नेत्रों में मुख से शब्द निकले जो एकलव्य और अश्वत्थामा के सिर पर बिजली की तरह गिरे "हमें तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए गुरुदक्षिणा में एकलव्य! "

एकलव्य अवाक् द्रोण की ओर देख रहा था "किंतु पिताजी"अश्वत्थामा ने कुछ कहने का प्रयास किया, हाथ के संकेत से रोक दिया द्रोण ने "निर्णय करो एकलव्य " शांत स्वर था द्रोण का।

एकलव्य ने कमर से कटार निकाली और एक ओर बढ गया एक पौधे से कुछ पत्तियां तोडीं पत्थर पर कुचलकर चटनी जैसी बनाकर एक पत्ते पर रख ली फिर वहीं पड़े पत्ते उठाकर एक दोना बनाया तने पर रखा और तीक्ष्ण कटार से एक ही झटके में अपना अंगूठा काट कर डाल दिया उसमें।
दांत भींच रखे थे उसने मुख पर मरणांतक कष्ट के भाव आकर लुप्त हो गए तुरंत पत्ते पर रखी चटनी पत्ते सहित घाव पर रखकर दबा दी बाएं हांथ से दोना उठाया और द्रोणाचार्य के पास लाकर उनके चरणों में रख दिया और स्वयं भी वहीं शीश रख दिया।

द्रोण ने उठाया उसे कंधे से पकड़ कर और बोले "अब विलंब उचित नहीं विदर्भ की ओर प्रस्थान करो।"

एकलव्य ने नतमस्तक होकर प्रणाम किया आश्रम की ओर लौटते हुए मार्ग में इस पूरे घटनाक्रम से उद्विग्न अश्वत्थामा ने पूछ ही लिया "पिताजी ...."

"हम जानते हैं पुत्र तुम जानना चाहते हो कि ये सब क्यों किया हमने" कहा द्रोण ने "तुम स्वयं एक योद्धा हो, जानते हो प्रत्यंचा चढाने के तीन तरीके होते हैं।
पहला निकृष्ट जिसमें अंगूठे और तर्जनी से पकड़ कर तीर चलाया जाता है सही लक्ष्य भेदन के लिये ये उचित है जैसे आखेट के लिये किंतु युद्ध के लिये नहीं,इससे बाण की गति मंद हो जाती है।
वर्षों तक एकलव्य ने वनवासी धनुर्धरों से सीखा है अतः वो इसी का उपयोग करता है दूसरा मध्यम जिसमें तर्जनी और मध्यमा से संधान किया जाता है और अंगुष्ठ को मोड़ कर तर्जनी पर दबाव बनाया जाता है और श्रेष्ठ जहां अंगूठे का बिलकुल उपयोग नहीं होता श्रेष्ठ धनुर्धर इसी का उपयोग करते हैं।

एकलव्य ने मुझे गुरू स्वीकार किया गुरू और इष्ट भाव से बंधे होते हैं हम स्वयं राजकुल से भिन्न किसी अन्य को न सिखाने के लिये वचनबद्ध हैं।
यदि एकलव्य को बता देते कि अंगूठे का उपयोग न करे तो वचन टूटता,न बताते तो गुरू शिष्य की मर्यादा भंग होती तीन वर्ष के अभ्यास से एकलव्य श्रेष्ठ मार्ग से उत्तम संधान कर सकेगा इससे भिन्न कोई मार्ग नहीं था।

उसका यहां वन से दूर जाकर अभ्यास भी उचित है ताकि एकांगी धनुर्विद्या से बहुआयामी की ओर गतिमान हो सके श्रेष्ठ बनने के लिये स्पर्धा चाहिये जो वन में कैसे मिलेगी? "

अश्वत्थामा ने दुःखी होकर द्रोण की ओर डबडबाई दृष्टि से देखा " किंतु इस दक्षिणा के कारण आप का सम्मान?"

"ज्ञात है अश्वत्थामा,संसार के अंत तक लोग हमें क्रूर और निर्दयी गुरू के रूप में स्मरण करेंगे किंतु गुरू होने के नाते स्वयं के सम्मान और शिष्य की भलाई में से हमने द्वितीय को चुना और इस पर हमें कोई दुःख नहीं है।

गुरू को सदैव स्वयं से अधिक शिष्य प्रिय होता है और एकलव्य की गुरू भक्ति सदा के लिये उदाहरण बन गई है धन्य होते हैं वो गुरू जिन्हें ऐसे शिष्य प्राप्त होते हैं।"
#मनुर्भव

Saturday, November 21, 2020

वाहन क्रय करने का शुभ मुहूर्त

वाहन क्रय करने का मुहूर्त -

नक्षत्र - अश्वनी, पुष्य, अभिजीत,हस्त, रेवती, धनिष्ठा, मृर्गशीर्ष, स्वाती, शततारा, पुनर्वसु, नक्षत्रों मे। 
रिक्ता तिथि(४, ९,१४)और मंगलवार, शनिवार,बुधवार, को छोड़कर शेष तिथि वारों में वाहन से सम्बन्धित सभी कार्य ( क्रय-विक्रय) शुभ कहे गये हैं। 
👉
(चर संज्ञक नक्षत्र) स्वाती पुनर्वसु श्रवण, धनिष्ठा, शततारका तथा सोमवार में प्रथम वार वाहन चलाना शुभ होता है। 
- डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार

Saturday, October 24, 2020

राहुकाल

राहुकाल  दिन में एक मुहूर्त (४८ मिनट) की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है। यह स्थान और तिथि के साथ अलग अलग होता है, अर्थात अलग अलग स्थान के लिए राहुकाल बदलता रहता है। यह अंतर समयक्षेत्र में अंतर के कारण होता है। मान्यता अनुसार किसी भी पवित्र, शुभ या अच्छे कार्य को इस समय आरंभ नहीं करना चाहिए। राहुकाल प्रायः प्रारंभ होने से दो घंटे तक रहता है। पौराणिक कथाओं और वैदिक शास्त्रों के अनुसार इस समय अवधि में शुभ कार्य आरंभ करने से बचना चाहिए |

राहुकाल सप्ताह के सातों दिन में निश्चित समय पर लगभग ९० मिनट तक रहता है। इसे अशुभ समय के रुप मे देखा जाता है और इसी कारण राहु काल की अवधि में शुभ कर्मो को यथा संभव टालने की सलाह दी जाती है। राहु काल अलग-अलग स्थानों के लिये अलग-अलग होता है। इसका कारण यह है की सूर्य के उदय होने का समय विभिन्न स्थानों के अनुसार अलग होता है। इस सूर्य के उदय के समय व अस्त के समय के काल को निश्चित आठ भागों में बांटने से ज्ञात किया जाता है। सप्ताह के प्रथम दिवस अर्थात सोमवार के प्रथम भाग में कोई राहु काल नहीं होता है। यह सोमवार को दूसरे भाग में, शनिवार को तीसरे भाग, शुक्रवा को चौथे भाग, बुधवार को पांचवे भाग, गुरुवार को छठे भाग, मंगलवार को सातवे तथा रविवार को आठवे भाग में होता है। यह प्रत्येक सप्ताह के लिये निश्चित रहता है।
इस गणना में सूर्योदय के समय को प्रात: ०६:०० ( भा.स्टै.टा) बजे का मानकर एवं अस्त का समय भी सांयकाल ०६:०० बजे का माना जाता है। इस प्रकार मिले १२ घंटों को बराबर आठ भागों में बांटा जाता है। इन बारह भागों में प्रत्येक भाग डेढ घण्टे का होता है। हां इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वास्तव में सूर्य के उदय के समय में प्रतिदिन कुछ परिवर्तन होता रहता है और इसी कारण से ये समय कुछ खिसक भी सकता है। अतः इस बारे में एकदम सही गणना करने हेतु सूर्योदय व अस्त के समय को पंचांग से देख आठ भागों में बांट कर समय निकाल लेते हैं जिससे समय निर्धारण में ग़लती होने की संभावना भी नहीं रहती है।
-डॉ मुकेश ओझा
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक सलाहकार